प्रस्ताव
तीसरे दिन दोपहर को महाराजा छत्रसाल से बाजी राव के लिए बुलावा आ जाता है। संयोगवश उस दिन गणेश चतुर्थी होती है। महराजा छत्रसाल ने अपने दरबार में एक विशेष समारोह का आयोजन कर रखा होता है। पेशवा बाजी राव के खादिम, उसके सिर पर शाही कलगी जड़ा सुनहरी और सफ़ेद फेटा (मराठों की पेशवाई पगड़ी) सजा देते हैं। हीरे-मातियों की मालायें और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहनकर बाजी राव अपने सरदारों और अहलकारों के साथ महाराजा छत्रसाल के दरबार में चला जाता है।
दरबार में महाराजा छत्रसाल के मंत्रिमंडल, अमले और अहलकारों के अलावा छत्रसाल की उन्नीस रानियाँ, चैंतीस रखैलें और अनेक पुत्र, पुत्रियाँ (लगभग पचास-साठ) भी उपस्थिति होती हैं। साधारणतया, महिलायें परंपरा के अनुसार पर्दे के पीछे रहकर ही दरबार की कार्रवाई में भागीदारी निभाती हैं। लेकिन बाजी राव को देखकर हैरानी होती हैं कि महाराजा छत्रसाल के दरबार में महिलायें पर्दा किए बग़ैर मर्दों के बराबर स्थान ग्रहण करती हैं। पेशवा बाजी राव, मस्तानी कुंवर को टकटकी लगाकर बिना पलकें झपकाये देखता रहता है और पलभर के लिए भी उसके चेहरे से नज़रें दूर नहीं हटाता।
मस्तानी कुंवर को उसकी युद्ध में दिखाई बहादुरी के लिए सम्मानित किया जाने की रस्म शुरू होती है तो मस्तानी शहजादा जगतराज की पत्नी जैत कंवर को बांह से पकड़कर कर सामने कर देती है, “काकाजू, मान-सम्मान प्राप्त करने का तो भाबीसा का असल हक है। इन्होंने ही भाईसा को जंगल में से खोज था।“
महाराजा छत्रसाल मुस्कराता हुआ अपने सिंहासन से उठता है और एक अनमोल हार अपनी बहू जैत कंवर के गले में डालकर घोषणा करता है, “बेटी जैत कुंवर, समूचा बुंदेलखंड सदैव तेरा ऋणी रहेगा और आज से छह लाख की जलालपुर (Jalalpur is a city and a municipal board in Ambedkar Nagar district in the Indian State of Uttar Pradesh) और दरसोधा की जागीर तुझे इनाम के तौर पर प्रदान की जाती है।“
समूचे दरबार में उल्लास की एक लहर दौड़ जाती है। बहूसा पदमावती कुंवर (छोटी रानी और जैत कुंवर की सगी सास) की आँखें खुशी से नम हो जाती हैं। मस्तानी को भी एक बेहतरीन शमशीर और गहनों से सम्मानित किया जाता है।
आवश्यक कार्रवाइयों को समाप्त करने के पश्चात महाराजा छत्रसाल बाजी राव से सम्बोधित होता है, “पेशवा जी, आओ अब हम बुंदेल-मराठा संधि के अहदनामे का मामला भी निपटा लें।“
बाजी राव, महाराजा छत्रसाल के साथ बात करते हुए मस्तानी कुंवर की ओर देखकर मुस्कराता है, “बहुत अच्छे, हम तैयार हैं।“
महाराजा छत्रसाल सारी सभा की ओर देखते हुए बोलना प्रारंभ करता है, “पेशवा जी, मराठा हुक्मरान छत्रपति शिवाजी द्वारा पराई रियासतों को सैनिक सेवाएँ प्रदान करने तथा उनकी रक्षा करने के लिए कर के रूप में आमदनी का चैथा हिस्सा अर्थात चैथ लेने की प्रथा से हम परिचित हैं। 1665 ई. में बीजापुर (वर्तमान में कर्नाटक का जि़ला) और गोलकुंडा (हैदराबाद के समीप एक शहर) के दक्षिणी (DECCAN) सुल्तान छत्रपति शिवाजी महाराज को एक लाख चैथ देते रहे थे। 1719 ई. में मुगल बादशह ने छत्रपति शाहूजी को चैथ के साथ पंद्रह हज़ार नगद राशि अर्थात सैनिकों की सेवा के लिए छह दक्खिनी रियासतों की सुरदेशमुखी (आमदनी का दसवां हिस्सा, जो रियासतें चैथ की रकम के साथ छत्रपति को दिया करती थीं।) दिए जाने की भी हमें जानकारी है। हमें अपनी रियासतों को दातिया और ओरशा के राजपूतों से सुरक्षित रखने के लिए आपके सहयोग की निरंतर आवश्यकता पडे़गी। हम मराठा बहादुरों को उनकी वफ़ादारी के लिए चैथ देने के लिए तैयार हैं। पर मैंने सुना है कि चैथ का चैथा हिस्सा जिसको आप ‘बाबती’ कहते हैं, सीधा छत्रपति शाहूजी को चला जाता है। कुछ हिस्सा नादगौंडा (आवश्यक खर्च) और पांचसचिव(दान) में निकल जाता है। जंगी सामान, सैनिकों का मेहनताना और कार्यकारी अधिकारियों के खर्च ‘साहोतरा’ को निकालकर पीछे, दो चैथाई हिस्सा अर्थात ‘मोक्षा’ ही मराठा सरदारों के लिए बचता है।... पेशवा सरकार, आपने हमारी एक पुकार पर पैरों में जूती भी नहीं पहनी, और हमारी रक्षा के लिए आप तत्पर हुए। आज हम इस सिंहासन पर बिराजमान हैं तो सिर्फ़ आपके कारण हैं। आपने हमें उम्रभर के लिए अपना गुलाम बना लिया है। मांगो क्या चाहिए ?“
बाजी राव मंद मंद हँसता है, “महाराज, एकबार एक राजा जंग लड़ने जाता है और एक फकीर से विजय प्राप्ति का आशीर्वाद मांगता है। फकीर ‘तथास्तु’ और ‘विजयी भवो’ कहकर आशीर्वाद दे देता है। राजा जंग जीत जाता है। फिर वह राजा शुक्राना करने के लिए उसी फकीर की दहलीज पर आता है और फकीर से कहता है, मांगो, मैं आपको क्या दान-दक्षिणा दूँ ? फकीर कुछ नहीं बोलता, बस सिर्फ़ राजा की दयनीय हालत पर हँस देता है। जिसने जीत भी फकीर से मांगकर ली होती है, वह फकीर को क्या दे सकता है ?“
महाराज छत्रसाल, बाजी राव की रम्ज़ समझ जाता है, “आप मेरी बात का गलत आशय ले गए। पेशवा जी, मेरे कहने अर्थ था कि आपके हम पर अहसान हैं। हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे। आपने हमारी सहायता करके हम पर उपकार किया है। अगर कभी आप हमारी जान भी मांगेंगे तो हम बिना सोचे हँसते-हँसते आपको दे देंगे।“
“यह बात है तो समझो हमने आपकी जान मांग ली है।“ बाजी राव बिना देर करे तुरंत बोल पड़ता है।
महाराजा छत्रसाल अचंभित हो जाता है, “मैं कुछ समझा नहीं। कृपा करके साफ़ और स्पष्ट बताएँ।“
“कुछ क्या, आप तो कुछ भी नहीं समझे। आपने ठीक फरमाया है कि चैथ तो छत्रपति श्री शाहूजी को चली जाएगी। पीछे बाजी राव के पल्ले तो नाममात्र सी रकम ही बचेगी। हमें भी तो कुछ मिलना चाहिए।“
“हाँ-हाँ, हुक्म करें, आपको हीरों की खानों वाली अपनी नई राजधानी पन्ना रियासत (मध्य प्रदेश) की जागीर दे देते हैं।“
बाजी राव की आँखें हँसती है, “चाहिए तो हमें हीरों की खान वाली जागीर ही है। लेकिन पन्ना नाम की धरती का टुकड़ा हमें क्या करना है ? हमारे पास जागीरों का कौन का घाटा है ! हमें तो आपके खजाने का सबसे कीमती हीरा... हमारी मुराद है, हमें स्वय कों मस्तानी चाहिए।“
बाजी राव के मुख से यह सुनकर महाराजा छत्रसाल को एक झटका-सा लगता है और वह अवाक् होकर कभी धरती की ओर देखने लग जाता है और कभी पेशवा बाजी राव की ओर। जब महाराजा छत्रसाल कुछ देर तक कोई उत्तर नहीं देता तो बाजी राव स्वयं उसको छेड़ता है, “किस हिसाब किताब में उलझ गए, बुंदेलपति ?“
“नहीं...नहीं... कुछ नहीं। पेशवा जी, शायद आप नहीं जानते कि मस्तानी कुंवरसा हमारी बेटी है और हमने उसको बेटों से अधिक लाड़ में पाला है। हमारे जिगर का टुकड़ा है वो। यह संभव नहीं है।“ महाराजा अपनी विवशता प्रकट करता है।
बाजी राव, महाराजा छत्रसाल के पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है, “पर बेटियाँ भी कभी किसी ने घर में रखी हैं ? आपके राजपूतों में तो विजयी राजा के साथ दोस्ताना संबंध स्थापित करने और रिश्तेदारी बनाने के लिए ‘डोला’ लेने और देने की प्रथा है। अनेक राजपूतों ने अकबर और अन्य हुक्मरानों को अपनी बेटियों के डोले दिए हैं। क्या नहीं ?“
महाराजा छत्रसाल, बाजी राव को गचका देने का प्रयास करता है, “वह तो ठीक है, पर हर राजपूत महाराजा छत्रसाल नहीं होता और डोले में जाने वाली हर लड़की मस्तानी नहीं होती। मेरी जान है वो। मस्तानी की जगह हम आपको मन बहलाने के लिए अन्य दस लड़कियाँ दे देते हैं। आप जिस पर भी उंगली रखेंगे, हम हँसकर उसको आपके सुपुर्द कर देंगे।“
“दस नहीं, बस, हमको केवल मस्तानी ही चाहिए। आप चिंतित न हों, हम भी मस्तानी को पलकों पर बिठाकर रखेंगे। गरम हवा नहीं लगने देंगे। काँच के सामान की भाँति संभाल संभालकर रखेंगे। जान से प्यारी बनाकर।“ बाजी राव गुस्से में आकर अपने हाथों में पकड़ी अपनी तलवार की मूठ को और ज्यादा कसकर पकड़ लेता है।
“यदि यह बात है तो मैं डोला तो नहीं दे सकता। हाँ, अगर आपकी इच्छा है तो मैं मस्तानी के साथ आपका विवाह अवश्य कर सकता हूँ। पर मैंने तो सुना था कि आप पहले ही विवाहित है।...“ बात करते करते महाराजा छत्रसाल चुप हो जाता है।
“इससे क्या अंतर पड़ता है ? आपकी भी तो अनेक शादियाँ हुई हैं और मेरे पिता जी पेशवा बाला जी विश्वनाथ जी ने भी दो विवाह करवाये और अनेक रखैलें रखी थीं। छत्रपति शिवाजी के आठ विवाह थे। शिवाजी के पोते और संभा जी के पुत्र हमारे छत्रपति महाराज शाहू संभाजी राजा भौंसले जी की चार बेगमें हैं। बड़े लोग बहु-विवाह करवाया ही करते हैं। महाराज, आपने अपनी तमाम जि़न्दगी में रोहीला खान, खालिक, मुनवर खान, सदर-सुद्दीन, शेख अनवर, सैयद लतीफ़, बहिलोल खान और अब्दुस अहमद जैसे जरनैलों को हराया है और 1680 ई. में महोबा पर बहादुरी के साथ कब्ज़ा किया। आपने अपने राज्य की सीमा को पूर्व में चित्रकूट और पन्ना, पश्चिम में ग्वालियर तक, उŸार दिशा में सागर से लेकर कल्पी तक और गराह कोटा तक, उधर धामोह दक्खिन तक फैलाया है। और फिर आप तो जानते ही हो कि आपके राज को संभालने के लिए आपका कोई पुत्र भी सुयोग्य नहीं है। आपकी रियासत को सुरक्षित रखने के लिए हमेशा आपको हमारी कृपा चाहिए होगी। मैं आपका दामाद नहीं, बेटा बनना चाहता हूँ। मैं मस्तानी को उपस्त्री (रखैल) नहीं, बल्कि अपनी पत्नी का दर्जा दूँगा।“ भावुकता और वेग में आया बाजी राव अपनी नीयत और नीती को स्पष्ट उजागर करता है।
कुछ रुककर सोचता हुआ महाराज छत्रसाल अपनी संदेह समाशोधन के लिए पूछता है, “पर बुरा न माने तो बताने की कृपा करेंगे कि इस में आपका क्या लाभ होगा ?“
“सच बात तो यह है महाराज, हमारा मस्तानी पर दिल आ गया है। इश्क हो गया है मुझे आपकी बेटी मस्तानी से। इस रिश्तेदारी के हम दोनों पक्षों को एक-सा ही लाभ होगा। खानाजंगी कर रहे बुंदेलों के दल ओरशा और दातिया के अलावा मुगल आपके शत्रु हैं। हमें राजपूतों और निजामों के साथ नित्य टक्कर लेनी पडती है। यदि हम एकजुट हो जाएँ तो दुश्मन के आसानी से दाँत खट्टे कर सकते हैं। कोई हमारी ओर आँख उठाने का साहस नहीं कर सकेगा। मैं वचन देता हूँ कि मराठे आपके पुत्रों और रियासत की हवा की ओर किसी को झांकने भी नहीं देंगे। सबसे बड़ी बात मैं छत्रपति शिवाजी के इच्छित स्वराज को स्थापित करने का संकल्प पूरा करना चाहता हूँ। हमारा लक्ष्य दिल्ली के किले पर केसरी मराठा ध्वज लहराना है। आपकी रियासत हमारे दिल्ली की ओर जाने वाले रास्ते के मध्य में पड़ती है। आपके सहयोग से दिल्ली को जीतने से हमें कोई नहीं रोक सकता।“ बाजी राव राजनैतिक पेंच डालता है।
महाराजा छत्रसाल को यह प्रस्ताव लाभकारी प्रतीत होने लगता है और वह थोड़ी हिचकिचाहट के बाद स्वीकार कर लेता है, “ठीक है, हमें यह रिश्ता स्वीकार है। मैं श्रीमंत पेशवा बाजी राव के साथ मस्तानी कुंवर के रिश्ते की घोषणा करता हूँ। मैं श्रीमंत को अपना दामाद नहीं, पुत्र मानते हुए अपने उतराधिकारी हृदेय शाह और जगतराज के बराबर अपनी सम्पति में से तीसरा हिस्सा देने की वसीयत भी करता हूँ।“
“मुबारक हो !... बधाई हो !“ सभा में उपस्थित व्यक्तियों की आवाज़ें आने लगती हैं।
महाराजा छत्रसाल उठकर बाजी राव को अपने गले से लगा लेता है। शहजादा जगतराज और शहजादा पदम सिंह भी आगे बढ़कर बाजी राव के साथ आलिंगनबद्ध होते हैं। लेकिन पवार वंश की रानी हीरा कुंवर के पेट से जन्मा बड़ा शहजादा हृदेय शाह अपने संकोची स्वभाव के कारण दूर खड़ा रहता है। बाजी राव खुद उसके समीप चला जाता है, “क्यों राजकुंवर जी, आपको इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है न ?“
“आपत्ति ? नहीं, कतई नहीं श्रीमंत। यह आपने कैसी बात कर दी ? मस्तानी कुंवरसा के लिए आपसे अधिक योग्य वर और कौन हो सकता है ?“ हृदेय शाह भी बाजी राव को आलिंगन में ले लेता है।
“मैं आपका मेहुणा(बहनोई) नहीं, बल्कि भाई बनकर रहूँगा। मुझे आप आजी (जीजा) श्रीमंत नहीं, बल्कि थोरले (बड़ा) बाजी राव पुकारना।“ बाजी राव हृदेय शाह के साथ अपनी पगड़ी बाँट लेता है।
महाराजा छत्रसाल प्रसन्न होकर घोषणा करता है, “आज ही शादी का प्रबंध कर देते हैं।“
“क्षमा करें महाराज। हमारी मराठांे की भी कुछ परम्पराएँ हैं, जिनकी मान-मर्यादा रखना हमारा कर्तव्य है। आप मस्मानी कुंवर को हमारे साथ विदा कर दें और हम विवाह की रस्म पूना में जाकर ही सम्पन्न करेंगे। और फिर छत्रपति महाराज स्वामी शाहू जी के आशीर्वाद के बिना हम ऐसा अहम कदम कैसे उठा सकते हैं ?“
बाजी राव की योजना सुनकर महाराजा छत्रसाल दुविधा में पड़ जाता है, “बिना शादी किए हम मस्तानी कुंवर को कैसे भेज सकते हैं ? हमारे बुंदेलों के भी कुछ रस्मोरिवाज हैं जिनकी पालना करना हमारा धर्म है। (थोड़ा सोचकर) पर इस संकटमयी स्थिति में से निकलने का कोई तो हल होगा ? आप ही बताओ, हम क्या करें ?“
चतुर आनंद राव मकाजी मामला लपक लेता है, “महाराज, मराठों की शमशीर ही हमारी आन, प्रतिष्ठा और वचनबद्धता की प्रतीक है। सारा जग जानता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज 1659 ई. में कुंदाल से तीन सौ होन की खरीदी इंगलिस्तान(Europe) की बनी अपनी तलवार भवानी को हर समय अपने साथ रखते थे। आप मस्तानी की शादी पेशवा जी की तलवार के साथ करवा दो। इससे आपकी इज्ज़त भी रह जाएगी और हमारा सम्मान भी कायम रहेगा।“
“हाँ, यह ठीक रहेगा।“ महाराजा छत्रसाल आनंद राव मकाजी की बात सुनकर खिल उठता है।
दरबार को समाप्त करने के उपरांत महाराजा छत्रसाल अपनी बेटी मस्तानी के पास उसको मनाने और उसकी इच्छा जानने के लिए जाता है, “देखो मस्तानी, तुम तो जानती ही हो कि मैंने अपनी सल्तनत को कैसे अपने लहू से सींचा है। तुम्हारे भाई तो निकम्मे हैं। मुझे अपनी रियासत की रक्षा के लिए मराठों से सहायता मांगनी पड़ी है। मेरी पुत्री, उसके एवज़ में पेशवा बाजी राव ने मुझसे तुम्हारा हाथ मांगा है। बाजी राव बहुत अच्छा इन्सान और निपुण योद्धा है। मुझे उम्मीद है कि वह सारी जि़न्दगी तुम्हें खुश रखेगा। मैं आशा करता हूँ कि तुम मेरे इस निर्णय पर बगै़र कोई विरोध किए, उसे स्वीकार करोगी।“
“काकाजू, आपका आदेश सिर माथे। पहले कभी आपकी बात का विरोध किया है जो इस बार करूँगी।“ मस्तानी खिले माथे सहमति प्रकट कर देती है।
मस्तानी की सहमति सुनकर महाराजा छत्रसाल उसका सिर सहलाता है, “जीती रह मेरी बच्ची। मुझे तुमसे यही आशा थी। लेकिन मेरी एक बात अपने पल्ले के साथ कसकर गांठ बांध ले। अब तक तो तुम हमारे पास थी। हम सब तुम्हारा अच्छा-बुरा सोचते थे। तुम्हारा दुख-दर्द सुनते थे। लेकिन अपने ससुराल वाले घर में तुम्हें हमसे दूर अकेली ही अपना भला-बुरा विचारना होगा। तुम अपने ससुराल की पसन्द को मुख्य रखकर पहनना-खाना। जो उन्हें अच्छा न लगे, ऐसा कोई काम न करना। हमने तुम्हें अच्छे संस्कार दिए हैं और अपनी ओर से उत्तम शिक्षा और व्यवहार से तुझे नवाजा है। बुंदेलों की अपेक्षा मराठों का रहन-सहन और जीवन जीने का ढंग बिल्कुल भिन्न है। ससुराल वालों के परिवार में शीघ्र रचने-बसने का प्रयास करना। मुझे तुम्हारी बहुत चिंता रहेगी।“
“काकाजू, आप चिंतित न हों। मैं अपना पूरा ध्यान रखूँगी और आपको कोई उलाहना नहीं आने दूँगी। यदि मंै किसी संकट में हुई तो आपको तुरंत सूचित कर दूँगी।“ मस्तानी सिर झुका लेती है।
महाराजा छत्रसाल मस्तानी के मुँह पर हाथ रख देता है, “नहीं !... ऐसा कतई न करना। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। सुन... एक राजा का पुत्र बहुत नालायक होता है। उसको यही भ्रम होता है कि वह राजकुमार तो हैं पर उसे कुछ करने की कोई ज़रूरत नहीं। उसके बाप का राजपाट उसको मिल जाएगा। वह आलसी, अय्यास और निकम्मा बन जाता है। राजा को बहुत चिंता होती है पुत्र की। राजा सोचता है कि जब वह आँखें मूंद लेगा तो उसके निकम्मे पुत्र का क्या होगा ? राजा को पुत्र के भविष्य की चिंता में ग्रस्त देखकर उसका वज़ीर एक सलाह देता है। राजा वज़ीर की सलाह पर अमल करके अपने राजकुमार पुत्र के सम्मुख एक शर्त रख देता है कि वह रियासत से दूर टापू पर जाकर मेहनत करके अपना गुज़ारा करे और सिद्ध करे कि वह शासन करने के योग्य है। नहीं तो वह सारी रियासत और धन दौलत दान कर देगा। राजकुमार नाव में बैठकर चला जाता है और कुछ दिन बाद खाली हाथ लौट आता है। राजा उसको दुबारा भेजता है। राजकुमार भूख न सहते हुए फिर वापस आ जाता है। राजा उन्हीं पैरों राजकुमार को लौटा देता है। राजकुमार टापू पर कुछ दिन भटककर लौट आता है। राजकुमार को महलों वाला सुख-आराम टापू पर कहाँ मिलता है ? काफी देर तक यही सिलसिला चलता रहा। राजा भेजता रहा और राजकुमार काम से जी चुराता हुआ और समय नष्ट करके वापस लौटता रहा। राजा ने वज़ीर की फिर सलाह ली। वज़ीर समझदार था। वह राजा से बोला, “इस बार मैं साथ जाऊँगा।“ राजा ने वज़ीर को राजकुमार के साथ एक अन्य किश्ती देकर रवाना कर दिया। वज़ीर ने टापू पर पहुँचकर राजकुमार की किश्ती को आग लगा दी और अपनी किश्ती में वापस लौट आया। राजकुमार कई वर्ष न लौटा और फिर जब लौटा तो वह उस टापू का राजा बनकर लौटा था। राजा ने वज़ीर से पूछा कि यह चमत्कार कैसे हो गया? इस पर वज़ीर ने कहा, “राजन, आप किश्ती नहीं फूंकते थे इसलिए राजकुमार को पीछे लौट आने की इच्छा बनी रहती थी। मैंने किश्ती फूंकी तो उसको इधर का खयाल नहीं रहा और वह मेहनत करने के लिए उत्साहित हुआ। राजकुमार को पता लग गया कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए उसको वहाँ टिककर काम करना होगा।... इस कथा को सुनाने का मेरा तात्पर्य यह है कि तेरे विदा हो जाने के बाद हम तेरी किश्ती जला देंगे। तू इधर के बारे में न सोचना और जितना शीघ्र संभव हो सका, अपने आप को वहाँ की जीवनशैली में ढाल लेना। जो स्त्री अपने पीहर से नहीं टूटती, वह ससुराल के साथ नहीं जुड़ सकती। माँ-बाप की ओर देखने वाली लड़की ससुराल में नहीं बसा करती।“
मैं सब समझ गई काकाजू। मैं आपको वहाँ बसकर ही नहीं, राज करके भी दिखाऊँगी।“ मस्तानी अपने पिता के गले लग जाती है।
“हाँ, एक महत्वपूर्ण बात तो मैं बताना ही भूल गया कि पेशवा का खानदान चितपवन ब्राह्मण है। ब्राह्मण अपने आप को दूसरी जातियों से श्रेष्ठ समझते हैं। स्कंद पुराण के सागीन्द्री कांड में उल्लेख आता है कि गोरे खूबसूरत नीली आँखों वाले यात्रियों का बेड़ा समुद्री तूफान में कोकण के तट से टकरा जाता है और उसमें सवार चैदह यात्री मर जाते हैं। स्थानीय लोगों द्वारा उसका संस्कार करने की तैयारी की जा रही होती है, पर परशुराम उनमें जान फंूककर उनकी चिताओं को पावन कर देता है और वे चितापवन कहलाते हैं। उन्हीं चैदह मन-चिता पावन पवित्र आत्माओं यानि चितपवनों से ब्राह्मणों के चैदह गौत्र चलते हैं। जैसे अत्री, भावबरव्या, भारद्वाज, गर्ग, जमादागनी, कपी, कश्यप, कुनदीनाया, कौशिक, नित्युंदन, शांडिल्य, वशिष्ठ, वत्स और विष्णुवरुध। इन चैदह की आगे चलकर अन्य शाखायें बन गईं जिन्हें गण-गौत्र कहते हैं। पेशवा बाजी राव का गोत्र भट्ट भी इन्हीं में से एक गण-गौत्र है। परशुराम द्वारा समुद्र में तीर मारकर पैदा की गई धरती चितापोलना या चिपलन (वर्तमान गोआ) चितपवनों का देश है। चितपवन ब्राह्मण तन और मन के पवित्र माने जाते हैं। ब्राह्मण परिवारों में काफी राजनीतियाँ चला करती हैं। तुम्हें अनेक राजनीतिक चालों का सामना करना पड़ेगा और पग पग पर षड्यंत्रों से जूझना पड़ सकता है। हर कदम फूंक फंूक कर रखना। यदि कभी बुंदेलखंड को मराठों से खतरा हो तो सही समय पर हमें चैकन्ना कर देना।“
मस्तानी मशालों की मानिंद अपनी आँखें मूंदकर हामी भर देती है।
अगले दिन ड्यौढ़ी महल के मंडल में मस्तानी, बाजी राव की तलवार से अग्नि के ईदगिर्द फेरे लेकर विवाह की रस्में पूरी कर लेती है। पेशवा बाजी राव मस्तानी की डोली लेकर अपनी फौजों के साथ जैतपुर से पूणे की ओर रवाना हो जाता है।
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