Tuesday, 3 November 2015

अध्याय-6

कूच, पड़ाव और काम

बुंदेलखंड से कूच करके सबसे आगे बाजी राव अपने घोड़े पर जा रहा होता है और उसके पीछे हाथी पर पालकी में मस्तानी जा रही होती है। मस्तानी को जब भी अवसर मिलता है, वह पर्दा हटाकर बाजी राव को देखती हुई अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने लग जाती है। मस्तानी की अल्हड़ अवस्था से ही यह इच्छा रही थी कि उसका जीवनसाथी कोई महान योद्धा हो। पर बाजी राव जैसे चोटी के सूरमे के जीवन में प्रवेश करने के बारे में तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। बाजी राव को देखकर मस्तानी की भूख उतर जाती है। पालकी में सवार मस्तानी के रोम रोम में शरारती गुदगुदी होने लगती है। वह पर्दे की जाली में से बाजी राव को टकटकी लगाकर निहारती हुई मुस्कारने लग पड़ती है।


सफ़र लम्बा होने के कारण बाजी राव उसे शीघ्र समाप्त करने के लिए अपने दस्ते को अधिक स्थानों पर अधिक देर के लिए रुकने नहीं देता। बारी बारी से सभी सैनिक अपनी सवारियों अर्थात हाथी-घोड़ों पर ही आराम कर लेते हैं। यदि थोड़ी-सा वे कहीं विश्राम करते भी हैं तो महज वे अपने जानवरों को आराम देने और थकान उतारने के लिए ही रुकते हैं। कुछ देर दम लेने और थकान उतारने के बाद वे चारा-दाना, पट्ठे आदि से उनका पेट भरकर और घोड़ों की अपनी सेना टुकड़ी को फिर से चलाकर रास्ता कम करने में लग जाते हैं। जैतपुर से पूणे तक का रास्ता भी कौन सा कम है ?

कई दिन आठों पहर निरंतर चलता कारवां पूणे की मंजि़ल के मध्य में पहुँच जाता है। आधे से अधिक रास्ता वह पूरा कर चुके होते हैं। नर्बदा नदी के निकट पहुँचने तक बाजी राव का सारा लश्कर बुरी तरह से थककर शक्तिहीन हो चुका होता है। रात भी सिर पर चढ़ी खड़ी होती है। समझदारी से काम लेते हुए बाजी राव वहीं उसी पड़ाव पर ही विश्राम करने के लिए आदेश दे देता है।
सेना द्वारा नर्बदा नदी के इर्दगिर्द तम्बू तान लिए जाते हैं। करीब के जंगल में से शिकार मारकर उसको भूनने का काम शुरू हो जाता है। शराब का दौर प्रारंभ हो जाता है। बाजी राव मस्तानी के ख़यालों में खोया हुआ नर्बदा नदी में स्नान करने चला जाता है।

स्नान करते हुए बाजी राव मंत्रों को जाप कर रहा होता है। किन्तु पूजा में उसका मन नहीं लगता। उसका ध्यान बार बार न चाहते हुए भी मस्तानी की ओर दौड़ दौड़ जाता है। जल से बाहर निकलने तक बाजी राव मस्तानी को फौरन अंग लगाने के बारे में दृढ निश्चय कर चुका होता है।

मस्तानी अपनी दासियों के साथ पृथक स्त्री शिविर में होती है। खेमे में प्रवेश करते ही बाजी राव, दास को बुलाकर मस्तानी को संदेश भेज देता है।

मस्तानी की प्रतीक्षा में बाजी राव बूँद बूँद करके शराब पीने लग जाता है। बाजी राव की कल्पना में मस्तानी नृत्य करने लगती है। दारू पीते हुए वह मस्तानी के संदर्भ में सोचता हुआ विचारों के चक्रव्यूह में ही घिरा रहता है। वह मस्तानी को भोगने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कामक्रीड़ा के आसनों की रूप रेखा अपने जे़हन में बना लेता है। कभी वह गज आसन, कभी अश्वमेध आसन, कमान आसन और कभी ताली क्रीड़ा विधि से मस्तानी को भोगने का विचार बनाता है। फिर वह अपनी कल्पना के माध्यम से इन आसनों में अपने आपको मस्तानी के साथ आलिंगनबद्ध हुआ देखता है और आनन्द अनुभव करने लग जाता है। बाजी राव ज्यूँ ज्यूँ मस्तानी को प्रेम करने की विधियों और तरकीबों के बारे में सोचता है, त्यूँ त्यूँ उसकी बेचैनी और कामचेष्टा बढ़ती जाती है। वह उत्तेजित होता जाता है और संभोग करने के लिए उसका मन उतावला पड़ने लगता है।

प्याला-पर-प्याला पीता हुआ वह एक सुराही खाली करके दूसरी मंगवा लेता है। परंतु मस्तानी नहीं आती। बाजी राव व्याकुल हो उठता है। वह दुबारा मस्तानी को बुलाने का संदेश भेजता है। बाजी राव को अत्यंत कामोत्तेजना के कारण अधीरता हो रही होती है। वह काम लालसाओं का सताया विचलित होकर तड़प रहा होता है। व्याकुलता के कारण उसकी जान मुट्ठी में आई पड़ी होती है।

काफ़ी समय की प्रतीक्षा के बाद मस्तानी बाजी राव के खेमे में आकर ‘आदाब’ अजऱ् करती है तो बाजी राव की जान में जान आती है। बाजी राव, तोप की नली में से निकले बारूद के गोले की भाँति उछलकर अपने आसन पर से उठता है और मस्तानी को अपनी बांहों के घेरे में कस लेता है, “आ आ मेरी जान ! तेरे प्रतीक्षा में मेरी तो जान ही लबों पर आई पड़ी थी। आने में इतना विलम्ब क्यों कर दिया ?“

मस्तानी घबरा जाती है, “वो.... वह जी, बस कुछ नहीं, यूँ ही कपड़े पहनते हुए कुछ अधिक समय लग गया। गुस्ताखी के लिए माफ़ी चाहती हूँ। वो मज़ा विसाले यार में कहाँ, जो इंतज़ार में है।“

“वस्त्र पहनने के लिए इतना समय क्यों नष्ट कर दिया ? तुम्हें पता नहीं था कि इन्हें तो मैं तुम्हारे आते ही उतार देने वाला था ?“ बाजी राव मस्तानी की चुन्नी उसके सिर पर से खींचकर उतार देता है।

बाजी राव का मंतव्य भाँपकर मस्तानी नखरा दिखाती है, “वस्त्र उतारने से पहले पहनने भी आवश्यक हैं। रूह से कपड़े उतारने का आनन्द लेने के लिए इन्हें पहनना भी मिज़ाज के साथ होता है, मेरे हुजूर ! और फिर, आपको पहली बार एकांत में मिलना था। इसलिए विशेष रूप से सजना-संवरना तो था ही।“
बाजी राव मस्तानी को बांहों में ऊपर उठाकर नीचे बिछे बिस्तर पर लिटाते हुए उसके साथ ही लेट जाता है, “भगवत गीता की सौगंध, तेरे हार-शिंगार के चक्कर में मेरा तो डाट निकला पड़ा है। पागल हुआ पड़ा हूँ मैं... बहुत वीरानगी है मेरे दिल में जिसको तेरे प्यार से भरना है। जब से तुझे देखा है, मैं तो शारीरिक संगम के लिए तड़प रहा हूँ। कमबख्त धैर्य ही नहीं होता मुझसे। भविष्य में एक बात का ध्यान रखना...।“

“किस बात का ?“ मस्तानी बीच में टोकती हुई माथे पर बल डाल लेती है।

“तुम मेरे से मिलने आते समय यह हार-शिंगार को तो रहने ही दिया करना। मैं नहंीं चाहता कि तुम्हारे और मेरे बीच गहना-जेवर, कपड़ा-लता या कुछ और हो। बस, तुम्हारा निर्वस्त्र बदन, मेरे नंगे जिस्म से यूँ लिपट जाए जैसे ठंड लगने पर दोनों हाथों की हथेलियाँ एक-दूजे से अपने आप चिपटकर आपस में रगड़ा करती हंै या जैसे रणभूमि में तलवारें आपस में भिड़ा करती हैं।“ बाजी राव एक तरफ करवट लेकर पड़ी मस्तानी की पीठ को सहलाने के लिए अपने हाथ की हथेलियाँ झसने लग जाता है।

बाजी राव के स्पर्श से मस्तानी की देह में प्रेम तरंगें छिड़़ जाती हैं। मस्तानी आँखों में शरारत झलकाती हुई मुस्कराती है, “जो हुक्म मेरे आका ! भविष्य में ऐसा ही होगा। और कोई हुक्म ?“

“चल फिर, अपने नाजुक हाथों से दो जाम बना।... एक हमारे लिए और एक अपने लिए।“

“छी...छी... न बाबा न ! मैं नहीं शराब को हाथ लगाती। मुझे अपना धर्म भ्रष्ट करना है ?... यह क्या ? आप उच्च कुल के ब्राह्मण होकर मांस-मछली खाते और शराब पीते हैं ?“ मस्तानी लाड़ और नखरे दिखाती है।

“क्यों ब्राह्मणों को क्या दारू दांत काटती है ? जब सारी दुनिया पीती है, हमने पी ली तो कौन सा क़हर ढह गया ? निरी भांग जैसी है यह तो। मैं तो इसको भगवान भोले शंकर का प्रसाद समझकर पी लेता हूँ। बाकी ऐ  सुंदरी कि मैं हर समय मंत्र पढ़ते रहने और मंदिरों की घंटियाँ बजाने वाले ब्राह्मणों में से नहीं हूँ। रणभूमि में तलवारें खनखनाना मेरी फितरत है। शराब और कबाब से जंगबाज़ों को शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है। मैंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जंगों-युद्धों में व्यतीत किया है। वहाँ रणभूमि में कौन सी माँ बैठी होती है जो चावल उबालकर बिरयानी और पुलाव बनाकर खिलाये ? रणक्षेत्र में तो शिकार मारकर गुज़ारा करना पड़ता है और थकान मिटाने के लिए दारू भी पी जाती है। शराब, मछली और मांस को हजम करने में सहायक सिद्ध होती है। कबाबों के संग शराबों का बहुत गहरा रिश्ता है। शराब के बग़ैर रूखा गोश्त कहीं हलक से नीचे उतरता है ?“

मस्तानी बाजी राव के गले में पहनी बहुमूल्य मालाओं को छेड़ती है, “नहीं, मेरा अर्थ था, आप मदिरापान न किया करें। यह बहुत बुरी चीज़ होती है।“

“तुमने कभी पी है ?“

“नहीं।“

“फिर कैसे कह सकती हो कि शराब बुरी शै है ?“

“लोगों से सुनती हूँ कि इसको पीने से आदमी होश में नहीं रहता और उसकी अक्ल मारी जाती है। एक पीर ने कहा है, ‘जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ।। आपणा पराया न पछाणई खसमहु धके खाइ।। जितु पीतै खसमु विसरै दरगह मिलै सजाइ।। झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाइ।।(गुरू ग्रंथ साहिब, सलोक मः 3, सफ़ा 554) अर्थात जिसके पीने से बुद्धि दूर हो जाती है और पागलपन आ चढ़ता है, अपने पराये की पहचान नहीं रहती, ईश्वर की ओर से धक्के पड़ते हैं। जिसके पीने से खसम बिसरता है और रब की दरगाह में सज़ा मिलती है। ऐसी झूठी शराब कभी नहीं पीनी चाहिए। जहाँ तक वश चले इसको पीने से बचना चाहिए।... आपने देखा नहीं, जंग में शराब में मस्त हुए हाथी बाज़ दफ़ा अपने ही लश्कर को रौंद डालते हैं।“ मस्तानी बाजी राव की आँखों में आँखें डाल लेती है।

“वो हाथी तो शराबी हो जाते हैं क्योंकि उनके सामने हथनियाँ होती हैं, मस्तानी नहीं होती ! तेरे हुस्न के सामने तो शराब कुछ नहीं। तुम्हें देख देने के बाद मुझे तो यह शराब ससुरी चढ़ती ही नहीं। मैं तो तुम्हारी मस्तानी आँखों में एक नज़र देखते ही टल्ली हो जाता हूँ। हमारे लिए तो जि़न्दगी है, दूसरों के लिए खराब बन जाती है। लाख आँसू निचोड़ता है जब आशिक तो एक कतरा शराब बनती है।“ बाजी राव शायराना अंदाज़ में फरमाता है।

मस्तानी प्रत्युतार में बहस करती है, “यह दारू निरी ज़हर है। इससे तो शरबत पी लिया करें। मैं अपने हाथों से बनाया करूँगी आपके लिए मेवे डालकर केसर और कुमकुम वाला शरबत। देखना, मेरा शरबत पीने के बाद आपको कुछ और स्वाद ही नहीं लगेगा।“

“शराब स्वाद के लिए नहीं, सरूर के लिए पी जाती है। शराबी इल्ज़ाम शराब को देते हैं। आशिक तोहमत शराब को देते हैं। कोई अपनी भूल कुबूल नहीं करता, कांटे भी ताने गुलाब को ही देते हैं।... तुम भी क्या याद करोगी, किसी चितपवनी ब्राह्मण मराठों के पेशवा से वास्ता पड़ा था। ले, मेरे कहने पर एकबार घूँटभर देख...आसमान में न उड़ती फिरी तो मेरा नाम बदल देना।“  बाजी राव एक तरफ पड़ा मदिरा वाला प्याला उठाकर मस्तानी को उठाते हुए जबरन मस्तानी के अधरों के साथ लगा देता है।

उठकर बैठती हुई मस्तानी एक सांस में सारा प्याला पीकर हिचकी लेती है और अपने आप झट से दूसरा प्याला भर लेती है, “हाँ...उतनी बुरी भी नहीं, जितनी लोग इसकी निंदा करते हैं।“

“लोग तो कुत्ते हैं और कुत्ते तो भौंका ही करते हैं, जान। किसी की परवाह नहीं करनी चाहिए। जि़न्दगी का लुत्फ़ लो जी भरकर। यूँ ही शराब को बदनाम किया बीसियों लोगों ने।“ बाजी राव मस्तानी की आँखों में झांकता है। वह भी नज़रें मिलाती है। मस्तानी की आँखों में से काम छलक रहा होता है। बाजी राव, मस्तानी को कलाई से पकड़कर अपनी ओर खींचकर दुबारा लिटाते हुए उसके ऊपर झुककर उसकी गर्दन को वेग से चूमना प्रारंभ कर देता है।

नीचे लेटी मस्तानी बाजी राव के गले में बांहें डालकर अपने होंठ हरकत में लाते हुए जवाबी कार्रवाई कर देती है।

बाजी राव का हाथ मस्तानी की जांघों को सहलाने लग जाता है।... मस्तानी सरूर में आकर एकदम उठकर बाजी राव के ऊपर लेटती हुई अचानक किए आक्रमण की तरह ताबड़तोड़ चूमने लग जाती है।... उन दोनों का वेग कुछ ही पलों में तीव्र और प्रचंड हो उठता है। मस्तानी अपने नाड़े का एक सिरा खींचकर अपना लहंगा उतार देती है, “आज मैं आपको ऐसा नशा चढ़ाऊँगी कि आपको सारी दुनिया के नशे भूल जाएँगे।“

“हाँ, पगली, मैं तो खुद तेरे नयनों में से जाम भर भरकर पीने के लिए तरसा पड़ा हूँ।“ बाजी राव अपने अंगवस्त्र को उतारकर मस्तानी की चोली की तनियों की गांठें खोलता है और मस्तानी के नाजुक गोरे बदन को वस्त्रों की हिरासत से मुक्त कर देता है। जैसे कोई मदमस्त हाथी माथे की टक्कर मारकर दुश्मन के किले के दरवाजे़ को तोड़ने के लिए धक्का मारता है, वैसे ही एक झटके के साथ बाजी राव मस्तानी के शीशमहल जैसे गुलबदन में सेंध लगाकर प्रवेश हो जाता है।

बाजी राव और मस्तानी हाँफे हुए ऊँठ की तरह एक दूसरे के साथ लिपट पड़ते हैं। बाजी राव बांहों में कसता हुआ मस्तानी को अपने पेट पर लिटा लेते है, “मस्तानी तेरा असली और पूरा नाम क्या है ?“

मस्तानी धीमे स्वर में बोलने लगती है, “माऊ के लोग मुझे मस्तानी माऊ सहानियाँ के नाम से पुकारते हैं। वैसे असली नाम तो मेरा माहनूर था। पर कभी किसी ने इस नाम से पुकारा ही नहीं। इसलिए यह नाम कोई नहीं जानता। बचपन से ही मुझे नाच गाने का शौक था। बचपन में मेरे संगीत के प्रति शौक को देखते हुए काकाजू महाराजा छत्रसाल जी ने संगीत और नृत्य की शिक्षा दीक्षा के लिए उस्ताद मस्तान जी के पास भेजा तो मैं नाचते-गाते इतनी मस्त हो जाती थी कि मुझे अपने इर्द गिर्द की भी होश नहीं रहती थी। उस्ताद मस्तान जी ने मुझे अपना नाम बख़्शकर मस्तानी कहना प्रारंभ कर दिया। मैं उनकी सबसे चहेती शिष्या थी। मैं नृत्य सीखकर जवान होने लगी तो मेरा नृत्य देखने वाले अपने होश को काबू में न रख पाते और मेरे सौन्दर्य और नृत्य को देख मस्ताने हो जाते। सब मस्तानी मस्तानी पुकारते रहते और इस प्रकार मेरा नाम मस्तानी ही पड़ गया। अब तो मुझे खुद भी भूल चुका है कि मेरा असली नाम क्या था ? आपको नहीं अच्छा लगता तो सरताज आप बदलकर मेरा दूसरा कोई भी मनपसंद नाम रख सकते हैं।“

“नहीं नहीं, मस्तानी से बढि़या नाम क्या हो सकता है ? यह नाम बहुत योग्य है और तुम पर जंचता है। वैसे लाड़ प्यार से मैं कभी कभार तुम्हें नर्बदा पुकार लिया करूँगा। मुझे नर्बदा नदी से बहुत प्रेम है। मस्तानी, मैं तुम्हें इतना प्यार करूँगा कि दुनिया का इतिहास तुम्हें बाजी राव की मस्तानी कहकर याद किया करेगा। जब कभी भी मराठा बाजी राव पेशवा का जिक्र हुआ करेगा या मराठों के इतिहास का कोई पृष्ठ खोला जाएगा तो उस समय भी पेशवा बाजी राव की महबूबा मस्तानी बेगम की बात भी अवश्य हुआ करेगी।“ बाजी राव आवेश में आकर बात करता है।

यह सुनकर मस्तानी स्वप्नमयी संसार में विचरने लग जाती है, “श्रीमंत स्वामी मेरा रोम रोम आपका सदैव ऋणी रहेगा। पर आपके नाम के साथ लगते इस पेशवा उपाधि का क्या अर्थ है ?... शायद सेनापति होता हो ?“

“नहीं, रुको। मैं बताता हूँ।“ बाजी राव उठकर बैठते हुए अपना प्याला उठा लेता है और घूंट भरता हुआ बोलता है, “पेशवा, फारसी का शब्द है। इसका अर्थ होता है - ताबिया में हमेशा पेश रहने वाला महामंत्री। महान मराठा शासक पहले छत्रपति शिवाजी भौंसले महाराज 1674 ईसवी में यह पेशवा पद अस्तित्व में लाए थे। लेकिन छत्रपति ने पेशवा को पंथप्रधान की उपाधि देकर शासन करने की छूट दी थी ताकि मराठा साम्राज्य को अधिक दूर तक फैलाया जा सके। पूरे देश में स्वराज अर्थात स्वतंत्र हिंदू राज्य स्थापित करने का छत्रपति शिवाजी ने बीड़ा उठा रखा था। जिज़ोरी (पूणे) के देशाष्ठा वंशी मोरोपंथ तिंबर्क पिंगले को प्रथम पेशवा बनाया गया था। 1689 ई. में मोरोपंथ की मृत्यु के पश्चात दूसरे छत्रपति संभाजी महाराज ने अस्थायी तौर पर तिंबर्क पिंगल के पुत्र मोरेश्वर पिंगले को कुछ समय के लिए पेशवा नियुक्त किया था। पर असली दूसरा पेशवा रामचंद्र नीलकंड पंथ अमात्या(बवाडेकर) उसी साल 1689 ई. में बना था। अमत्या का संस्कृत में भाव निगरान अथवा रखवाला होता है जो घरेलू और सरकारी मामले देखता है। पेशवा रामचन्द्र नीलकंठ को तीसरे छत्रपति राजाराम ने 1689 ई. में महाराष्ट्र छोड़कर झिंजी जाने से पहले ‘हुकूमत पाना’ (शासन करने का राजा वाला अधिकार) देकर हुक्मरान मुकर्रर किया था। पूरे दस वर्ष उसने यह सेवा निभाई। वह कुलकर्णी वंश के साधारण युवक से शिवाजी की प्रेरणा के कारण अष्टप्रधान बना। 1690 ई. से 1694 ई. के वर्षों के दौरान उसने अपनी विलक्षण युद्धनीतियों के साथ मुगलों को भागने पर विवश किए रखा और उनके दक्खिनी महाराष्ट्र में स्थित बहुत सारे किलों पर कब्ज़ा किया। संताजी गोरपड़े और धन्नाजी यादव जैसे योद्धों ने उसका बहुत साथ निभाया था। छत्रपति राजाराम के स्थान पर शासन करते हुए उसने 1698 ई. में अपना पद त्याग कर हुकूमत की बागडोर अपनी पत्नी तारा बाई को सौंप दी थी। परंतु 1708 ई. तक रानी तारा बाई ने उसको कार्यकारी पेशवा ही रहने दिया था। उसने ‘आज्ञापत्र’ नाम की पुस्तक भी लिखी थी जिसमें नवीन युद्ध विधियाँ, शासन करने का ढंग और किलों की देखभाल के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारी थी। यह किताब मराठा साम्राज्य की नीवें सुदृढ करने में बहुत सहायक सिद्ध हुई थीं। रामचन्द्र पंत का 1716 ई. में पनहाला किले में स्वर्गवास हो गया था। फिर भाईरोज़ी पिंगले 1708 ई. से 1711 ई. तक पेशवा बना रहा था। उसके बाद आनंद राज के जागीरदार परशुराम तिंबर्क कुलकर्णी ने यह पद संभाला। उसने मीराज, रंगाना किला, भुदारगद, चंदनगढ़, पवनगढ, सतारा और बसंतगढ़ आदि इलाकों को जीता था। यह भी तारा बाई का समर्थन करता था। पाँचवें महाराज शाहू जी ने 1710-14 ई. के दौरान इसको दो बार कै़द में भी रखा था। छत्रपति शाहू जी ने अपनी अपेक्षा उसकी सुहृदयता और वफ़ादारी, तारा रानी के साथ देखते हुए उसको एक कोने में लगाकर पेशवाई हमारे भट्ट परिवार को सौंप दी थी। फिर कोकण के श्रीवर्धन यानी मेरे पिता जी बालाजी विश्वनाथ भट्ट (जन्म 1 जनवरी 1662 ई.) को छत्रपति शाहू जी ने मुनीमी की जिम्मेदारियों से हटाकर पेशवा नियुक्त किया था। परंतु वास्तव में ओहदेदारी बाबा ने (17 नवंबर) 1713 ई. को संभाली थी। ससवाद में (12 अपै्रल) 1720 ई0 को बाबा के निधन के बाद विश्वनाथ (विशाजी) भट्ट के पोते ने केवल उन्नीस वर्ष की आयु में पेशवाई हासिल की थी।“

बाजी राव की बातें बड़े ध्यान और दिलचस्पी से सुनती हुई मस्तानी ने उबासी ली, “मैंने तो पेशवा का अर्थ पूछा था, आपने तो मुझे पेशवाओं का सारा इतिहास ही वर्णन कर दिया।“

“तुम्हारे लिए यह जानना आवश्यक था। इसलिए बताया है ताकि तुम जान जाओ कि हम कौन हैं और हमारा क्या रुतबा है।“ बाजी राव गर्व से गर्दन ऊँची कर लेता है।

मस्तानी अपनी जिज्ञासा प्रगट करती है, “मेरे परिवार के बारे में तो आप जानते ही हैं। मेरी अम्मी जागीरदार दिलावर खान की पुत्री और काकाजू के मित्र अनवर खान की बहन है। आपके घर परिवार में कौन कौन हैं ? मुझे कुछ उनके विषय में बताइये।“

“वैसे तो मेरे दादा विश्वनाथ भट्ट जिनको लोग विशाजी कहकर बुलाते थे, के हम तीन पोते हैं। चिमाजी अप्पा, मैं और मेरा सौतेला भाई भिखूजी शिंदे। पर पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट और माता राधा बाई बरवे के जाये, हम चार बहन भाई हैं। सबसे बड़ा मैं हूँ, चिमाजी अप्पा(चिमाजी अप्पा(1707-1741 ई.) और चिमनाजी अप्पा के बीच भ्रम न खाया जाए क्योंकि चिमाजी अप्पा बाजी राव का भाई था और चिमनाजी अप्पा, रघुनाथ राव और आनंदी बाई (काशी बाई) का बेटा था और बाजी राव का पोता था।) मुझसे सात वर्ष छोटा है। फिर हमारी बहन राव गोरपड़े है। शरारती भिहू बाई का ससुराल बारामती है। अनू बाई इशालकरनजी में ब्याही हुई है। (वनकट राव गोरपड़े के वंशज इशालकरनज़ी में 1847 ई. तक शासन करते रहे थे)। परंतु मेरी दोनों बहनें अपनी ससुराल की बजाय मायके पारिवारिक पेड़ी (चैंकी या निवास स्थान) पूणे में ही रहती हैं। मेरी पत्नी काशी बाई, एक आठ साल का मेरा बेटा नाना साहिब और मेरी भाभी रकमा बाई, चिमाजी अप्पा की पत्नी है। बस, यही हैं मेरे घर के सदस्य।“

“आपका विवाह कब हुआ था ?“ मस्तानी थोड़ा चैंकती है।

“आज से उन्नीस-बीस वर्ष पहले। तब मैं अभी केवल आठ वर्ष का था। मैं और काशी एकसाथ खेला करते थे।“

मस्तानी मजाक करती है, “फिर तो यह प्रेम विवाह हुआ। नहीं ?“

“हाँ, जो चाहे समझ लो। काशी बहुत घरेलू किस्म की स्त्री है। हमारे मराठों की, सारे भारतवर्ष में इसी प्रकार बचपन में ही शादियाँ हो जाती हैं।“

“मुझे डर-सा लगता है। क्या आपका परिवार मुझे स्वीकार कर भी लेगा ? विशेषकर आपकी पत्नी ? कहीं वह मेरे साथ सौतनों वाला व्यवहार तो नहीं करेगी ? कहा करते हैं, सौतन तो मिट्टी की भी बुरी होती है।“ मस्तानी अपना संशय प्रकट करती है।

बाजी राव मस्तानी के मन का डर सुनकर चिंतित हो जाता है, “वही चिंता तो मुझे सताये जा रही है। मेरी माँ दशेस्था कुल में से है, पर अब आई(माता) कट्टर चिपपवनी ब्राह्मण बन चुकी है। मेरे पिता, मेरी माँ से अधिक ध्यान अपनी रखैल यानी दूसरी पत्नी का रखा करते थे। मेरी माँ ने सौतन का दर्द झेला है। इसलिए शायद वह काशी का पक्ष ले। बाकी सब से अधिक चिंता मुझे काशी की है। उसने तो सपने में भी मेरे द्वारा दूसरी स्त्री रखने के बारे में नहीं सोचा होगा। उसको तेरे बारे में जानकर एकबार तो झटका लगेगा। बर्तन में पानी भी डालें, एकबार तो पानी के उछलने से बर्तन भी छलकता है। फिर आहिस्ता आहिस्ता पहले बर्तन और बाद में पानी भी स्थिर हो जाता है। नई बूँदें लबालब भरे बर्तन में अपनी जगह बनाकर समा जाती हैं। वैसे काशी बहुत ठंडे दिमाग की है। धीरे धीरे तुम्हें स्वीकार कर लेगी। पर तुम मेरी पत्नी हो। आज नहीं, कल सही। तुम्हारे पिता की भी अनेक रानियाँ हैं। तुम्हें तो पता है, कैसे इस मामले का सामना करना है। छोटे-मोटे तो बर्तन आपस में बजते ही रहते हैं। आहिस्ता आहिस्ता सब ठीक हो जाएगा। महादेव भली करेंगे। मुझे नहीं लगता, इसकी कोई अधिक समस्या आएगी। लेकिन, तुम चिंता न करो, मैं खुद सब संभाल लूँगा। बाकी मैं तुम्हें भरपूर प्यार दूँगा। तुम्हें मेरे परिवार में बिल्कुल भी परायापन अनुभव नहीं होने दूँगा।“

मस्तानी अपनी बिलांद भर लम्बी गर्दन ऊपर उठाकर बाजी राव के चेहरे को देखती है और फिर नयनों के दरवाजे़ बंद करके उसकी छाती पर अपना सिर पर रख लेती है, “बस स्वामी, अब आपके आसरे ही हूँ। दूसरों की मुझे परवाह नहीं है। आप कृपादृष्टि बनाये रखना।“

“मेरी जान ! बिल्कुल न घबरा। फटाफट उठ और अभी तैयारी कर ले। आज ही हमें पूणा के लिए रवाना होना है।“ बाजी राव उठकर बैठ जाता है।

पेशवा बाजी राव अपने लश्कर के साथ पूणे की ओर चल पड़ता है। जैसे ही वह पूणे के समीप पहुँचता है तो उनके जत्थे के ज्योतिषों के अनुसार सितारों की गति बदलने के कारण गृह-प्रवेश के लिए वह शुभ समय नहीं होता। ग्रहों की स्थिति में परिवर्तन आने की प्रतीक्षा में बाजी राव पूणे के बाहर ही रुककर कुछ दिन के लिए पड़ाव डालने का मन बना लेता है।

सारे सैनिक तम्बू गाड़कर आराम से मौज-मस्ती, नाच, गायन और रंग राव में व्यस्त हो जाते हैं। बाजी राव अपने खेमे में मस्तानी की गज गज लम्बी सुनहरी लटों के कुंडलों में उलझकर भोग-विलास में डूब जाता है।

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