Tuesday, 3 November 2015

मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजी राव (प्रथम) और नर्तकी मस्तानी 
की प्रेमगाथा पर केन्द्रित एक ऐतिहासिक उपन्यास 

मस्तानी


बलराज सिंह सिद्धू



समर्पण
दरकते रिश्तों का दर्द और संताप झेल रहे उन सभी को
जिन्हें रूह के हमउम्र साथी नहीं मिले...



Index Page

अनुक्रम

अध्याय 1: बुंदेलखंड का किला
अध्याय 2: बिल्लौरी आँखें
अध्याय 3: मुजरा
अध्याय 4: काम और मुहब्बत
अध्याय 5: प्रस्ताव
अध्याय 6: कूच, पड़ाव और काम
अध्याय 7: अतीत का साया
अध्याय 8: सुहाग सेज
अध्याय 9: गृह प्रवेश
अध्याय 10: फैसला
अध्याय 11: सोलह कला और सोलह शिंगार
अध्याय 12: अंगूठी
अध्याय 13: झड़प
अध्याय 14: हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुल्क
अध्याय 15: शाही कल्लोल
अध्याय 16: संग्राम
अध्याय 17: कचेहरी
अध्याय 18: शनिवार वाड़ा
अध्याय 19: प्रेम पौधा
अध्याय 20: जंगनामा
अध्याय 21: कशमकश
अध्याय 22: छत्रपति का दरबार
अध्याय 23: तिल तिल मौत
अध्याय 24: अशुभ समाचार
अध्याय 25: पैगाम
अध्याय 26: दफ़न राज़
अंतिका

अध्याय-1



बुंदेलखंड का किला


विशेष नोट: इस उपन्यास की मांग के अनुसार मैंने ऐतिहासिक घटनाओं की देसी तारीखों (संवत सन) का उल्लेख करने की अपेक्षा अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी ईसवी का प्रयोग किया है। कुछ स्थानों पर मेरे पात्र भी वही प्रयोग करते हैं। इसको तकनीकी दोष न माना जाए। ऐसा मैंने देसी तारीखें उपलब्ध न होने के कारण और ऐतिहासिक ब्योरों के काल को सही दर्शाने के लिए किया है। जिसको आवश्यकता हो, वह स्वयं इन तारीखों से देसी तारीखों का अनुमान लगा सकता है। - उपन्यासकार।


बुंदेलखंड मध्य भारत में कमल के फूलों से लबालब भरी और कोसों दूर तक फैली बेलाताल झील के किनारे स्थिति राजपूतों का रियासती गढ़ है, जैतपुर (वर्तमान समय में ज़िला लक्ष्शीसराय, बिहार) ऋषि जयंत के नाम पर बसे जैतपुर के ऐन बीच पहाड़ी पर बना शाही किला दूर से ही नज़र आ जाता है। यह किला बुंदेल राजपूतों की आन, आबरू, बहादुरी, शक्ति और बलिदान का गवाह है। इस ऐतिहासिक किले ने बहुत सारा इतिहास अपनी कोख में संभालकर रखा हुआ है।

अध्याय-2


बिल्लौरी आँखें



जंग जीतने के उपरांत पेशवा बाजी राव, महाराजा छत्रशाल की सेना के साथ जैतपुर के किले में प्रवेश करता है। महाराज छत्रसाल आरती उतारने के पश्चात बाजी राव का केसर, चंदन और चावलों के साथ विजय तिलक लगाकर स्वागत करता है, “पेशवा जी, विजय मुबारक हो।...मैं किस मुँह से आपका धन्यवाद करूँ। मेरे पास तो आपका आभार प्रकट करने के लिए भी शब्द नहीं हैं।... यदि आप सही समय पर न पहुँचते तो हम सब मारे जाते या कै़द कर लिए जाते। मैं आपका यह अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा।“

अध्याय-3


मुजरा


संध्या समय पेशवा बाजी राव और उसके सरदारों के लिए महाराजा छत्रसाल द्वारा भोजन की विशेष दावत दी जाती है। भोजन के पूर्व मनोरंजन के लिए नृत्य-गान होता है। शराब और अनेक प्रकार के शर्बत वितरित किए जाते हैं। दारू पीता हुआ बाजी राव काफ़ी मदहोश हो जाता है। महाराजा छत्रसाल बाजी राव की खूब खातिरदारी करता है। पेशवा बाजी राव के लिए विशेष रूप से विभिन्न प्रकार के पकवान बनवाये जाते हैं।

अध्याय-4


काम और मुहब्बत

बारिश हो, आँधी हो, बाजी राव सदैव शुरू से ही तड़के जल्दी उठकर बिना नागा कसरत और युद्ध अभ्यास करने का अभ्यस्त रहा है। लेकिन मुजरे से अगली सवेर उसका कुछ भी करने को मन नहीं करता। न उसको भूख लगती है और न ही प्यास। स्नान करने के बाद तैयार होते हुए उससे तो अपने गले में मराठों के प्रतीक चिह्न वाली मोतियों की मालायें भी ठीक से सब की सब पहनी नहीं जातीं। यहाँ तक कि बाजी राव को पूरे वस्त्र पहनने की भी होश नहीं रहती। वह केवल कमर पर लांगड़वाली लुंगी बांधकर मुँह फाड़े एकटक देखता हुआ मस्तानी के बारे में सोचता गुमसुम, चुप्पा बनकर स्थिर बैठा रहता है। मस्तानी के ख़यालों में खोये हुए को न अपने आसपास की होश होती है और न ही वह किसी के साथ कोई बातचीत करता है।

अध्याय-5


प्रस्ताव

तीसरे दिन दोपहर को महाराजा छत्रसाल से बाजी राव के लिए बुलावा आ जाता है। संयोगवश उस दिन गणेश चतुर्थी होती है। महराजा छत्रसाल ने अपने दरबार में एक विशेष समारोह का आयोजन कर रखा होता है। पेशवा बाजी राव के खादिम, उसके सिर पर शाही कलगी जड़ा सुनहरी और सफ़ेद फेटा (मराठों की पेशवाई पगड़ी) सजा देते हैं। हीरे-मातियों की मालायें और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहनकर बाजी राव अपने सरदारों और अहलकारों के साथ महाराजा छत्रसाल के दरबार में चला जाता है।

अध्याय-6

कूच, पड़ाव और काम

बुंदेलखंड से कूच करके सबसे आगे बाजी राव अपने घोड़े पर जा रहा होता है और उसके पीछे हाथी पर पालकी में मस्तानी जा रही होती है। मस्तानी को जब भी अवसर मिलता है, वह पर्दा हटाकर बाजी राव को देखती हुई अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने लग जाती है। मस्तानी की अल्हड़ अवस्था से ही यह इच्छा रही थी कि उसका जीवनसाथी कोई महान योद्धा हो। पर बाजी राव जैसे चोटी के सूरमे के जीवन में प्रवेश करने के बारे में तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। बाजी राव को देखकर मस्तानी की भूख उतर जाती है। पालकी में सवार मस्तानी के रोम रोम में शरारती गुदगुदी होने लगती है। वह पर्दे की जाली में से बाजी राव को टकटकी लगाकर निहारती हुई मुस्कारने लग पड़ती है।

अध्याय-7


        अतीत का साया

बाजी राव की तरफ से पूणे के अपने महल में लश्कर के पहुँचने का पैगाम भेज दिया जाता है। इस संदेश में बाजी राव की ओर से गोलमोल ढंग से मस्तानी की मौजूदगी को लेकर इशारा तो किया जाता है, पर खुलकर मस्तानी के साथ हुए उसके विवाह के संदर्भ में कोई खुलासा या वर्णन नहीं किया जाता।

अध्याय-8

सुहाग सेज

अगली सुबह बाजी राव नदी में स्नान करके मस्तानी के साथ करीब के मंदिर में जाता है और पूजा करने के पश्चात वहीं मस्तानी की मांग में सिंदूर भर देता है। उसके उपरांत बाजी राव मस्तानी को अपने तम्बू में लौट जाने के लिए कहकर लश्कर का निरीक्षण करने चला जाता है।

अध्याय-9

गृह प्रवेश

ज्योतिषियों द्वारा घोषित की गई शुभ घड़ी में बाजी राव अपने लश्कर सहित पूणे में प्रवेश होकर ससवाद अपने गृह स्थान में पहुँच जाता है। महल के प्रांगण में बाजी राव के घोड़े, पीछे हाथी पर आ रही मस्तानी की पालकी का उतारा होता है। बेहद कीमती हीरे, जवाहरात, गहने और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहने जब मस्तानी पालकी में से बाहर निकलती है तो ऐसा लगता है मानो अँधेरे में किसी ने लाखों करोड़ों चहुंमुखी दीये जला दिए हों। एकबार तो सारे पूना के मराठा साँस रोककर मस्तानी के हुस्न को एकटक देखते रह जाते हैं।

अध्याय-10

फैसला

बाजी राव और मस्तानी को यह विवाहित जीवन की खुशियाँ अधिक देर नसीब नहीं होतीं। बाजी राव के बेटे नाना साहिब की पूर्व में तय की गई शादी निकट आ जाती है।

विवाह की तैयारियों में समस्त परिवार का व्यवहार मस्तानी के साथ यकायक बदल जाता है। काशी बाई का व्यवहार तो पहले दिन से ही मस्तानी के प्रति ईष्र्यालू और झगड़ालू ही रहा होता है। काशी बाई अपने पुत्र नाना साहिब को भड़का कर बाजी राव के साथ लड़वा देती है।

अध्याय-11

सोलह कला और सोलह शिंगार

नाना साहिब के विवाह के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। बाजी राव और मस्तानी कभी कभार कोथरूड़ से ससवाद भी आने लग जाते हैं। रफ्ता रफ्ता मस्तानी बाजी राव के परिवार में फिर से घुलने मिलने लग जाती है। दोनों ननदें और नाना साहिब की पत्नी गोपिका बाई के साथ मस्तानी की बहुत बनने लग जाती है। तीनों ही सहेलियों की भाँति सारा दिन घर और बागों में खेलतीं, हँसी-मजाक करतीं, झूले झूलतीं रहती हैं। इसके अलावा महिलाओं वाले काम जैसे सिलाई, कढ़ाई, खाना पकाना और अन्य घरेलू कामों में भी मस्तानी उनका हाथ बंटाती रहती है। फुर्सत के समय सभी लड़कियों को एकत्र करके मस्तानी गीत गाकर सुनाती है या नृत्य करके उनका मनोरंजन भी कर देती है।

Monday, 2 November 2015

अध्याय-12

अंगूठी

मस्तानी आए दिन नये वस्त्र, नये गहने पहने होती है। हर बार जब वह ससवाद आती तो सिर से पैरों तक का हार-शिंगार और वस्त्र उसके सदैव बदले हुए होते हैं। यदि कुछ नहीं बदलता तो मस्तानी के बायें हाथ की तर्जनी में पहनी हीरे की अंगूठी कभी नहीं बदलती। हर बार वही अंगूठी देखकर एक दिन मस्तानी की ननद भिहू बाई पूछ लेती है, “वाहिनी साहिबा (भाभी), आपके बाकी तो सब जेवर नित्य बदले हुए होते हैं परंतु आप कभी यह अंगूठी नहीं उतारते।“

अध्याय-13

झड़प


मस्तानी को बाजी राव के जीवन में आए दो वर्ष का समय बीत चुका होता है। 1730 ई. के मध्य में बाजी राव अहमदाबाद की जंग में उलझा होने के कारण मुगलों के साथ भिड़ने के लिए चला जाता है और पीछे मस्तानी अकेली रह जाती है। दिन रात वह बाजी राव की यादों में खोई रहती है।

अध्याय-14

                                                                                                                                                                                                   
हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुलक
हैदराबाद के इर्द गिर्द वाले क्षेत्र में गोलकुंडा (Shephered’s Hill) पर  624 ई. से 1075 ई. तक चालुक्या वंशियों ने राज किया था। 1158 ईसवी के बाद कल्याण के चालुक्या का साम्राज्य टूटकर बिखर गया। उनके एक भाग में से वारंगल के काकतिया शासक हुए थे। दूसरे भाग में से द्वारसमुंदर के होएसल, तीसरे देवगिरी के यादव। फिर 1190 ई. से 1310 ई0 तक काकतिया वंश, वारांगल (वर्तमान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से 148 किलोमीटर उŸार-पूर्व की ओर) से सिंहासन पर बैठकर राज करते रहे। काकतिया को अपना राज्य कायम रखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था।

अध्याय-15

शाही कल्लोल


मस्तानी और बाजी राव का प्रेम नीलगगन की उड़ानें भरने लग जाता है।... छोटी-बड़ी जंगें होती रहती हैं। मस्तानी बाजी राव के साथ साधारण सैनिकों की तरह युद्ध में शामिल होती रहती है। देखते ही देखते, मस्तानी मराठा इतिहास के पृष्ठों पर बादल की भाँति छा जाती है। बाजी राव और मस्तानी का इश्क किसी के मुँह से नगमा बनकर गूंजता है और किसी के अधरों पर चुगली बनकर नाचता है। किंतु दिन आनंदपूर्वक व्यतीत होते रहते हैं।

अध्याय-16

संग्राम


चिमाजी अप्पा अपने मन-मस्तिष्क में मस्तानी के विरुद्ध एक गुप्त जंग का बिगुल बजा देता है और मस्तानी को तंग करने के लिए राजनीतिक चालंे चलनी प्रारंभ कर देता है। सर्वप्रथम वह मस्तानी के विरुद्ध पाँचवे छत्रपति महाराजा शाह के पास जाकर उनके कान भरने का प्रयत्न करता है, “देखो महाराज, हमारे योद्धे को क्या हो गया है ? बस एक मामूली सी नर्तकी ने उसको अपनी उंगलियों के इशारों पर नचा रखा है। यदि हमने अवसर को न संभाला तो हमारा मराठों का भविष्य बहुत धुंधला हो जाएगा।“

अध्याय-17

कचेहरी


काशी बाई के पास चंद दिन रहकर उसको शारीरिक संबंधों से संतुष्ट करने के बाद बाजी राव मस्तानी के पास चला जाता है। मस्तानी के साथ कुछ रातें व्यतीत करने के पश्चात वह काशी के पास अपनी उपस्थिति दजऱ् करवाने आ जाता। इस प्रकार, कुछ अरसे बाद बाजी राव ससवाद में आकर काशी को शांत करके पुनः मस्तानी के पास रहने के लिए कोथरूड़ चला जाता। बाजी राव के जीवन के दिन और रातें काशी और मस्तानी के बीच बंटने लग जाती हैं। वह किश्ती की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे सफ़र करता हुआ अपने परिवार और मस्तानी के साथ अपना रिश्ता निभाते हुत अपने जीवन में संतुलन बनाये रखने का यत्न करता रहता है।

अध्याय-18

शनिवार वाड़ा


बाजी राव और मस्तानी का प्रेम कोथरूड़ बाग (पूणे का एक इलाका) के एकांतमयी वातावरण में पलने लग पड़ता है। बाजी राव दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासी मंे डूबा रहने लगता है। दिन भर मस्तानी, बाजी राव के साथ घुड़सवारी और युद्ध अभ्यास करती रहती है। कभी कभी तो बाजी राव के संग शनिवार वाड़ा में शिकार खेलने भी चली जाती है। संध्या समय वह बाजी राव के बराबर बैठकर मदिरापान करती, नृत्य दिखलाती और अपनी सुरीली आवाज़ में गीत-ग़ज़लें भी सुनाती है। मस्तानी बड़ी निपुणता से अनेक साज बजाना जानती है। शाइरी करने के शौक के कारण मस्तानी ने पढ़ना-लिखना भी सीखा हुआ है। वह अनेक भाषाओं का ज्ञान रखती है। रात्रि में नृत्य करते हुए मस्तानी को बाजी राव अपनी बाहों में उठाकर उसके होंठों से अपने होंठ जब जोड़ लेता है तो यूँ लगता है मानो कृष्ण बंसरी बजा रहे हों। मस्तानी भी बाजी राव के साथ इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाती है जैसे चंदन के वृक्ष से नाग लिपटा होता है।

Sunday, 1 November 2015

अध्याय-19

प्रेम पौधा
मुगल बादशाह को जब सरबुलंद खान द्वारा 1730 ई. में बाजी राव के साथ चैथ और सरदेशमुखी को लेकर की गई संधि के बारे में पता चला तो उसको यह फैसला पसंद नहीं आया। बादशाह ने सरबुलंद खान को पद से हटाकर जोधपुर के अजीत सिंह के पुत्र अभय सिंह को जिम्मेदारी सौंप दी। परंतु अभय सिंह को भी बाजी राव के साथ समझौता करना पड़ा, क्योंकि वह अकेला बहुत सारे खुदमुख्तारों के साथ नहीं निपट सकता था। ये समझौते मराठा सेनापति तिंबर्क दाबड़े को स्वीकार नहीं थे। वह गुजरात के सब मामलों को वसूलने का अपना हक़ समझता था। वह पहले से ही पेशवा के साथ खार खाता था। उसका कारण यह था कि छत्रपति के बाद दूसरा बड़ा पद पेशवा का होने के कारण वह बाजी राव के साथ उसकी योग्यता के कारण घृणा करता था। दूसरी ओर पेशवा पुराने लोगों की अपेक्षा होलकर, शिंदे और पवार जैसे नौजवानों को पदों पर आसीन करके प्रसन्न होता था।