“हट जा पीछे... ” एक गंदी गाली देते हुए कहता है, “मुझे मूर्ख बनाती है ? अभी अभी तो वह घाट पर से छातियाँ छनकाती आई है। इतना शीघ्र कैसे सो सकती है ?“ नाना साहिब नशे के कारण फिर गिर पड़ता है।
“नाना साहिब ? यह क्या तमाशा लगा रखा है ?” चैबारे में से गरज़ती हुई मस्तानी की आवाज़ आती है।
“ओ ताई साहिबा !” नाना साहिब हथेलियाँ ज़मीन पर टिकाकर बाहों के सहारे उठकर बैठते हुए छज्जे पर जंगले में खड़ी मस्तानी को देखकर शैतानी मुस्कराहट चेहरे पर ले आता है।
मस्तानी आँख के इशारे से दासी से कहती है कि वह नाना साहिब को अतिथिगृह में ले जाए। नाना साहिब दासी के साथ अतिथिगृह में चला जाता है और वहाँ एकत्र सभी दासियों को वहाँ से चले जाने का आदेश देता है।
कुछ देर बाद नाना साहिब को अपनी ओर बढ़ती आ रही पायल की छनछन की आवाज़ सुनाई देती है। मस्तानी कमरे में प्रवेश करती है, “इस समय ऐसे आकर हंगामा करने का अर्थ ?”
नाना साहिब मस्तानी को सिर से पैरों तक देखता है। गर्भवती होने के कारण मस्तानी के बढ़े हुए पेट को देखते ही नाना साहिब सोचने लग जाता है, “नरबदा की सारी जागीर तो यह पहले ही अपने पुत्र कृष्ण सिनहा को बाबा से दिला चुकी है। अब यदि दूसरा बच्चा आ गया तो उसके लिए भी हिस्सा मांगेगी।... यूँ खैरात में हिस्से ही बांटते चले गए तो मुझे पीछे क्या मिलेगा ? मैं राख के ढेर पर पेशवाई करूँगा ?”
नाना साहिब को खामोश देखकर मस्तानी पुनः प्रश्न करती है, “आपने उत्तर नहीं दिया ? मैंने कुछ पूछा था?”
नाना साहिब डिब्बी में से थोड़ी-सी अफ़ीम की चुटकी भरकर जीभ से लगाता है और समीप पड़े शरबत को पीता हुआ बोलता है, “आपको घाट पर से आते देखा था। मेरे से रहा नहीं गया। बस, थोड़ा चाँद जैसे मुखड़े का दीदार करने आ गया। धर्म से, कलेजे को ठंड सी पड़ जाती है, आपको देखकर।”
“आपको पता है, नशे की हालत में आप क्या अनाप-शनाप बके जा रहे हैं।...उफ्फ ! मदिरा की कितनी दुर्गन्ध आ रही है आपमें से ।” मस्तानी उंगलियों से अपना नाक दबा लेती है।
नाना साहिब उठकर मस्तानी के करीब चला जाता है, “नशा कहाँ किया है ? मदहोश होने तो यहाँ आया हूँ। जो नशा आपकी बिल्लौरी आँखों में है न, गऊ की सौगंध, शराब तो उसके आगे कुछ भी नहीं है।”
मस्तानी अपने क्रोध का दबाने के लिए लम्बा सांस खींचती है, “आपको इस वक्त और ऐसी अवस्था में यहाँ नहीं आना चाहिए था। कलाई में गज़रा, आँखों में सुरमा, वस्त्रों पर इत्र और शराब में धुत्त हुआ शरीर...जैसे आप कोठे पर जाने के लिए तैयार होकर आए हो। भट््ट खानदान के चश्म चिरागों को ये चलन शोभा नहीं देते। माताश्री और ताई साहिबा को ख़बर है कि आप इस समय यहाँ आए हो ?”
“क्यों, मैं कोई नादान बच्चा हूँ जो हर काम उनको बता कर करूँ ? मैं तो मस्तानी जान ऐश करने आया हूँ तुम्हारे साथ। आ मिलकर दारू पीते हैं और तेरे नाजुक नरम शरीर को अपनी हड्डियों का सेक दूँ।...चल नहीं, मुजरा दिखा मुझे अपना सुंदरी !”
“बदतमीज़ ! अपनी जुबान को लगाम दे। सौतेली ही सही, पर मैं तेरी माँ लगती हूँ।”
“हूँ ! कहती है, माँ लगती हूँ। पर माँ तो नहीं है न। अगर लगना ही है तो ज़रा मेरे साथ लगकर देख। तेरी मचलती और सुलगती जवानी की आग को ठंडा न करके रख दूँ तो मुझे नाना साहिब न कहना। रंडी ! तू सिर्फ़ बाबा की रखैल थी, रखैल। एक उप-स्त्री। वह तो अब इस दुनिया में नहीं रहे। अब अपने बडील(पिता) की लौंडी पर मेरा हक़ वैसे ही है जैसे उनकी पेशवाई और सम्पति पर है। पुरुष की गरमी आम और जनानी की गरमी काम से ही मरती है। तुझे मर्द की ज़रूरत है। मुझे अपनी शारीरिक भूख पूरी करने के लिए तेरे जैसी हसीन कंचनी की आवश्यकता है। तू एक कंजरी है, कंजरी बनकर रह, री गश्ती !”
मस्तानी से यह सुनकर अपने आप पर नियंत्रण नहीं रह पाता और वह नाना साहिब के मुँह पर थप्पड़ दे मारती है, “हरगिज़ नहीं। मैं रखैल नहीं थी। मेरे साथ राव स्वामी ने बाकायदा विवाह करवाया था। वह भी एकबार नहीं, तीन बार। पहला मेरे माता-पिता के पास बुंदेलखंड में और फिर पाबल आकर मंदिर में मेरी मांग में सिंदूर भरा था। तीसरी बार तुम्हारी समूची बिरादरी के सामने। कुते !...तू क्या समझता है, यदि राव स्वामी नहीं रहे तो अब मैं तेरी सेजें सजाऊँगी ? हरामज़ादे ! तेरी इतनी हिम्मत कैसे पड़ी ?”
नाना साहिब से अपना इस प्रकार का निरादर सहन नहीं होता। वह मस्तानी को जाकर लिपट जाता है, “हिम्मत तो बिल्लो अभी तूने मेरी देखी नहीं।”
मस्तानी नाना साहिब की बाहों की जकड़ में से आज़ाद होने के लिए संघर्ष करती हुई शोर मचा देती है, “बचाओ... कोई है ?... बचाओ।”
नाना साहिब मस्तानी को ज़मीन पर लिटाकर उसके मुँह को अपना हाथ रखकर बंद कर देता है, “शोर मचाने का कोई लाभ नहीं। इस महल में तैनात पहरेदार सब मेरे वफ़ादार हैं। तेरी चीख-चिल्लाहट से कुछ नहीं होने वाला। यहाँ वही होगा जो मैं चाहूँगा।”
युद्ध विद्या में सीखे दांवपेचों का प्रयोग कर मस्तानी नाना साहिब की गिरफ्त से छूटकर भागने लगती है, पर नाना साहिब फुर्ती दिखाकर मस्तानी को कलाई से पकड़ लेता है। भागने के लिए ज़ोर लगा रही मस्तानी पेट के बल फर्श पर गिर पड़ती है। नाना साहिब मस्तानी के ऊपर जाकर लेट जाता है और उसके दोनों हाथ ज़मीन पर लगाकर वस्त्र फाड़ता हुआ मस्तानी को चूमना शुरू कर देता है। मस्तानी कभी दायें, कभी बायें अपना मुँह घुमाकर रोष प्रदर्शन करती हुई नाना साहिब के नीचे से निकलकर उठने का यत्न करती है, पर गर्भवती होने के कारण उठ नहीं पाती। मस्तानी जितना अपने हाथों को उठाने का प्रयत्न करती है, नाना साहिब उससे अधिक शक्ति से उसे दबोच लेता है।
नाना साहिब मस्तानी के घाघरे का नाड़ा तोड़कर घाघरे को जगह जगह से फाड़ डालता है। मस्तानी की बायीं बांह ढीली छोड़कर नाना साहिब अपने दायें हाथ से अपनी लांगड़ वाली धोती उतार कर जब हवा में उछाल कर दूर फेंकता है तो मस्तानी समझ जाती है कि अब उसकी इज्ज़त लूटने से कोई नहीं बचा सकता। मस्तानी को अपने पिता के द्वारा दी हुई अंगूठी और कहे हुए वचन स्मरण हो आते हैं, “मेरी पुत्री, तुम अब एक लड़की से एक सुंदर स्त्री बन गई हो। हो सकता है, तुम्हारी सुंदरता ही कभी तुम्हारी शत्रु बन जाए। बुंदेलों ने गर्व से सिर उठाकर ही जीना सीखा है। यह गर्व और शान सदैव बनी रहनी चाहिए। जान चली जाए, पर आन न जाए। ईश्वर न करे कि कभी ऐसा समय आ जाए कि आबरू को खतरा पैदा हो जाए तो मेरी पुत्री इस अंगूठी को चाटकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेना या शत्रु के होंठों को इसमें पड़ा हुआ बुरादा चटवा देना। व्यक्ति के प्राण निकलते अधिक देर नहीं लगेगी।”
नाना साहिब मस्तानी के होंठों को अपने होंठो में जकड़कर जैसे ही चूमने लगता है तो मस्तानी की ऊँची आवाज़ में एक चीख निकलती है। नाना साहिब अपनी टांग अड़ाकर मस्तानी की टांगों के मध्य फासला पैदा करता हुआ मस्तानी की कमर की ओर देखता है तो उसको मस्तानी के गुप्त अंग में से बहते लहू से लथपथ पेट दिखाई देता है। वह एकदम घबरा उठता है। मस्तानी के हाथ छोड़कर वह बराबर बैठ जाता है। मस्तानी फुर्ती से तर्जनी में पहनी हुई अंगूठी मुँह से लगाती है और उसका ढक्कन दांतों से खोलकर सारा बुरादा अपनी जीभ से चाट लेती है। आँख झपकते ही मस्तानी के मुँह से खून रिसना प्रारंभ हो जाता है।
“नाना साहिब, तू हार गया और मैं जीत गई। मैंने तेरे नापाक इरादों को सफल नहीं होने दिया। देख, मैं भी अपने स्वामी के पास ही जा रही हूँ। तुम हमें कभी अलग नहीं कर सकते।” मस्तानी, नाना साहिब की ओर देखकर मुस्कराती है।
नाना साहिब घबराहट में कभी मस्तानी की टांगों के बीच बहते रक्त को देखता है और कभी उसके मुँह से निकलती लहू की धार को। और फिर, मस्तानी का शरीर ठंडा पड़ जाता है। दम तोड़ चुकी मस्तानी को देखकर नाना साहिब के हाथ-पांव फूल जाते हैं। नाना साहिब, मस्तानी की नब्ज़ और साह रग टटोलकर देखता है। नब्ज़ और दिल की धड़कन रुक चुकी होती है। मस्तानी की खूबसूरत दिखने वाली बिल्लौरी आँखें खुली रह जाती है जो बेहद डरावनी लगती हैं। नाना साहिब भयभीत होकर अपनी हथेली से मस्तानी की पलकों को बंद कर देता है।
नाना साहिब उठकर बाहर जाने लगता है तो उसको कमरे के पर्दे के पीछ खड़ी मस्तानी की दासी के पैर दिखाई दे जाते हैं। नाना साहिब अपने कमरकसे में से कटार निकालता है और पर्दे के पीछे खड़ी दासी पर लगातार कई वार करता है। दासी की लाश फर्श पर गिर पड़ती है।
नाना साहिब बाहर जाकर पहरेदारों को आदेश देता है, “फौरन अप्पा स्वामी को बुलाकर लाओ।”
ज्यों ही चिमाजी अप्पा का मस्तानी महल में प्रवेश होता है तो नाना साहिब उसके गले लगकर रोने लग जाता है, “अप्पा स्वामी, सब अनर्थ हो गया। ”
चिमाजी अप्पा डर से कांपते हुए नाना साहिब को हौसला देता है, “सब्र कर। अपने आप को काबू में रख, नाना। अब तू बच्चा नहीं, पेशवा है पेशवा !”
चिमाजी अप्पा और नाना साहिब तेज़ कदमों से मस्तानी की लाश के समीप जाते हैं। चिमाजी अप्पा मस्तानी को देखते ही समझ जाता है कि मस्तानी की मौत ज़हर खाने से हुई है, “हूँ ! तो इसका मतलब लोग सही कहते थे कि मस्तानी ज़हरीले हीरे वाली अंगूठी पहनती थी।”
“मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा, अप्पा। अब क्या होगा ? क्या कहेंगे लोगों को ? मुझे कोई माफ़ नहीं करेगा। कैसे छुपाएँगें इस गुनाह को ? और तो और, माताश्री और गोपिका को क्या बताएँगे ?”
“नाना, हर बुरी घटना आदमी को कुछ न कुछ सिखाती है। एक सबक पल्ले बांध ले कि जीवन में अहम काम सोच-विचार कर करें ताकि करने के बाद सोचना न पड़े कि क्या करना है। जिगरा रख, मैं सब संभाल लेता हूँ।”
चिमाजी अप्पा सारी दासियों को बुलाकर मोहरों से भरी थैलियाँ देता है और कोकण के किले कजरात की ओर उनको रवाना कर देता है। दासियाँ चुपचाप चली जाती हैं। एक दासी स्वर्णमुद्रा लेने से इन्कार कर देती है। चिमाजी अपनी म्यान में से तलवार बाहर निकालता है और उस दासी को मौत के घाट उतार देता है। सेवक मस्तानी की लाश को उठाकर बग्घी में डाल लेते हैं। चिमाजी अप्पा सेवकों की ओर मोहरों से भरी थैलियाँ फेंकता है, “मस्तानी के पहने सारे जेवर तुम्हारे। जल्दी करो।... ले जाओ इसको जंगल में और...। तुम्हें पता ही है कि क्या करना है ! मस्तानी की गंध तक नहीं आनी चाहिए किसी को। नामोनिशान मिटा दो।”
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