कशमकश
बाजी राव का मस्तानी को लेकर कई दिनों से अपने परिवार के साथ बहुत विवाद, बहस और झगड़ा हो रहा होता है। मस्तानी की हीरे मोती जड़ी, सोने और चांदी के गोटे वाली पट, जरी की साडि़यों पर आ रहे खर्च और महाराजा छत्रसाल के देहांत के उपरांत बुंदेलखंड से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता बंद हो जाने के कारण काफ़ी तनाव उत्पन्न हो जाता है।
बाजी राव ने सफाई देते हुए बहुत कहा है कि हुक्के, इत्रों और फुव्वारों पर भी तो खर्च आता है ? शान बढ़ाने के लिए कई बार इस प्रकार धन खर्च करना ही पड़ता है। लेकिन आज तो बात कुछ अधिक ही बढ़ गई और मामला छत्रपति शाहू के दरबार तक पहुँच जाता है। शाहू ने बाजी राव को बुलाया है। बाजी राव इसी कारण दिन भर परेशान रहा है।
रात का पिछला पहर है। बाजी राव सोच-विचार के चक्रव्यूह में उलझा हुआ है। लगभग सारी रात ही उसने बेचैनी में बिताई है। मानसिक परेशानियों में मस्तानी भी उसकी बांह का सिरहाना बनाये उसके संग लेटी हुई आने वाले कल की चिंता में करवटें बदल रही है।
लेटी हुई मस्तानी तिरछी नज़र से बाजी राव की ओर देखती है, “क्या बात है स्वामी, आज नींद नहीं आ रही ?“
“नहीं। तुम भी कहाँ सोई हो।“ बाजी राव आँखें मूंद लेता है।
“ऐसे नाजुक समय में नींद भी कैसे आ सकती है ? मेरा तो उसी समय माथा ठनक गया था जब सतारा से कासिद महाराज शाहू जी के तलब करने का पैगाम लेकर आया था। पता नहीं कल दरबार में क्या होगा ?“
“कुछ नहीं होता। तुम चिंता मत करो। मैं सबको देख लूँगा।“ मस्तानी को ढाढ़स देते बाजी राव का मन खुद डोल रहा होता है।
मस्तानी बाजी राव का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख लेती है, “यह देखो। मेरा तो कलेजा कांपे जा रहा है। देखना, कहीं वही बात न कर देना ? अगर आपने मुझे छोड़ दिया तो न मैं इधर कही रहूँगी और न उधर की।... मैं तो माऊ जाकर साध्वी बन जाऊँगी।“
“तुम्हारा परिवार माऊ-माऊ बहुत करता है। क्या है माऊ में खासियत ?“
“माऊ हमारा धार्मिक केन्द्र है। तमासा दरिया वाले इस नगर माऊ का पहला नाम माऊ नाथ भजन था। माऊ का मतलब पड़ाव या छावनी होता है। शेर शाह सूरी, बादशाह अकबर और आलमगीर औरंजजेब इस नगर को सफ़र के दौरान ठहराव के तौर पर इस्तेमाल किया करते थे। औरंगजेब की बहन जहांआरा ने यहाँ मुहल्ला केरियां में एक मस्जिद भी बनाई थी, जिसके साथ अनेक सरायें भी बनी हैं। कहते हैं, बहुत पहले एक नट हुआ करता था -माऊ नट भजन। वह बड़ा शरारती और ज़ालिम था। स्थानीय पंडितों को बहुत तंग किया करता था। पंडितों ने हाकिम से उसकी शिकायत करके उसको वहाँ से निकालने के लिए कहा। नट ने हाकिम से विनती करके एक शर्त रख दी कि यदि पंडित कुश्ती करके उसको हरा देंगे तो वह नगर छोड़कर चला जाएगा। नहीं तो पंडितों को नगर छोड़ना पड़ेगा। कुश्तियाँ हुईं। न माऊ जीत सका और न ही उसकी हार हुई। मामला वहीं का वहीं रह गया। आखि़र माऊ ने कहा कि वह नगर छोड़कर चला जाएगा यदि नगर का नाम उसके नाम पर रख दिया जाए। पंडित मान गए और माऊ वहाँ से चला गया। उस दिन से उस नगर का नाम माऊ नट भजन पड़ गया। समय के साथ साथ धीरे धीरे बिगड़ता हुआ यह नाम सिर्फ़ माऊ ही रह गया है। हिमांयू को हराने वाला बादशाह शेर शाह सूरी यहीं माऊ में ही कोल्हूवावण(मधुवन) प्रसिद्ध सूफी फकीर संत सैयद अहमद वडवा को मिलने भी आया करता था। शेर शाह सूरी की बेटी स्थायी तौर पर यहीं रहती रही थी। इलाहाबाद को जाते हुए अकबर यहीं पर ठहरा करता था। मुगलों की सेना के साथ आए तुर्की, अफ़गानी और ईरानी जुलाहे यहीं माऊ में ही बस गए। इस कारण यहाँ के लोग भोजपुरी, फारसी, पश्तो और ईरानी बोलियाँ बोलते हैं। जुलाहों ने अपना पुश्तैनी व्यवसाय अपना कर माऊ को वस्त्र बनाने के लिए प्रसिद्ध कर दिया। आपने जो लुंगी पहन रखी है, मालूम है, कितना जंचती है। आपके परिवार वालों ने मुझे निकाल दिया तो मैं माऊ मंे जाकर संतनी बन जाऊँगी।... अच्छा बताओ यदि मैं सन्यास लेकर माऊ चली गई तो क्या वहाँ मुझे मिलने आओगे ?“
बाजी राव करवट बदलकर मस्तानी की ओर अपने शरीर को मोड़ता है और मस्तानी को कसकर बांहों में भींच कर अपनी छाती से लगा लेता है, “यह क्या अनाप शनाप बोले जा रही है ? तुझे छोड़ने के लिए तो मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता। कौन जन्मा है, मुझे तुझसे छीनने वाला ? खुंडी कुल्हाड़ी से टुकड़े न करके रख दूँगा। मैं तो स्वयं नहीं तेरे बिना रह सकता। मस्तानी जान, मर जाऊँगा तुझसे दूर होकर।“
मस्तानी, बाजी राव के मुँह पर हाथ रख देती है, “हाय हाय! अल्लाह ! राम-राम !! कहो। मरें आपके दुश्मन।“
मस्तानी बाजी राव के ऊपर लेट जाती है, “आपको एक कहानी सुनाती हूँ।... चैहदवीं सदी में क्षत्रिय राजपूत राजकुमार हरदेव सिंह को बोरदी दासी के साथ प्रेम संबंध स्थापित करने के कारण जाति से निकालकर देश निकाला दे दिया गया था। फिर वह जंगलों में जाकर अपनी प्रेमिका के संग बस गया और गुप्त रूप में उसने अपनी सेना तैयार की थी। समय बीतता गया और उसके पिता का स्थान अन्य राजा ने ले लिया। नए राजा का पुत्र हरदेव सिंह की जवान पुत्री पर मोहित हो गया। राजकुमार ने हरदेव सिंह से उसकी पुत्री का हाथ मांगा। हरदेव सिंह ने शर्त रख दी कि वह शादी करने के लिए तैयार है, यदि राजकुमार का राजा पिता अपने मंत्रियों और सिपहसालारों के साथ आकर उसके हाथों का बना भोजन करे। राजा अपने पुत्र की खुशी के लिए यह शर्त मान गया। हरदेव सिंह ने खाने में नशीले पदार्थ डालकर सबको खिलाये और शराब तथा अफीम का सेवन सभी को करवाकर मदहोश कर दिया। उसके पश्चात हरदेव सिंह के सैनिकों ने राजा और उसके साथियों को मार दिया और इस प्रकार लहू की बूंदें लेकर हरदेव सिंह ने अपना हक वापस प्राप्त किया था। हरदेव सिंह ने हकों के लिए बूंद लो का नारा लगाकर अपना नया वंश ‘बुंदेल’ चलाया था। अब यूँ लगता है जैसे फिर एक बुंदेल के हकों पर उसके प्रेम संबंधों के कारण डाके मारे जाने की तैयारियाँ की जा रही हों।“
बाजी राव वेग मंे आकर मस्तानी की गालों और अधरों को चूमने और च्यूंटने लग जाता है, “तुझे भरोसा नहीं मेरे पर ? ... हैं...? ऊँ... बोल... तो... विश्वास नहीं अपने प्यार पर ?... हूँ ?... हैं ?“
“विश्वास है, इसीलिए तो अब आपके पास लेटी हूँ।“
मस्तानी, बाजी राव को प्रत्युŸार में संक्षिप्त से चुंबन देकर उसके अधरों में से अपने अधर नजाकत के साथ छुड़ा लेती है। बाजी राव उसकी बेरुखी का बुरा नहीं मनाता और मस्तानी को निर्वस्त्र करता हुआ गरमाने के लिए यत्न जारी रखता है। बाजी राव के शारीरिक मिलाप के निमंत्रण को उŸार दिए बिना ही मस्तानी उसकी छाती से चिपटकर खामोश हो जाती है।
बाजी राव मस्तानी की रुचि न होने के बावजूद उसको भोगता है और शांत होकर पड़ जाता है। शेष बची रात बाजी राव और मस्तानी करवटंे बदलते हुए बेचैनी और मानसिक कशमकश मंे बिताते हैं।
पौ फटती है तो बाजी राव स्नान करके घोड़े तैयार करने का आदेश देता है। मस्तानी पूजा पाठ करके बाजी राव के सिर पर लाल पेटा बांध कर उसको विदा करती है। अनमने से मन के साथ मस्तानी से अलविदा लेकर बाजी राव छत्रपति शाहू के दरबार में उपस्थित होने के लिए यात्रा आरंभ कर देता है।
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