सुहाग सेज
अगली सुबह बाजी राव नदी में स्नान करके मस्तानी के साथ करीब के मंदिर में जाता है और पूजा करने के पश्चात वहीं मस्तानी की मांग में सिंदूर भर देता है। उसके उपरांत बाजी राव मस्तानी को अपने तम्बू में लौट जाने के लिए कहकर लश्कर का निरीक्षण करने चला जाता है।
फौज का जायज़ा लेकर जब बाजी राव तम्बू में लौटता है तो मस्तानी नमाज़ पढ़ रही होती है। वह मस्तानी के करीब बैठकर नमाज की समाप्ति की प्रतीक्षा करता है। ज्यूँ ही नमाज खत्म होती है तो मस्तानी मुसल्ला इकट्ठा करके बाजी राव को ‘तस्लीमात’ अर्ज़ करती है। बाजी राव को हैरत होती है, “मस्तानी यह क्या ? तुम और नमाज ?“
“हाँ हुजूर ! मैं प्रणानामी हूँ। स्वामी प्राणनाथ का प्रणानाम धर्म, हिंदुत्व और इस्लाम दोनों की अच्छी चीज़ों को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। इसलिए जहाँ मैं मंदिर में भजन, आरती करती हूँ, वहीं पाँच वक्त की नमाज़ भी अदा करती हूँ।“
“हाँ, बादशाह अकबर ने अपना धर्म ‘दीन-ए-इलाही’ हिंदू और मुसलमानों को एक करने के लिए चलाया था, पर अफसोस वह सफल न हो सका।“
“पर मुझे उम्मीद है कि हमारा प्राणामी धर्म असफल नहीं होगा।“
“क्या है तुम्हारा प्राणामी धर्म ? हमें भी उसके बारे में ज्ञान दो।“
“हमारे धर्म की नींव सिंध, उमरकोट में जन्मे महात्मा श्री देवचंदर महाराज (1581-1655 ई.) ने रखी थी। बचपन से ही वह धार्मिक रुचियों के थे। सोलह वर्ष की आयु में वह सब कुछ त्याग कर ब्रह्मज्ञान की खोज में भुज (कच्छ) और यमना नगर गए। उन्होंने निज आनंद संप्रदाय चलाया। वह यमना नगर में वेद, वैदांतिक, भगवानतम और तंत्र शिक्षा प्रदान करते रहे। उनके शिष्य अपने आप को ‘सुंदर सथ’ या ‘प्राणामी’ कहलाने लग पड़े। यमना नगर के दीवान केशव ठाकुर (1618-1694 ई.) का पुत्र महाराज ठाकुर उनका शिष्य बनकर महात्मा प्राणनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महात्मा प्राणनाथ जी ने प्राणमी धर्म को यात्राएँ करके बहुत फैलाया है। उन्होंने भगवत गीता और कुरान शरीफ पर आधारित छह भाषायी ग्रंथ तैयार किए -कुलसम सरूप। जिसमें गुज़राती, सिंधी, अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी रचनायें संकलित की गई हैं। इसके अतिरिक्त मिहर सागर और तंत्र (तरतम या तंत्रम) सागर हमारे दो अन्य धार्मिक ग्रंथ हैं। मेरे काकाजू महाराज छत्रसाल महात्मा प्राणनाथ जी को 1683 ई. में पन्ना के निकट माऊ में मिले थे। मेरा चचेरा भाई देव करनजी, प्राणनाथ जी को रामनगर में बहुत समय पहले मिल चुका था। उन्होंने ही काकाजू को मुगलों के साथ जंग होने से पूर्व प्राणनाथ जी का आशीर्वाद लेने के लिए भेजा था। स्वामी प्राणनाथ जी ने काकाजू को सरोपा और एक शमशीर देकर आशीष देते हुए कहा था कि जा, तेरी विजय होगी और तुझे हीरों की खानें मिलेंगी। तू महान राजा बनेगा। काकाजू ने पन्ना पर विजय प्राप्त की और वहाँ की हीरों की खानों के बारे में तो आप जानते ही हो। इस प्रकार, काकाजू और हम सब प्राणामी बन गए हैं। हमारा धर्म सर्व सम्प्रदाय का संदेश देता है और कहता है कि भगवान एक है और हर प्राणी में बसता है। आशा करती हूँ कि आप मुझे ऐसा करने से रोकेंगे नहीं।... पर यदि आप कहेंगे तो मैं सबकुछ छोड़ दूँगी।“
सादे वस्त्रों में भी मस्तानी के भर यौवना होने के कारण उसका सौंदर्य शिखर पर होता है। बाजी राव उसके भय से कांपते होंठों की संुदरता को बस देखता रह जाता है और वह स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह दौड़कर मस्तानी को झपटकर लिपट जाता है और उसके थरथराते अधरों को चूसना प्रारंभ कर देता है।
मस्तानी को नीचे लिटाकर बाजी राव उसके चेहरे पर चुम्बनों की आरती करने लग जाता है। सुरूर में आई मस्तानी बाजी राव को बाहों में कसकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए सहलाने लग जाती है। बाजी राव का वेग और अधिक प्रचंड और खूंखार हो जाता है और अगले ही पल दोनों निर्वस्त्र होकर आपस में गुत्थमगुत्था होते हुए संभोग समाधि में एकमेक हो जाते हैं।
कुछ समय के बाद बाजी राव की छाती पर मस्तानी केश बिखेरे गहन सोचों में डूबी पड़ी होती है। चिमाजी अप्पा के साथ सामना होने के बाद वह बहुत डर गई होती है और उसको अपने भविष्य की चिंता सताने लग पड़ती है। इस पल तक बाजी राव के व्यवहार में कोई परिवर्तन न आने के कारण मस्तानी समझ जाती है कि चिमाजी अप्पा ने अभी तक उसके भूतकाल के विषय में बाजी राव को कोई भेद नहीं खोला होगा। लेकिन वह यह भी जानती है कि इस राज को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। उसको अंदेशा पैदा हो जाता है कि कभी न कभी तो बाजी राव को वास्तविकता का पता चल ही जाएगा कि वह निजाम शाह जहान खान की रखैल रह चुकी है। इससे पहले कि चिमाजी अप्पा, बाजी राव को कुछ बताये, वह खुद ही अपने ढंग से सबकुछ साफ़ और स्पष्ट शब्दों में बता देने का निर्णय कर लेती है।
बीती पूरी रात मस्तानी अनेक कहानियाँ बुनती रही थी। पर जब वह बताने लगती तो उसको अपनी घड़ी हुई कहानी की पकड़ ढीली प्रतीत होने लगती और वह खामोश रह जाती। फिर वह नई कहानी अपने जे़हन में बुनती और खुद ही उसको नकार देती। बस, इस उधेड़बुन में ही मस्तानी के कल चिमाजी अप्पा के जाने के बाद से दिन और रात कट रहे थे।
बात तो सीधी सी थी कि दिल्ली के बादशाह ने निजाम-उल-मुल्क और राजपूतों को कुचलने के लिए शाह जहाँ खान को भेजा था। बुंदेलखंड पर होने वाले आक्रमण को रोकने के लिए मस्तानी ने शाह जहाँ की रखैल बनना कुबूल कर लिया था। इससे पहले कुछ समय वह एक दो अन्य निजामों के पास भी रह चुकी थी।
बाजी राव मस्तानी के केशों में हाथ फेरता है, “क्या बात है मस्तानी, आज बहुत चुप चुप सी हो ?“
“कुछ नहीं। असल में मैं आपको कुछ बताना चाहती थी।“
“बता फिर।“
“समझ में नहीं आ रहा कि कैसे बताऊँ।“
“जैसे सारी दुनिया बताया करती है, अपने मुँह से बता।“
“बात दरअसल इस तरह है कि कुछ साल पहले मैं निजामों की नर्तकियों के पास नृत्य सीखने जाया करती थी। वैसे तो मेरे उस्ताद मस्तान जी ने मुझे बहुत बढि़या ढंग से सिखाया था, पर मैं ग़ज़ल गायन और मुजरा लूटना सीखना चाहती थी। शराब का प्याला रखकर जो नाचना सीख गया, समझो वह नृत्यकला में निपुण और उस्ताद बन गया। शराब का भरा जाम नर्तकी से नाचते समय छलकना या बिखरना नृत्य में गंभीर दोष माना जाता है। मैं बस इसी में परिपक्वता हासिल करने गई थी वहाँ। इसलिए मैं कुछ देर एक दो निजामों के दरबारों में रही और कभी फरमाइश करने पर अपने फन का मुज़ाहरा भी कर दिया करती थी। फिर आपको तो पता ही है कि दिल्ली के बादशाह ने शाह जहाँ खान को बुंदेलों को दबाने और निजाम-उल-मुल्क को खत्म करने के लिए भेजा था। एक जंगी झड़प के दौरान शाह जहाँ खान ने मुझे बंदी बना लिया था। वह मुझे अपनी बेगम बनाना चाहता था। पर मैं नहीं मानी। उसने मुझे अनेक लालच दिए। परंतु मैंने अपनी चतुराई से उससे इस पर विचार करने के लिए कुछ मोहलत मांग ली। इस मिले वक्त में मैं उसकी कैद में से भागने की तरकीबें लड़ाने लग पड़ी।“ इसके बाद की कहानी खत्म हो जाने के कारण मस्तानी चुप हो गई और किस्से का अगला भाग सोचने लग पड़ी।
बाजी राव उसकी राम कहानी बहुत ध्यान से सुन रहा होने के कारण अंजाम जानने के लिए उतावला हो उठता है, “फिर कैसे आज़ाद हुई तुम ?“
इस समय तक मस्तानी अपने दिमाग में किस्से की अगली कड़ी जोड़ चुकी होती है, “बस, फिर क्या था। शाह जहाँ की फौज पर आपके मराठों ने आक्रमण कर दिया और वह मारा गया। उसके सैनिकों और कर्मचारियों को बंदी बना लिया गया। बस, उसी भगदड़ का लाभ उठाकर मैं नर्तकियों के टोले से अलग होकर छिपती छिपाती किसी तरह बुंदेलखंड जा पहुँची।“
बाजी राव ने अपने मस्तक में घूमती शंका को बाहर निकाला, “पर मैंने तो सुना है कि शाह जहाँ खान बहुत ज़ालिम था। उसने तेरे पर अत्याचार या जबरदस्ती नहीं की ?“
“नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर वह ज़ोर आजमाई या जबरदस्ती करता तो अपनी इज्ज़त को दाग लगने से पहले ही मैं अपनी अंगूठी का हीरा चाटकर मर जाती। आखिरकार मैं एक बुंदेलन हूँ। आत्म सम्मान हमारे लिए सबसे बड़ी चीज़ है। काकाजू ने जवान होते ही यह अँगूठी मुझे देकर कहा था कि यदि कभी मेरी सुंदरता, मेरे लिए श्राप बन जाए तो मैं अपनी अस्मत लुट जाने से पहले ही इस हीरे का प्रयोग कर लूँ। हमारे पन्ना की खान में से निकला हुआ यह विशेष हीरा है जो आप अंगूठी में जड़ा देख रहे हैं। इसे जीभ पर ज़रा-सा छुआते ही आदमी के प्राण पखेरू पलभर में उड़ जाते हैं।“ मस्तानी अपनी अंगूठी वाली तर्जनी का अगला पोर बाजी राव के होंठों पर फेरने लग जाती है। मस्तानी को यकीन हो जाता है कि बाजी राव ने उसकी सुनाई गाथा पर पूरा विश्वास कर लिया है।
बाजी राव झपट कर उसकी उंगली पकड़ लेता है, “मुझसे दूर रख इसे, कहीं मेरी जान भी न चली जाए।“
“हाय ! यह कैसी बातें करते हैं आप। ईश्वर मेरी आयु भी आपको दे दे।“ मस्तानी मुहब्बत में मस्त हो जाती है।
“बस, मेरी जान ! अब तू मराठों के पेशवा श्रीमंत बाजी राव बलाल बाला जी भट्ट की बायिको (पत्नी) बन गई है। अब कोई तेरे बारे में सपने में भी गलती से सोचने की हिमाकत नहीं करेगा। जानती है, जब मेरे बडील (पिता) की मौत हुई थी तो मैं तब केवल बीस वर्ष का था। छत्रपति को चिंता हो गई कि अगला पेशवा किसको नियुक्त किया जाए। मैंने छत्रपति के दरबार में सीना तानकर कहा था कि मैं यह उŸारदायित्व उठाने का प्रण करता हूँ और मुगलों को उठाकर हिमालय के पार फंेक दूँगा जहाँ से वे आए हैं। हिंदुस्तान हमारा है। मैं अपने भारतवर्ष की पवित्र धरती को गै़र जातियों और बाबरियों से स्वतंत्र करवाऊँगा। औरतबाज मुगल तो अफीमें खा खाकर पहले ही नकारा थे। मैंने कहा, मैं तनों को काटूँगा, फिर पŸो-टहनियाँ तो खुद ब खुद ही झड़ जाएँगे। मैंने शाहू जी को वचन दिया था कि केसरी मराठा परचम कृष्णा नदी से सिंधू दरिया तक और अटक के किले पर फहराकर दिखाऊँगा। दक्खिन का सारा सरमाया हमारा होगा और हम अपनी सरहदों को केन्द्रीय भारत से विस्तार देते हुए पूरे देश में फैला देंगे। शाहू जी महाराज मेरी दिलेरी देखकर प्रसन्न हो गए थे और उन्होंने मुझे पेशवा बना दिया था। मैंने भी फिर बाधाओं को चुन चुनकर दूर कर दिया। 1723 ई. में मालवा, 1724 ई. में धार और औरंगाबाद, 1728 ई. में पालखेड़ी के मैदानों में शत्रुओं की अच्छी तरह हौसले पस्त कर दिए थे।“
“सिद्धियों से फिर आपका क्या वैर है ? वे भी आपके शत्रु बने हुए हैं ?“ मस्तानी अचानक अपना प्रश्न कर देती है।
“सिद्धी या जिन्हें शीदी भी कहा जाता है, इन हब्शी लोगों को अरबी और पुर्तगाली गुलाम बनाकर इस्तेमाल करने के लए भारत में लेकर आए थे। इसलिए इन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म अपना रखा है। 628 ई. में भारोच तट, गुजरात में आकर सिद्धी बसे थे। बाकी उसके बाद 712 ई. में अरबी लोगों के साथ आए। हिंदुस्तान पर चढ आए प्रथम बाहरी हमलावर मुहम्मद बिन कासिम (31 दिसम्बर 695 - 18 जुलाई 715) की फौज में ही हब्शियों की भारी संख्या थी। वे इन बंनतू बोली बोलने वालों को ‘ज़ीना’ कहा करते थे। हट्टे-कट्टे होने के कारण इन्हें कठिन और भारी मजूदरी वाले कामों में इस्तेमाल किया जाता था। फिर ये अपनी ईमानदारी के कारण अमीरों और रजवाड़ों से उच्च ओहदे प्राप्त करते चले गए और इन्होंने जंजीरा (जफ़राबाद का एक टापू), गुजरात में अपना राज स्थापित कर लिया। भारत की पहली महिला शासक रजि़या सुल्तान उर्फ़ जलालत-उद-दीन रजि़या (1205- 14 अक्तूबर 1240) की एक कमाल-उद-दीन याकूत नाम के हब्शी गुलाम के साथ काफ़ी निकटता थी। कुछ सिद्धी मराठों की फौज में भी भर्ती हो गए थे। अम्बर मलिक जैसे सिद्धियों से मराठों ने युद्ध विद्या भी सीखी थी। उसने खिरकी नाम का नगर बसाया था जिसको औरंगजेब ने अपने नाम पर बाद में औरंगाबाद बना दिया था। अट्ठारहवीं सदी में यह सिद्धी आसिफ़ जाह निजाम के साथ मिलने के बाद मराठों के विरुद्ध हो गए। दरअसल मराठों और सिद्धियों के मध्य स्थिति तब तनावपूर्ण होनी प्रारंभ हो गई थी जब सिद्धी फौजदार, सिद्धी सताल सत ने कोकण के परशुराम मंदिर का अपमान किया और हमारे धर्माध्यक्ष ब्रह्ममहिंदरा स्वामी को अपमानित किया। यह 1729 ई. की बात है। सवनौर के नवाब ने जंजीरा के सिद्धियों को एक हाथी नज़राने के तौर पर दिया था। जब वह हाथी ब्रह्ममहिंदरा के आश्रम के समीप से गुज़र रहा था तो मराठों के एक सरदार कानोजी अंगारे ने उसको कब्जे़ में ले लिया। इसके बाद स्वामी ब्रह्ममहिंदरा की साजि़श समझकर सिद्धी फौजदार ने स्वामी ब्रह्ममहिंदरा का निरादर किया और उसके परशुराम मंदिर को ध्वस्त भी किया। स्वामी ब्रह्ममहिंदरा को मराठे अपना धर्मगुरू मानकर उसका बहुत सत्कार करते थे। इस कारण मराठों और सिद्धियों के बीच झड़पें होनी प्रारंभ हो गईं। उससे थोड़ा अरसा बाद 4 जुलाई 1729 ई. को कानोजी अंगारे का देहांत हो गया और उसके स्थान पर उसका पुत्र सेखोजी अंगारे मराठा सरखेल बन गया। सिद्धी सत को हमारा इतना खौफ था कि उसने लड़े बिना ही हमारी अधीनता स्वीकार कर ली। आज देख, सब तरफ बाजी राव...बाजी राव हुई पड़ी है। यह जैतपुर वाली ताज़ा जंग तो मुझे लड़ते हुए तुमने अपनी आँखों से देखा है।“ बाजी राव पूरी शेखी में आया पड़ा होता है।
मस्तानी बाजी राव को कसकर अपनी बाहों में भींच लेती है, “हूँ ! तभी तो आपकी मर्दानगी पर यह मस्तानी मर मिटी है। हाय ! मरहटा, कमबख्त मारकर ही हटा...।“
बाजी राव मस्तानी का चेहरा अपने हाथों में लेकर कहता है, “यूँ तो कंजरी तू है बहुत सुंदर। नाचती और गाती भी कमाल का है। तलवारबाजी भी कर लेती है। सेज पर भी पटाखे फोड़ती है। दृढ़ता, चतुराई, बहादुरी, सूझबूझ, महत्वाकांक्षी, अल्हड़, अनुभवी और जवान है। वो क्या कहते हैं - अद्भुत बŸाीस लक्षणों वाली महासुंदरी है यार मस्तानी तू तो।“
“लो, जाने भी दो, गप्प मारना भी कोई आप से सीखे। मैं कहाँ से बŸाीस लक्षणी हो गई ? बŸाीस लक्षण तो किसी भी इन्सान में पूरे नहीं होते। मनुष्यों में तो केवल चार-पाँच लक्षण होते हैं। देवताओं में चैदह और शिव भगवान में अट्ठाईस थे। जानते भी हो कि बŸाीस लक्षण कौन से होते हैं ?“ मस्तानी पाज़ी हँसी हँसती है।
“ले, तुमने क्या मुझे क्षत्रिय समझ रखा है। पंडितों का बेटा हूँ मैं। ब्रह्मज्ञान रखने वाला ब्राह्मण। तुझे नहीं पता कि स्कंद पुराण के काशी खंड में नारी और पुरुषों पर बŸाीस लक्षण बताए हुए हैं। उनकी पहचान शारीरिक अंगों की बनावट से की जाती है। वो ईश्वर तेरा भला करे... ऐसा बताते हैं कि पाँच दीर्घ होने चाहिएँ जो कि नेत्र, जबाड़ा(मुख वाक्य), नाक, बगल और बाहें हैं। पाँच सूक्ष्म बढि़या माने जाते हैं जैसे चमड़ी, केश, उंगलियाँ, दाँत, अंगों की गांठें। सात लाल हों तो उŸाम होते हैं जैसे हथेली, पैर के तलुवे, आँखों के कोये, तालुआ, जीभ, होंठ और नाखून। छह ऊँचे हों तो अच्छे होते हैं - रीढ़ की हड्डी, पेट, पसली, कंधे, हाथ के ऊपरी हिस्से, मुख। तीन विस्तार वाले अधिक आकर्षक लगते हैं जैसे मस्तक, छाती, नितम्ब। तीन छोटे हों तो सुंदर माने जाते हैं जैसे गर्दन, जाँघ, गुप्त अंग। अन्तिम तीन गंभीर हों तो अच्छे होते हैं जैसे स्वर, नाभि, स्वभाव।
मस्तानी हैरान होकर पूछती है, “अच्छा जी, आपको लगता है मेरे में ये सब लक्षण हैं ?“
“नहीं होंगे तो तेरे में पैदा कर देंगे, सुंदरी। आसान नहीं है इन बŸाीस लक्षणों का अभ्यास और पालन। दरअसल ये बŸाीस लक्षण होते हैं - सुंदरता, स्वच्छता, लज्जा, चतुराई, विद्या, सेवा, दया, सत्य, प्रियवाणी, प्रसन्नता, नम्रता, निष्कपटता, एकता, धीरज, धर्मनिष्ठा, संयम, उदारता, गंभीरता, उद्यम, शूरवीरता, राग, काव्य, नृत्य, चित्रकला, औषधि उपचार, रसोई, सिलाई-कढ़ाई, घर की वस्तुओं को यथायोग प्रयोग करना और सजाना, खुद और दूसरों का शिंगार करना, बुजुर्गों का सम्मान, अतिथि सत्कार, पतिभक्ति और संतान पालन।“
मस्तानी लाड़ में आकर छेड़ती है, “वाह, मेरे ऋषि वेदव्यास, आपको तो पूरा ज्ञान है। आप मनुष्य हो कि रावण ?“
“रावण ही हूँ जो तुम्हें उठा लाया है।“
“आपकी सोने की लंका की ख़ैर नहीं फिर अब।“
“हाँ, मैं भी वही सोचता हूँ कि कहीं अपने हुस्न के सेक से हमारा पूरा पूणा जलाकर न रख दे। आओ प्रिय, अब कलेजे में मचती अग्नि को ठंडा करें। मैं तुम्हारे साथ दैहिक मिलन के लिए तड़प रहा हूँ।“ बाजी राव मस्तानी को दबोच कर चकौटियाँ काटते हुए कामक्रीड़ा में मगन हो जाता है।
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