Saturday, 24 October 2015

अध्याय-26

दफ़न राज़
By Tarsem Rahi
मस्तानी ! नाना साहिब की एकदम से सारी पी हुई उतर गई। वह गौर से बल खाकर मटक मटक कर चली जा रही मस्तानी की मरोड़ा खाती कमर को देखने लग पड़ा, “हे राम ! कमबख्त यह औरत तो पहले तोड़ की दारू जैसी लगती है। शरबत को हाथ लगाओ तो शराब बन जाता है। कंजरी जब पान खाती है तो बिलांद भर की गर्दन में से नीचे जाता हुआ देख लो बेशक।  औरत क्या है, निरा फूलों का गुलदस्ता ही है... हवा में महक बिखेरती जाती है। यहाँ तक खूबसूरत बदन की सुगंध आती है।... हूँ ! देवा रे देवा !! कब खाएँगे ये मेवा? 
By Tarsem Rahi



भीमा नदी के तट पर ऊँचे टीले पर बैठ दारू पी रहे नाना साहिब को भीमा घाट से स्नान करके निकल रहा एक बुत दिखाई देता है। नाना साहिब अपने सिर को झटकता है और आँखें खोलकर ध्यान से उस बुत को देखता है। ज्यूँ ज्यूँ वह चलता हुआ बुत समीप पहुँचता जाता है, त्यूँ त्यूँ उसको पहचानना नाना साहिब के लिए आसान होता जाता है। नदी से निकला सफ़ेदपोश बुत पहले एक दिलकश स्त्री और फिर मस्तानी के रूप में परिवर्तित हो जाता है।


गीले बदन से चिपकर भीगे सूती वस्त्र मस्तानी के जिस्म को पारदर्शी बना रहे होते हैं। मस्तानी ने सफ़ेद मलमल के छोटे से कपड़े की कंचुकी से सुडौल उरोजों को पीठ पीछे गांठ लगाकर बांध रखा है। कंधे पर सफ़ेद उतारसंग, कमर  में चाँदी की तगड़ी और नाभि के नीचे तक के झांकते तन पर बांधी महीन वासिका(लुंगी), मुश्किल से पिंडलियों तक पहुँचती हुई मस्तानी को आलौकिक बनाकर प्रस्तुत कर रही होती है। नाना साहिब, मस्तानी के सुंदर और सलोने अंगों को टकटकी लगाकर देखने लग पड़ता है जो कि वस्त्र धारण होने के बावजूद प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे थे। झक गोरे नितम्ब देखकर नाना साहिब का चित  करने लग पड़ता है कि वह मस्तानी को धरती पर निर्वस्त्र करके लिटा ले और उसकी सारी पीठ को चूमने लग पड़े।... अथवा मस्तानी के पीछे जाकर उसको बांहों में भर ले और मस्तानी के कानों की लवों को चूमता हुआ मस्तानी की काम उकसाऊ और दिलकश नाभि वाले नरम कोमल पेट को हाथ फेरकर सहलाये।... आहिस्ता-आहिस्ता पेट को सहलाते हुए उसके हाथ ऊपर की ओर बढ़ते बढ़ते उरोजों तक चले जाएँ... वह मस्तानी के सुडौल और नुकीले स्तनों को बार बार हाथों में लेकर कसते हुए मुट्ठियों में भर ले।... मस्तानी के उतेजित स्तनों को कसता हुआ वह अपने होंठों को सरकते हुए गिरगिट की तरह पीठ...बाहों...नितम्बों...गर्दन से सरकाता हुआ मस्तानी के कपोलों तक ले जाए और उतेजित हुई मस्तानी सुरूर में आँखें बंद करके कामुक हुंकारे भरने लग पड़े, “ऊ...आह...ऊ...हाय अम्मा !

मस्तानी अपने वेग पर नियंत्रण न रख सके और वह गर्दन के साथ थोड़ा धड़ को घुमाकर उसकी ओर घूमे और आत्मसमर्पण करती हुई अपने होंठ नाना साहिब के होंठों के हवाले कर दे।... मस्तानी के अधरों को चूसता और काटता हुआ जीह्वाओं को वह परस्पर मिलवायें और मस्तानी में वहीं खड़े खड़े ही एक हो जाए।

ऐसे कामुक विचारों को कल्पित करते हुए नाना साहिब को अपने अंगों में एक उथल-पुथल होती अनुभव होने लगी। उसने दोनों टांगों को दबा कर अपने लिंग को दबोच लिया। ऐसा करने से नाना साहिब की कामचेष्टा दबने की अपेक्षा और अधिक भड़क उठती है।

जब से नाना साहिब की पत्नी गोपिका ने गर्भ धारण किया है, तब से नाना साहिब की काम इच्छा में वृद्धि हो गई है। सच पूछो तो जबसे गोपिका के गर्भवती होने की ख़बर मिली है, नाना साहिब उसके साथ एक रात भी नहीं सोया। नाट्यशाला की कलाकार स्त्रियाँ, गणिकायें और रखैलें नाना साहिब का चित बहलाने के लिए हर संभव यत्न करती हैं। परंतु नाना साहिब का उनसे दिल नहीं भरता। यह भी सच्चाई है कि नाना साहिब, मस्तानी के प्रति पहले दिन से ही आकर्षित था।

जब उसका पिता बाजी राव मस्तानी को लेकर आया था तो प्रथम दृष्टि में ही नाना साहिब मस्तानी पर मोहित हो गया था। उस प्रथम मिलन के समय नाना साहिब की नज़रें मस्तानी पर ही गड़ी रह गई थीं और मुँह खुला का खुला रह गया था। इतनी सुंदर मूरत जैसी सूरत कम से कम उसने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी। बहाने-बेबहाने मस्तानी को निहारता हुआ वह मन ही मन सोचता रहा था, यह बाबा ने क्या कर दिया। इसको अपनी पत्नी बना लिया ? यह तो मुझे भेंट करनी चाहिए थी। मेरे साथ आयु, विचार और सुंदरता सभी गुण मेल खाते हैं। केवल तीन साल ही तो बड़ी है। पर बाबा यूँ ही फालतू में इस कंचनी पर आशिक हुए फिरते हैं। काश ! एक रात के लिए ही मस्तानी मेरी पनाहों... मेरी बांहों में आ जाए तो मेरे उम्रभर के दुख टूट जाएँगे और इसकी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी। हाय मस्तानी !

पिता बाजी राव की उपस्त्री (रखैल) होने के कारण नाना साहिब, मस्तानी को अंग लगाने की कामना पूरी करने में असमर्थ तो हो गया था। मस्तानी उसके लिए कठिनाई से प्राप्त होने वाली वस्तु बनकर रह गई थी। लेकिन वह मस्तानी के प्रति अपने मन में पैदा हुए आकर्षण को मार नहीं सका था। वह जब भी एकांत में होता, मस्तानी को लेकर सोचता रहता। मस्तानी का दीदार करते ही नाना साहिब के शरीर में काम तरंगे उठने लग पड़तीं और उसका काम अंग जोश में आकर अंगड़ाइयाँ लेने लग जाता था। मस्तानी को प्राप्त करने की हवस नाना साहिब के अंदर जलते अलाव के गीले उपले की आग की भाँति सुलगती रहती। नाना साहिब नित्य नए बहाने घड़कर मस्तानी के दर्शन करने का यत्न करता रहता था। पर कर कुछ न सका।

सुनहरी हिरण सभी को अच्छा लगता है। हर कोई उसको पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ता है। लेकिन हिरण किसी के हाथ नहीं आता और अपने पीछे दौड़ा दौड़ाकर व्यक्ति को थका देता है। इस हिरण को पकड़ना ‘चकरी चाह’ कहलाता है। मस्तानी भी नाना के लिए ‘चकरी चाह’ ही बन गई थी।

घाट से चलता हुआ मस्तानी का बुत आहिस्ता आहिस्ता छोटा होते होते अंत में महल के दरवाजे़ में लुप्त हो जाता है।

नाना साहिब हाथ में पकड़े खाली प्याले को शराब से पुनः भरता है और मुँह से लगाकर एक सांस में ही खाली कर देता है। नाना साहिब टीले के इर्द गिर्द पड़ी सुनसान धरती को देखता है। उसके मन में कोई द्वंदयुद्ध चल रहा होता है। वह दुबारा प्याले में शराब उडेलने लगता है और फिर कुछ सोचकर रुक जाता है। नाना साहिब के दिमाग में कोई विचार नहीं आता। वह सुराही की नलिका से मुँह लगाकर गटागट दारू पी जाता है। मुँह में ताज़े घुसे कसैलेपन से निजात पाने के लिए खंखारता है और उठकर खड़ा हो जाता है और स्वयं से संवाद रचाने लगता है, “सुंदर स्त्री अभिमानी होती है और अभिमानी नार का मन चंचल होता है।... चलूँ, चलकर भाग्य आजमाता हूँ... शायद...।

पहला कदम उठाते ही नाना साहिब नशे के कारण लड़खड़ाता हुआ अनियंत्रित होकर गिरने को होता है और बड़ी कठिनाई से समीप पड़ी बड़ी चट्टान पर हाथ रखकर संभलता है। डगमगाते कदमों के साथ गिरता ढहता वह मस्तानी के महल तक जैसे तैसे पहुँच जाता है।

पिछली रात एक रकासा के साथ बिताई होने के कारण अभी तक नाना साहिब की कलाई पर मोंगरे के फूलों का गजरा बंधा हुआ है और उसके वस्त्रों में से कामोउतेजक इत्र की महक आ रही होती है।

मस्तानी महल के मुख्य द्वार को धक्का मारकर खोलते हुए जैसे ही नाना साहिब अंदर प्रवेश करता है तो अनियंत्रित होकर सीधा धरती पर जा गिरता है।

एक दासी आकर नाना साहिब को उठाती है, “ज़रा संभालकर पेशवा सरकार, चोट तो नहीं लगी ?” 

“चोट की बात छोड़, मैं तो घायल हुआ पड़ा हूँ।...बु...र्र...र...ंअंा ! कहाँ है मस्तानी ?” 


दासी चिल्लाती हुई नाना साहिब को छोड़कर दूर हो जाती है, “बाई साहिबा तो सो गई हैं।

“हट जा पीछे...  एक गंदी गाली देते हुए कहता है, “मुझे मूर्ख बनाती है ? अभी अभी तो वह घाट पर से छातियाँ छनकाती आई है। इतना शीघ्र कैसे सो सकती है ?“ नाना साहिब नशे के कारण फिर गिर पड़ता है।

“नाना साहिब ? यह क्या तमाशा लगा रखा है ? चैबारे में से गरज़ती हुई मस्तानी की आवाज़ आती है।

“ओ ताई साहिबा ! नाना साहिब हथेलियाँ ज़मीन पर टिकाकर बाहों के सहारे उठकर बैठते हुए छज्जे पर जंगले में खड़ी मस्तानी को देखकर शैतानी मुस्कराहट चेहरे पर ले आता है।

मस्तानी आँख के इशारे से दासी से कहती है कि वह नाना साहिब को अतिथिगृह में ले जाए। नाना साहिब दासी के साथ अतिथिगृह में चला जाता है और वहाँ एकत्र सभी दासियों को वहाँ से चले जाने का आदेश देता है।

कुछ देर बाद नाना साहिब को अपनी ओर बढ़ती आ रही पायल की छनछन की आवाज़ सुनाई देती है। मस्तानी कमरे में प्रवेश करती है, “इस समय ऐसे आकर हंगामा करने का अर्थ ?

नाना साहिब मस्तानी को सिर से पैरों तक देखता है। गर्भवती होने के कारण मस्तानी के बढ़े हुए पेट को देखते ही नाना साहिब सोचने लग जाता है, “नरबदा की सारी जागीर तो यह पहले ही अपने पुत्र कृष्ण सिनहा को बाबा से दिला चुकी है। अब यदि दूसरा बच्चा आ गया तो उसके लिए भी हिस्सा मांगेगी।... यूँ खैरात में हिस्से ही बांटते चले गए तो मुझे पीछे क्या मिलेगा ? मैं राख के ढेर पर पेशवाई करूँगा ?

नाना साहिब को खामोश देखकर मस्तानी पुनः प्रश्न करती है, “आपने उत्तर नहीं दिया ? मैंने कुछ पूछा था?

नाना साहिब डिब्बी में से थोड़ी-सी अफ़ीम की चुटकी भरकर जीभ से लगाता है और समीप पड़े शरबत को पीता हुआ बोलता है, “आपको घाट पर से आते देखा था। मेरे से रहा नहीं गया। बस, थोड़ा चाँद जैसे मुखड़े का दीदार करने आ गया। धर्म से, कलेजे को ठंड सी पड़ जाती है, आपको देखकर।

“आपको पता है, नशे की हालत में आप क्या अनाप-शनाप बके जा रहे हैं।...उफ्फ ! मदिरा की कितनी दुर्गन्ध आ रही है आपमें से । मस्तानी उंगलियों से अपना नाक दबा लेती है।

नाना साहिब उठकर मस्तानी के करीब चला जाता है, “नशा कहाँ किया है ? मदहोश होने तो यहाँ आया हूँ। जो नशा आपकी बिल्लौरी आँखों में है न, गऊ की सौगंध, शराब तो उसके आगे कुछ भी नहीं है।

मस्तानी अपने क्रोध का दबाने के लिए लम्बा सांस खींचती है, “आपको इस वक्त और ऐसी अवस्था में यहाँ नहीं आना चाहिए था। कलाई में गज़रा, आँखों में सुरमा, वस्त्रों पर इत्र और शराब में धुत्त हुआ शरीर...जैसे आप कोठे पर जाने के लिए तैयार होकर आए हो। भट््ट खानदान के चश्म चिरागों को ये चलन शोभा नहीं देते। माताश्री और ताई साहिबा को ख़बर है कि आप इस समय यहाँ आए हो ?

“क्यों, मैं कोई नादान बच्चा हूँ जो हर काम उनको बता कर करूँ ? मैं तो मस्तानी जान ऐश करने आया हूँ तुम्हारे साथ। आ मिलकर दारू पीते हैं और तेरे नाजुक नरम शरीर को अपनी हड्डियों का सेक दूँ।...चल नहीं, मुजरा दिखा मुझे अपना सुंदरी !

“बदतमीज़ ! अपनी जुबान को लगाम दे। सौतेली ही सही, पर मैं तेरी माँ लगती हूँ।

“हूँ ! कहती है, माँ लगती हूँ। पर माँ तो नहीं है न। अगर लगना ही है तो ज़रा मेरे साथ लगकर देख। तेरी मचलती और सुलगती जवानी की आग को ठंडा न करके रख दूँ तो मुझे नाना साहिब न कहना। रंडी ! तू सिर्फ़ बाबा की रखैल थी, रखैल। एक उप-स्त्री। वह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे। अब अपने बडील(पिता) की लौंडी पर मेरा हक़ वैसे ही है जैसे उनकी पेशवाई और सम्पति पर है। पुरुष की गरमी आम और जनानी की गरमी काम से ही मरती है। तुझे मर्द की ज़रूरत है। मुझे अपनी शारीरिक भूख पूरी करने के लिए तेरे जैसी हसीन कंचनी की आवश्यकता है। तू एक कंजरी है, कंजरी बनकर रह, री गश्ती !

मस्तानी से यह सुनकर अपने आप पर नियंत्रण नहीं रह पाता और वह नाना साहिब के मुँह पर थप्पड़ दे मारती है, “हरगिज़ नहीं। मैं रखैल नहीं थी। मेरे साथ राव स्वामी ने बाकायदा विवाह करवाया था। वह भी एकबार नहीं, तीन बार। पहला मेरे माता-पिता के पास बुंदेलखंड में और फिर पाबल आकर मंदिर में मेरी मांग में सिंदूर भरा था। तीसरी बार तुम्हारी समूची बिरादरी के सामने। कुते !...तू क्या समझता है, यदि राव स्वामी नहीं रहे तो अब मैं तेरी सेजें सजाऊँगी ? हरामज़ादे ! तेरी इतनी हिम्मत कैसे पड़ी ?

नाना साहिब से अपना इस प्रकार का निरादर सहन नहीं होता। वह मस्तानी को जाकर लिपट जाता है, “हिम्मत तो बिल्लो अभी तूने मेरी देखी नहीं।
मस्तानी नाना साहिब की बाहों की जकड़ में से आज़ाद होने के लिए संघर्ष करती हुई शोर मचा देती है, “बचाओ... कोई है ?... बचाओ।

नाना साहिब मस्तानी को ज़मीन पर लिटाकर उसके मुँह को अपना हाथ रखकर बंद कर देता है, “शोर मचाने का कोई लाभ नहीं। इस महल में तैनात पहरेदार सब मेरे वफ़ादार हैं। तेरी चीख-चिल्लाहट से कुछ नहीं होने वाला। यहाँ वही होगा जो मैं चाहूँगा।

युद्ध विद्या में सीखे दांवपेचों का प्रयोग कर मस्तानी नाना साहिब की गिरफ्त से छूटकर भागने लगती है, पर नाना साहिब फुर्ती दिखाकर मस्तानी को कलाई से पकड़ लेता है। भागने के लिए ज़ोर लगा रही मस्तानी पेट के बल फर्श पर गिर पड़ती है। नाना साहिब मस्तानी के ऊपर जाकर लेट जाता है और उसके दोनों हाथ ज़मीन पर लगाकर वस्त्र फाड़ता हुआ मस्तानी को चूमना शुरू कर देता है। मस्तानी कभी दायें, कभी बायें अपना मुँह घुमाकर रोष प्रदर्शन करती हुई नाना साहिब के नीचे से निकलकर उठने का यत्न करती है, पर गर्भवती होने के कारण उठ नहीं पाती। मस्तानी जितना अपने हाथों को उठाने का प्रयत्न करती है, नाना साहिब उससे अधिक शक्ति से उसे दबोच लेता है।

नाना साहिब मस्तानी के घाघरे का नाड़ा तोड़कर घाघरे को जगह जगह से फाड़ डालता है। मस्तानी की बायीं बांह ढीली छोड़कर नाना साहिब अपने दायें हाथ से अपनी लांगड़ वाली धोती उतार कर जब हवा में उछाल कर दूर फेंकता है तो मस्तानी समझ जाती है कि अब उसकी इज्ज़त लूटने से कोई नहीं बचा सकता। मस्तानी को अपने पिता के द्वारा दी हुई अंगूठी और कहे हुए वचन स्मरण हो आते हैं, “मेरी पुत्री, तुम अब एक लड़की से एक सुंदर स्त्री बन गई हो। हो सकता है, तुम्हारी सुंदरता ही कभी तुम्हारी शत्रु बन जाए। बुंदेलों ने गर्व से सिर उठाकर ही जीना सीखा है। यह गर्व और शान सदैव बनी रहनी चाहिए। जान चली जाए, पर आन न जाए। ईश्वर न करे कि कभी ऐसा समय आ जाए कि आबरू को खतरा पैदा हो जाए तो मेरी पुत्री इस अंगूठी को चाटकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेना या शत्रु के होंठों को इसमें पड़ा हुआ बुरादा चटवा देना। व्यक्ति के प्राण निकलते अधिक देर नहीं लगेगी।

नाना साहिब मस्तानी के होंठों को अपने होंठो में जकड़कर जैसे ही चूमने लगता है तो मस्तानी की ऊँची आवाज़ में एक चीख निकलती है। नाना साहिब अपनी टांग अड़ाकर मस्तानी की टांगों के मध्य फासला पैदा करता हुआ मस्तानी की कमर की ओर देखता है तो उसको मस्तानी के गुप्त अंग में से बहते लहू से लथपथ पेट दिखाई देता है। वह एकदम घबरा उठता है। मस्तानी के हाथ छोड़कर वह बराबर बैठ जाता है। मस्तानी फुर्ती से तर्जनी में पहनी हुई अंगूठी मुँह से लगाती है और उसका ढक्कन दांतों से खोलकर सारा बुरादा अपनी जीभ से चाट लेती है। आँख झपकते ही मस्तानी के मुँह से खून रिसना प्रारंभ हो जाता है।

“नाना साहिब, तू हार गया और मैं जीत गई। मैंने तेरे नापाक इरादों को सफल नहीं होने दिया। देख, मैं भी अपने स्वामी के पास ही जा रही हूँ। तुम हमें कभी अलग नहीं कर सकते। मस्तानी, नाना साहिब की ओर देखकर मुस्कराती है।
नाना साहिब घबराहट में कभी मस्तानी की टांगों के बीच बहते रक्त को देखता है और कभी उसके मुँह से निकलती लहू की धार को। और फिर, मस्तानी का शरीर ठंडा पड़ जाता है। दम तोड़ चुकी मस्तानी को देखकर नाना साहिब के हाथ-पांव फूल जाते हैं। नाना साहिब, मस्तानी की नब्ज़ और साह रग टटोलकर देखता है। नब्ज़ और दिल की धड़कन रुक चुकी होती है। मस्तानी की खूबसूरत दिखने वाली बिल्लौरी आँखें खुली रह जाती है जो बेहद डरावनी लगती हैं। नाना साहिब भयभीत होकर अपनी हथेली से मस्तानी की पलकों को बंद कर देता है।

नाना साहिब उठकर बाहर जाने लगता है तो उसको कमरे के पर्दे के पीछ खड़ी मस्तानी की दासी के पैर दिखाई दे जाते हैं। नाना साहिब अपने कमरकसे में से कटार निकालता है और पर्दे के पीछे खड़ी दासी पर लगातार कई वार करता है। दासी की लाश फर्श पर गिर पड़ती है।

नाना साहिब बाहर जाकर पहरेदारों को आदेश देता है, “फौरन अप्पा स्वामी को बुलाकर लाओ।

ज्यों ही चिमाजी अप्पा का मस्तानी महल में प्रवेश होता है तो नाना साहिब उसके गले लगकर रोने लग जाता है, “अप्पा स्वामी, सब अनर्थ हो गया। 

चिमाजी अप्पा डर से कांपते हुए नाना साहिब को हौसला देता है, “सब्र कर। अपने आप को काबू में रख, नाना। अब तू बच्चा नहीं, पेशवा है पेशवा !

चिमाजी अप्पा और नाना साहिब तेज़ कदमों से मस्तानी की लाश के समीप जाते हैं। चिमाजी अप्पा मस्तानी को देखते ही समझ जाता है कि मस्तानी की मौत ज़हर खाने से हुई है, “हूँ ! तो इसका मतलब लोग सही कहते थे कि मस्तानी ज़हरीले हीरे वाली अंगूठी पहनती थी।

“मेरी समझ में  तो कुछ नहीं आ रहा, अप्पा। अब क्या होगा ? क्या कहेंगे लोगों को ? मुझे कोई माफ़ नहीं करेगा। कैसे छुपाएँगें इस गुनाह को ? और तो और, माताश्री और गोपिका को क्या बताएँगे ?

“नाना, हर बुरी घटना आदमी को कुछ न कुछ सिखाती है। एक सबक पल्ले बांध ले कि जीवन में अहम काम सोच-विचार कर करें ताकि करने के बाद सोचना न पड़े कि क्या करना है। जिगरा रख, मैं सब संभाल लेता हूँ।

चिमाजी अप्पा सारी दासियों को बुलाकर मोहरों से भरी थैलियाँ देता है और कोकण के किले कजरात की ओर उनको रवाना कर देता है। दासियाँ चुपचाप चली जाती हैं। एक दासी स्वर्णमुद्रा लेने से इन्कार कर देती है। चिमाजी अपनी म्यान में से तलवार बाहर निकालता है और उस दासी को मौत के घाट उतार देता है। सेवक मस्तानी की लाश को उठाकर बग्घी में डाल लेते हैं। चिमाजी अप्पा सेवकों की ओर मोहरों से भरी थैलियाँ फेंकता है, “मस्तानी के पहने सारे जेवर तुम्हारे। जल्दी करो।... ले जाओ इसको जंगल में और...। तुम्हें पता ही है कि क्या करना है ! मस्तानी की गंध तक नहीं आनी चाहिए किसी को। नामोनिशान मिटा दो।

दास बग्घी में मस्तानी की मृतक देह लेकर बाहर निकल जाते हैं। चिमाजी अप्पा मस्तानी की लाश के साथ ही मस्तानी महल से यह ख़बर भी बाहर निकलवा देता है कि बाजी राव का बिछोह न सहते हुए मस्तानी ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी। इस प्रकार, मस्तानी की मौत के रहस्य को सदैव के लिए मस्तानी महल में ही दफ़न कर दिया जाता है।

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