तिल तिल मौत
बाजी राव को पतास आए एक महीना बीत चुका होता है। इस एक महीने के दौरान बाजी राव शराब को मुँह तक नहीं लगाता। बेशक उसका शरीर और रूह, दोनों बुरी तरह शराब की मांग करते हैं। परंतु बाजी राव अपनी प्रतिज्ञा पर डटा रहता है। उसने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया होता है कि मस्तानी का साथ पाने के लिए वह मरता मर जाएगा, पर शराब की ओर देखेगा तक नहीं। पीने की बात तो दूर की रही।
बाजी राव, परिवार, मस्तानी और छत्रपति सब से एक किस्म से अपने संबंध तोड़ कर एकांत में समय व्यतीत कर रहा होता है। बाजी राव जब से पतास आया है, तब से वह बीमार ही रहा है। उसे न तो नहाने धोने की होश है, न ही उसने कभी समय से ठीकप्रकार भोजन किया है। बस, दिन रात बिस्तर पर पड़ा रहता है। उसके हट्टे-कट्टे शरीर में दुर्बलता भी बहुत आ गई है।
उधर बाजी राव की अनुपस्थिति में अप्पा की सिपहसालारी के अधीन मराठों की कुछेक दुश्मनों से झड़पें होती हैं जिनमें मराठों को सफलता तो क्या मिलनी थी, अपितु हार का मुँह देखना पड़ा और काफ़ी हानि भी हुई।
इस प्रकार बाजी राव को पतास में आए हुए दो माह बीत जाते हैं। चिमाजी अप्पा अपने बड़े भाई पेशवा बाजी राव से आकर मिलता है। स्वास्थ्य खराब रहने के कारण बाजी राव अब तक बहुत बुरी हालत में होता है और चिमाजी अप्पा को गले लगाते समय उसके हाथ कांप रहे होते हैं। बाजी राव स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होने में भी असमर्थ होता है। बाजी राव को चक्कर आने लगते हैं। वह चक्कर खाकर बिस्तर पर ही गिर पड़ता है। चिमाजी अप्पा अपने हाथों का सहारा देकर बाजी राव को बिठाता है, “यह क्या भाऊ ? क्या हालत बना ली है अपनी ?“
“तेरे सामने ही है...।“ बाजी राव के मुख से हकलाती हुई बड़ी कठिनाई से आवाज़ निकलती है।
“वही तो देख रहा हूँ। न आवाज़ में शेरों वाली गर्जन, न घोड़े जैसी चाल और न ही हाथयों को पीछे छोड़ने वाली देह। आप अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखते ?“
“खुद अपना ख़याल भी कभी कोई रख सका है, अप्पा मेरे भाई ? मस्तानी मेरा ख़याल रखती थी। उसको तुम सबने मुझसे दूर कर दिया है।... भगवान जाने, तुम किस जन्म का वैर ले रहे हो मेरे से ? तुम्हें तो पता है, मैं मस्तानी के बिना नहीं रह सकता। मर जाऊँगा। मुझे मारकर ही सब सांस लोगे।“ इतना कहते ही बाजी राव को खदसा लग जाता है और फिर उसके शरीर में एकदम कंपन होने लगता है। सभी अंग पैर तेज़ तेज़ कांपने लग जाते हैं और थरथराता हुआ बाजी राव मूर्छित हो जाता है।
“भाऊ!...भाऊ!!...भाऊ !!!“ चिमाजी अप्पा घबराकर बाजी राव को लिटा देता है और वैद को बुलाता है, “वैद जी ?... पहरेदार ... शीघ्र, वैद जी को बुलाओ...।“
वैद आकर मूर्छित पड़े बाजी राव की नाड़ी टटोलकर उसके मुँह में काढ़ा डालता है। उसके बाद बाजी राव के हाथों पैरों की कुछ नाडि़यों को विशेष ढंग से दबाता है। सेवक को बाजी राव की हथेलियों और पांव के तलुओं पर तेल की मालिश करने को कहता है।
“शीघ्र ही, होश आ जाएगा।“ कहकर वैद चिमाजी अप्पा को आरामगाह में से बाहर आने का संकेत करता है।
एकांत में जाकर वैद इधर उधर देखता है और अप्पा को सम्बोधित होकर बताता है, “अप्पा स्वामी, श्रीमंत सरकार बहुत लम्बे समय से अधिक शराब का सेवन करते रहे हैं। पेशवा जी के रक्त में शराब बुरी तरह मिलकर घर कर चुकी है। उनकी देह इस नशे की आदी हो चुकी है। नशा किसी भी प्रकार का हो, उसको धीरे धीरे त्यागा जाता है। पहले उसकी मात्रा को कम किया जाता है, फिर धीरे धीरे तिलांजलि दी जाती है। एकदम मदिरा को छोड़ने से हानि होती है, जो आप देख ही रहे हैं। इस प्रकार अचानक शराब छोड़ने के कारण मौत भी हो सकती है। लेकिन मैं काढ़ों में पेशवा जी को मदिरा मिलाकर पिलाता रहूँगा ताकि इनके शरीर को अधिक नुकसान न हो।“
“अच्छा तो यह सब शराब छोड़ने का परिणाम है।“
“शराब छोड़ने का नहीं, अचानक एकदम छोड़ने का नतीजा है। लम्बा अरसा शराब पीते रहने के कारण उनकी स्मरणशक्ति कमज़ोर हो गई है और वह अक्सर बात करते करते भूल जाते हैं। उनके बाल भी झड़ने लग पड़े हैं। कई बार तो उनकी आँखों के आगे अँधेरा भी आ जाता है। ये कोई बहुत अच्छे लक्षण नहीं हैं। यदि उनका सही इलाज और पूरा खयाल नहीं रखा गया तो वह अधिक समय जिंदा नहीं रह सकेंगे। वैसे ये हद से ज्यादा शराब पीने के कारण अधरंग होने के आसार हैं। पूरे धड़ के एक हिस्से में लकवा भी मार सकता है। बहुत गंभीर अवस्था मंे पहुँच गए हैं श्रीमंत सरकार। शराब की लत और जवानी की हवस एकदम से छोड़ दी जाए तो व्यक्ति मरने के किनारे पहुँच जाता है। आपने तो दोनों लतें इकट्ठी ही छुड़वा दी हैं। बहुत बुरी बात है। इसके परिणाम भयानक निकल सकते हैं। अब तो चैबीस घंटे इनकी निगरानी रखने की आवश्यकता है, अप्पा स्वामी।“
वैद की ताकीद सुनकर अप्पा संजीदा हो जाता है, “शुक्रिया वैद जी, मैं भाऊ की देखरेख का प्रबंध करता हूँ।“
अप्पा अंदर जाकर बाजी राव के सिरहाने बैठ जाता है। कुछ समय बाद बाजी राव की चेतना लौटती है और वह थोड़ी-सी आँखें खोलकर अप्पा की ओर देखता है, “अभी तक यहीं हो अप्पा ?“
अप्पा अपने आसन से उठकर बाजी राव के बिस्तर पर जा बैठता है और बाजी राव का हाथ पकड़ लेता है, “भाऊ, मुझसे आपकी यह हालत देखी नहीं जाती।“
“मैंने तुमसे कहा था न कि मैं मस्तानी के बिना नहीं रह सकता। अब तो देख लो मैंने शराब भी छोड़ दी है। अब तो उसको मेरे पास भेज दो ? पत्नी से बढि़या पति की दूसरा कोई देखरेख नहीं कर सकता। अप्पा, कृपा करक मेरी पत्नी को मेरे पास भेज दो। मुझे मेरी अद्र्धांगिनी की सख्त ज़रूरत है।“ बाजी राव गिड़गिड़ाने लग जाता है।
“चिंता न करो भाऊ। मैं करता हूँ कुछ। आप थोड़े स्वस्थ हो कर खरागौन (ज्ञंसूं ज्ञींतमहंवदए ज्ींदमए डंींतंेीजतंए प्दकपंण् 145 ज्ञउ दृक्पेजंदबम तिवउ ज्ञंसूं जव च्नदम) आ जाओ। आपकी पत्नी को मैं वहीं लेकर आता हूँ। मैं वचन देता हूँ।“
अप्पा की बात सुनकर बाजी राव की आँखों में चमक आ जाती है और वह उठकर बैठने का यत्न करता है। अप्पा उसको कंधों से पकड़कर वापस लिटा देता है, “नहीं, अब आप सो जाओ। आपको आराम की सख्त ज़रूरत है। मैं भी चलता हूँ। चैथ एकत्र करने जाना है।“
चिमाजी अप्पा पूणे अपने घर मंे जाकर सबको बाजी राव की बिगड़ती हालत से परिचित करवाता है और बाजी राव के बड़े पुत्र नाना साहिब के संग परामर्श करता है, “नाना, समझ में नहीं आता कि क्या करूँ ? मैं तो वचन भी दे आया हूँ और मस्तानी को भी भाऊ के पास नहीं भेज सकता। भाऊ की हालत बहुत खराब है। निगरानी और सेवा-टहल के लिए कोई घर का व्यक्ति ही चाहिए।“
“अप्पा चाचा, मुझे खुलकर विस्तार से बताओ कि क्या वार्तालाप हुआ था आपका बाबा के साथ ?“
“भाऊ ने एक ही रट पकड़ रखी थी। मस्तानी... मस्तानी... मस्तानी। बार बार कह रहा था कि मुझे पत्नी की ज़रूरत है। मेरी पत्नी को मेरे पास भेज दो।“
ओट मंे खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही राधा बाई भी बाहर निकलकर आ जाती है, “पत्नी कहता है तो काशी को भेज देते हैं। वह भी तो पत्नी ही है। बल्कि पहली और असली पत्नी। हो सकता है अप्पा तुझे सुनने में भ्रम हुआ हो।“
“नहीं आई। मैं कोई मूर्ख हूँ ? भाऊ, मस्तानी को ही याद कर रह था। उस पगले को मस्तानी का भुस पड़ा हुआ है। काशी वाहिनी साहिबा के विषय में तो उसने पूछा तक नहीं।“ अप्पा अपनी बात स्पष्ट करता है।
राधा बाई अपने चेहरे पर शैतानी मुस्कान लाती है, “यह तो हम ही जानते हैं। तू ऐसा कर काशी को बाजी राव के पास भेज दे और साथ में छोटे लल्ले(पुत्र) जनार्धन को भी। बाजी राव का चिŸा बहला रहेगा। उसने पत्नी कहा है। यही क्या कम है, मस्तानी या काशी बाई ? तू कह देना, भ्रम हो गया था। इस प्रकार कुछ दिन मामला टला रहेगा। और हाँ, मस्तानी पर पहरा और कड़ा कर दो। जब काशी के बाजी राव के पास जाने का पता चलेगा तो हो सकता है, वह कलमुँही भी उसके पास जाने की कोशिश करे।“
“लो, ऐसे कैसे भाग जाएगी ? टखने न तोड़ दूँगा। एकबार भाग गई थी मेरी कैद में से। अब नहीं इस जंगली कबूतरी को उड़ने दूँगा मैं। पहरा तो मस्तानी के महल का मैंने पहले ही सख्त किया हुआ है। भनवारा महल मंे परिंदा भी पर नहीं मार सकता। वैसे इस तरकीब के बारे में तो माता श्री मैंने सोचा ही नहीं था। हम काशी वाहिनी साहिबा को ही भेजते हैं।“ चिमाजी अप्पा और नाना साहिब राधा बाई की योजना से सहमत हो जाते हैं।
राधा बाई, बहू काशी बाई और पोत्र जनार्धन को तैयार करके खारगौन बाजी राव के पास भेज देती है। बाजी राव पालकी देखकर एकबार तो प्रसन्न हो जाता है और बिस्तर पर से उठकर बैठ जाता है। जब पालकी में से वह काशी बाई को गोदी मंे जनार्धन को उठाये उतरते देखता है तो फिर से बिस्तर पर धड़ाम से गिर पड़ता है काशी बाई करीब जाकर बाजी राव को उठाती है लेकिन वह मूर्छित हुआ पड़ा होता है। वैद तुरंत आकर बाजी राव को उपचार करना आरंभ कर देता हैं। बाजी राव बेहोशी की हालत में बड़बड़ा रहा होता है, “मस्तानी...मस्तानी...मस्तानी।“
मस्तानी का नाम सुनते ही काशी बाई के तन बदन में आग लग जाती है। वह ब्राह्मणों को बुलाती है, “पंडित जी, मुझे लगता है, मेरी सौतन मस्तानी ने मेरे पति पर काला जादू किया हुआ है। बुरे समय को टालने के लिए मैं हवन करवाना चाहती हूँ।“
पंडित अग्नि जलाकर महामृत्युंजै का जाप प्रारंभ कर देते हैं। काशी बाई दो दिन बाजी राव के सिरहाने अपने पुत्र को लेकर दिन रात बैठी रहती है। कभी कभार बीच बीच में बाजी राव को होश आता है और कभी वह पुनः मूर्छित हो जाता है।
अचानक बाजी राव की तबीयत इतनी अधिक बिगड़ जाती है कि वह कराहते हुए ऐडि़याँ रगड़ने लग पड़ता है। वैद, बाजी राव को काढ़ा पिलाने का यत्न करता है। परंतु बाजी राव पिचकारी मार कर बाहर निकाल देता है। अंत में उसकी आँखें खुली रह जाती है और पलकें भी झपकना बंद हो जाती हैं। वैद नब्ज़ टटोलकर देखता है। बाजी राव के दिल की धड़कन रुक चुकी होती है। वैद आँखों पर हाथ रखकर बाजी राव की पलकें बंद कर देता है और उसकी मृत्यु की घोषणा कर देता है।
काशी बाई, बाजी राव को अडोल और गहरी निद्रा में सोया देखती है। चिर निद्रा ! वह नींद जिसमें से पेशवा कभी नहीं जागेगा। काशी बाई अपनी चूडि़याँ तोड़कर विलाप प्रारंभ कर देती है।
संभाजी द्वारा आक्रमण करने के कारण मानाजी ने बाजी राव से समर्थन मांगा था। बाजी राव ने अपना स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण अपने बेटे नाना साहिब को मानाजी की सहायता के लिए भेज दिया था। नाना साहिब और मानाजी की फौजों ने संभाजी को रणभूमि मंें से भगा दिया था। उसके पश्चात नाना साहिब और चिमाजी अप्पा रेवपाड़ा पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की योजनाएँ बना ही रहे होते हैं कि उन्हंे सरदा के किनारे 28 अपै्रल 1740 ई. को बाजी राव की मृत्यु की सूचना मिलती है। सूचना मिलते ही सारा परिवार खारगौन पहुँच जाता है और शाही सम्मान के साथ बाजी राव की लाश को रावरखेड़ी ले जाया जाता है।
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