छत्रपति का दरबार
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(छत्रपति महाराज शिवाजी का दरबार)
दोपहर के बाद जब बाजी राव महाराजा शाहू जी के दरबार में उपस्थित होता है तो वहाँ छत्रपति के मंत्री और अधिकारियों के अलावा छोटा भाई चिमाजी अप्पा, माता राधा बाई, धर्मगुरू महाराज श्री ब्रह्ममहिंदरा स्वामी और उनके भट्ट खानदान का बुजुर्ग मोरे सेठ आदि ही पहीं, कई अन्य मराठे सरदार महाधजी पंत, महोडबा पूरनधारे, सूबा राव जेबे भी उपस्थित होते हैं।
मुस्लिम शासकों के प्रभाव के कारण भारत में प्रशासनिक पदों के नाम अरबी, फारसी में प्रचलित थे। राज भाषा भी फारसी ही थी। छत्रपति शिवाजी ने अपने शासनकाल के दौरान अपनी राजभाषा मराठी घोषित करके राज कार्यों के लिए ‘राजविहार कोश’ की रचना करवाई थी। जिसका संपादन रघूनाथ पंत हनुमंते की निगरानी अधीन अनेक विद्वानों ने सम्पूर्ण किया था। इस ‘राज विहार’ कोश के अनुसार आठ विशेष पद बनाये गए थे। जिन्हंें अष्ट प्रधान कहा जाता है। इनकी सूची क्रमवार पदानुसार इस प्रकार है -
पेशवा - मुख्यमंत्री (प्रधान मंत्री -च्तपउम डपदपेजमत)
मजूमदार -आमतिया (राज मंत्री - ब्ंइपदमज डपदपेजमत)
सुरनिस - सचिव(विŸा मंत्री - थ्पदंदबम डपदपेजमत)
बाकेनवीस -सचिव(गृह मंत्री - प्दजमतदंस ।ििंपते डपदपेजमत)
सरनौबत -सेनापति ( ब्वउउंदकमत)
दबीर - सामंत (विदेश मंत्री - थ्वतमपहद डपदपेजमत)
न्यायधीश - जज(स्ंू डपदपेजमत वत ैमदपवत श्रनकहम)
पंडित राव( धार्मिक मंत्री - त्मसपहपवने डपदपेजमत)
छत्रपति शिवाजी द्वारा तैयार करवाये राजविहार कोश के अनुसार छत्रपति के दरबार में अष्ट प्रधानों के बैठने के लिए विशेष आसन आरक्षित रखे गए थे। दरबार में बुलाये जाने का उद्देश्य जानते हुए भी बाजी राव अनजान बनने का ढोंग करता है, “छत्रपति की जय हो ! आदेश कीजिए महाराज... खादिम को यूँ अचानक कैसे याद किया गया है ?“
छत्रपति, बाजी राव को बैठने का इशारा करता है। बाजी राव छत्रपति शाह के सबसे निकट दायीं ओर पेशवा आसन पर विराजमान हो जाता है।
महाराज शाहू बाजी राव की ओर देखता हुआ बड़ी नम्रता के साथ कहना प्रारंभ करता है, “देखो बाजी राव, तुम तो जानते ही हो कि हम तुम्हें कितना प्यार और सत्कार करते हैं। तुम एक बढि़या योद्धा ही नहीं, मराठों का मान भी हो। हमने तुम्हें पेशवाई यूँ ही नहीं दी थी। तुम्हारे गुणों और योग्यता को देखा था। साहित्यिक भाषा में जिसको आदर्श पुरुष कहते हैं। हमारे विशाल मराठा साम्राज्य का महानायक और हीरा हो तुम, हीरा। हम नहीं चाहते कि हमारे इस नायाब हीरे की चमक कभी धुंधली पड़े।“
बाजी राव खांसकर गला साफ़ करता है, “क्या बाजी राव ने अपनी पेशवाई कर्तव्य निभाते हुए आज तक आपको कोई शिकायत का अवसर दिया है, महाराज स्वामी ?“
“नहीं, हमें तो नहीं। पर तुम्हारे परिवार और मराठा सरदारों को तुमसे शिकायत है। तुम चूंकि हमारे प्रिय हो इसलिए हम उसको दूर करने के इच्छुक हैं। तुम्हारे ऊपर दोष लगा है कि तुम मस्तानी के साथ अय्यासी में इतने मग्न रहते हो कि तुम्हें जग और ईश्वर की भी कोई सुध नहीं रहती है। मुझे पता चला है कि तुम हर समय मदिरापान ही करते रहते हो। मस्तानी भी रोकने की बजाय तुम्हें नशा करने के लिए उत्साहित करती है। यह आदत हमारे मराठा सल्तनत और तुम्हारी सेहत के लिए बहुत हानिकारक है, शेर-ए-मराठा। हम इस समस्या को लेकर काफी चिंतित हैं।“ महाराज शाहू रौब के साथ बोलते हैं।
बाजी राव गर्दन झुकाये सोचता हुआ उŸार देता है, “महाराज, मैं क्या करूँ ? किधर जाऊँ ? यह सारा शोर-शराबा व्यर्थ का है। बात शराब की नहीं है। शराब तो पहले मैं कौन सा कम पीता था, जब मस्तानी नहीं थी? लोगों की आँखों में तो मस्तानी चुभती है। मस्तानी ने मुझे कभी शराब पीने के लिए नहीं कहा। वह तो बल्कि मुझे रोका करती है। महाराज स्वामी, आपने भी पाँच विवाह करवाये हैं। सभी हुक्मरान एक से अधिक स्त्रियाँ रखते हैं। फिर मस्तानी के साथ रिश्ता जोड़कर मैंने कौन सा गुनाह कर लिया है ? मस्तानी के साथ समय गुज़ारना मुझे अच्छा लगता है। वह मेरी रूह जैसी है। मेरे परिवार को बस यही बात चुभती है। मेरे परिवार वाले हर समय किसी न किसी मुद्दे को लेकर मेरी जान सूली पर टांगे रखते हैं। मैंने अपनी सारी उम्र युद्ध लड़ते हुए अपने परिवार और मराठा राज का गर्व से सिर ऊँचा उठाने में लगा दी है। जब समूचा मराठा राष्ट्र सिरहाने के नीचे बांह रखकर सुख की नींद सो रहा होता था तो मैं युद्धभूमि में नंगी तलवार चलाकर मराठा राज की सीमाओं को बढ़ा रहा होता था। मैं भी इन्सान था। क्या मुझे अपने फुर्सत के समय में मनोरंजन करने का अधिकार नहीं है ?“
धर्मगुरू ब्रह्ममहिंदरा टोकता है, “वह तुम्हारी बात ठीक है। खूब दिल को बहला। पर बच्चा ! हर काम की कोई सीमा होती है। अब भी देख तेरी जबान थुथला रही है और तेरे से उचित ढंग से बैठा भी नहीं जा रहा। तुम अब भी नशे से धुŸा हो। हम तुम्हारे हित चिंतक हैं, शत्रु नहीं। हम समस्याओं का असली कारण बूझ रहे हैं। यदि हमने अब कोई कठोर कदम न उठाया तो तुम अपने आप को शराब पीकर खत्म कर लोगे।“
बाजी राव कुछ नहीं बोलता और खामोशी के साथ सबकी ओर देखता रहता है।
महाराज शाहू चुप के वातावरण को बदलते हैं, “पेशवा बाजी राव... हम आदेश देते हैं कि तुम्हारा परिवार और समूह मराठा राष्ट्र तुम्हारे और मस्तानी के संबंधों को स्वीकार करेगा। कोई भी किसी तरह की आपŸिा नहीं करेगा। पर एक शर्त है कि तुम्हें शराब छोड़नी पड़ेगी। तुम वचन दो और हमें शराब छोड़कर दिखाओ। हम तुम्हें सबसे दूर एकांत में पतास(65 ज्ञउ ंूंल तिवउ उवकमतद च्नदम ) जाने का आदेश देते हैं। पतास जाकर तुम अकेले कुछ समय व्यतीत कर और नशों से मुक्त हो। जब तक तुम मदिरा नहीं छोड़ोगे, तुम मस्तानी से नहीं मिल सकते। यही हम सब का फैसला है।“
बाजी राव रुआंसा हो जाता है और उसके मुँह से उदासीन, थकी सी आवाज़ निकलती है, “ठीक है, यदि यही आपका निर्णय है तो... मैं आपŸिा करने वाला कौन होता हूँ ? मैंने क्या पहले आपका आदेश मानने से इन्कार किया है जो अब हुक्म-उदूली करूँगा। लेकिन मेरी भी एक शर्त है कि मस्तानी के मामले पर उसके बाद कोई बखेड़ा नहीं होना चाहिए। मस्तानी मेरे दिल की धड़कन है।“
गुरू ब्रह्ममहिंदरा अपना अगला दांव खेलता है, “ऐसे नहीं बाजी राव, तुम्हें सौगंध खानी पड़ेगी कि जब तक हम नहीं कहते, तुम मस्तानी को नहीं मिलोगे। गंगा जल प्रस्तुत किया जाए।“
“ठीक है गुरूवर !“ गंगा जल हथेली में लेकर बाजी राव कसम खा लेता है और सबसे आज्ञा लेकर गुस्से में घोड़े पर सवार होकर पूणे से चालीसेक मील की दूरी पर बसे नगर पतास की ओर निकल जाता है।
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