Monday, 2 November 2015

अध्याय-15

शाही कल्लोल


मस्तानी और बाजी राव का प्रेम नीलगगन की उड़ानें भरने लग जाता है।... छोटी-बड़ी जंगें होती रहती हैं। मस्तानी बाजी राव के साथ साधारण सैनिकों की तरह युद्ध में शामिल होती रहती है। देखते ही देखते, मस्तानी मराठा इतिहास के पृष्ठों पर बादल की भाँति छा जाती है। बाजी राव और मस्तानी का इश्क किसी के मुँह से नगमा बनकर गूंजता है और किसी के अधरों पर चुगली बनकर नाचता है। किंतु दिन आनंदपूर्वक व्यतीत होते रहते हैं।


एक दिन पूरी दोपहर तलवारबाजी का अभ्यास करने के उपरांत मस्तानी हमाम की ओर स्नान के लिए चली जाती है। कनीज़ स्त्रियाँ मस्तानी के वस्त्र उतारकर उसको चबूतरे पर लिटा लेती हैं। एक कनीज़ पैरों की ओर बैठकर मस्तानी के पैरों के तलुवे झसते हुए उंगलियों के पटाखे निकालने लग पड़ती है। दूसरी दासी सिरहाने बैठकर मस्तानी के गज़-गज़ भर लम्बें केशों को आंवले, शिकाकाई, नारियल और अरीठे डालकर बनाये गए चमेली के तेल से तर करने लग पड़ती है। तीसरी सेविका हल्दी, चंदन, केसर, बादाम, दूध, दही, मक्खन के बने मिश्रण का लेप मस्तानी के पूरे नग्न शरीर पर मलने लग पड़ती है। मस्तानी आँखें बंद किए आराम से शारीरिक अंगों पर होती मालिश का आनन्द उठाती लेटी रहती है।

“आलीजा, आप हर समय तेल मालिश ही क्यों करवाते रहते हो ?“ एक कनीज़ प्रश्न करती है।

मस्तानी अंगड़ाई लेती है, “नफ़ा पर बेचता हूँ, छिड़क कर सौदा ख़सारे का... मतलब कि सस्ता सौदा पानी छिड़कने से मंहगे दाम में बिक जाता है।“

मस्तानी की लटों को तेल लगाती हुई बांदी बोलती है, “हुजूरेआली ! बुजुर्गों से सुना करते थे कि मलिका नूरजहाँ के केश धरती को छूते थे। पर मैंने कभी किसी के इतने लम्बे बाल देखे नहीं थे। आपके घुटनों तक आते घने और चमकदार बाल देखकर आश्चर्य होता है। जब किसी को हम बताती हैं तो सुनने वाला यकीन नहीं करता। जब आप केश फैलाते हो तो निरा आबशार ही लगते हैं।“

“कुंवरसा, मेरे दादासा ज्योतिषी थे। मैंने थोड़ी-बहुत ज्योतिष विद्या सीखी है। आपके फूलों जैसे कोमल पैरों की रेखाओं का अध्ययन करने के पश्चात मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ये किसी साधारण स्त्री के पैर नहीं हैं। आप विशेष और अहम शख्सियत हो। मेरे हाथों में आज वो पैर हैं जिन्हांेने हिंदुस्तान के इतिहास में अपने निशान छोड़ने हैं।“ पैर झसती हुई सेविका बताती है।

दूसरी दासी बयान करती है, “मुगलों से सुना है कि कोह-ए-काफ़ की हूरें बहुत सुंदर होती थीं। पर मुझे नहीं लगता हमारी मस्तानी सरकार से हसीन भी कोई हो सकती है। फिरंगियों जैसा गोरा रंग, बिल्लौरी आँखें, तीखे नक्श, सुडौल गठीला बदन, खुदा द्वारा नाप तोलकर सही अनुपात में बनाया हर अंग, रेशम जैसी चमकती रूई की मानिंद नरम मुलायम चमड़ी।“

मस्तानी हुस्न के गुमान में आकर बीच में ही टोक देती है, “यूँ ही नहीं बना यह चमकीला और लचकीला बदन... बचपन से ही मैंने दूध, मलाइयों के साथ पाला है इस बदन को। बटने मल मलकर नहाती रही हूँ। मेरी अम्मी मुझे इत्र वाले संदली जल से स्नान करवाया करती थी।“

“यह तो प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। परियाँ भी देखें तो बेहोश होकर गिर पड़ें। आपके अंगों से तो बंदे की निगाह फिसलती है।“ मस्तानी के स्तनों पर देसी घी की मालिश करती हुई सेविका शरारत से एक स्तन दबा देती है।

मस्तानी की चीख निकल जाती है, “हा...य...! आहिस्ता.... प्यार से मालिश कर कमजात ! मारेगी मुझको ?“

“मार तो आपने दिया है पेशवा सरकार को, अपने हुस्न की कटारी से। पूरे पूना में धूम मची हुई है कि मराठे, मस्तानी से पटे ! मस्तानी सरकार आपके रूप के सारे हिंदुस्तान में डंके बजे पड़े हैं।“ मस्तानी के हाथों की उंगलियों के पटाखे बजाती सेविका फरमाती है।

पंखी से हवा कर रही दासी भी बोल उठती है, “हमारे पेशवा सरकार भी कौन सा कम हैं ?... जब लाखा जंगी लिबास और चमड़े का जे़रे-बख्तर पहनकर बादल घोड़े पर निकलते हैं तो निज़ामों की नारियाँ और मुगलानियाँ हमारे नीली आँखों वाले सांवले राजकुमार को पर्दों की ओट से ऐडि़याँ उठा उठाकर देखने लग पड़ती हैं। एकबार तो नवाब को जब पेशवा जी मिलने गए तो उसके हरम की सभी स्त्रियाँ पर्दों से बाहर पेशवा जी का दीदार करने आ गई थीं और गियास खान मुँह फाड़े देखता रह गया था। श्रीमंत और मस्तानी बेगम आपकी जोड़ी तो बिल्कुल राम-सीता की जोड़ी लगती है। राधा-कृष्ण की तरह आपकी प्रीत अमर हो जाएगी, मेरी बात याद रखना।“

मस्तानी यह सुनकर आँखें खोल लेती है और एक गहरा निःश्वास उसके अंदर से निकलता है, “हाँ, शायद इसी कारण भाग्य की कैकेयी हमें बनवास दिलाने पर तुली बैठी है।“

“आलीजा, दुख महान व्यक्तियों पर ही आया करते हैं। भगवान इन्सान को उतना ही कष्ट देता है जितनी तकलीफ़ें वह झेल सकता होता है। ग़म मनुष्य को शक्तिशाली बनाने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं। जीवन का संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाता है। बस, आप भी लव-कुश जैसी जोड़ी पैदा कर लो। एक सन्तान की ही कमी है आपके रिश्ते में। बच्चा होने पर ससुराल में औरत की कद्र बढ़ जाती है। देखना, सब ठीक हो जाएगा। आप भट्ट परिवार को अपने जैसा सुंदर और श्रीमंत जैसा बहादुर योद्धा बेटा पैदा करके दो। बस, एक मुल्गा(लड़का) नन्हा-मुन्ना सा पेशवा।“

मस्तानी का चेहरा लज्जा की लाली से गुलाबी हो जाती है, “मुल्गा ?... वाह, नन्हा-मुन्ना सा पेशवा ! बात तो तेरी सोलह आने सही है। पर डर जाती हूँ कि इन ब्राह्मणों के परिवार ने तो मुझे ही स्वीकार नहीं किया, मेरी सन्तान को कैसे स्वीकार कर लेंगे ?“

चंदन की लकडि़यों से बने कोयलों का सेक देकर मस्तानी के बालों को भाप देती एक वृद्ध कनीज़ फूट पड़ती है, “इस दुनिया में आने वाला हर इन्सान अपना भाग्य विधाता से लिखवा कर लाता है जी। यह आपका वहम है, सरकार। जब बड़े पेशवा विश्व नाथ जी का अन्तिम समय करीब आया था तो उन्हांेने मृत्यु से पहले बाजी राव जी के हाथ में भिक्खू जी का हाथ थमाकर उसका खयाल रखने की जिम्मेदारी सौंपी थी। आप स्वयं ही देख लो। पेशवा सरकार उतना अपने सगे भाई चिमाजी अप्पा का नहीं करते, जितना भिखू जी से प्यार करते हैं। उसको कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि सौतेला है। फिर यह तो पेशवा बाजी राव की अपनी सन्तान होगी। मुझे आशा है कि नाना साहिब से अधिक लाड़ करेंगे सभी घर वाले। पुरुष के मेल से स्त्री पूर्ण होती है और सन्तान पैदा करके सम्पूर्ण हो जाती है।“

मस्तानी मुस्कराती है, “अच्छा तो यह बात है ? ले फिर मस्तानी तो आँधी ला देगी। तुम बच्चों को खिलाने वाली बनो।“ अलफ़ नग्न मस्तानी उठकर गुलाब जल और इत्रों भरे हमाम में प्रवेश कर जाती है।

पेशवा बाजी राव आता है और दासियाँ उसके वस्त्र उतार देती हैं। निर्वस्त्र होकर बाजी राव मस्तानी के साथ जलकुंड में नहाने लग जाता है। गुनगुने पानी में वे दोनों मस्तियाँ करने लग पड़ते हैं। मस्तानी, बाजी राव को आलिंगन में भरकर उसकी गाल पर अपनी लटें घुमाती हुई पेशवा के कान में फुसफुसाती है, “मैंने सुना है, जल में किया संभोग महायज्ञ के समान होता है।“

पेशवा बाजी राव, मस्तानी की कमर को अपनी बांहों में घेरे में लेकर कस लेता है और उसकी आँखों में छलकती काम वासना को देखता है। वह अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह मस्तानी को चूमने के लिए तेज़ी से झपटता है जैसे रणभूमि में निज़ामों पर हमला किया करता है। पेशवा की ओर से की गई चुम्बनों की बरसात और प्रेम स्पर्शों का मस्तानी भी डटकर उŸार देती हुई उसके संग जलकुंड में ही आलिंगनबद्ध हो जाती है।

मस्तानी की शरारती आँखों में शरारत नृत्य कर रही होती है, “देखते हैं, आज प्रेम युद्ध में एक मराठा जीतता है या यह बुंदेलन।“

“जीत तो मराठा की ही होगी, मस्तानी, मेरी जान ! मराठा युद्ध में से यूँ ही पीछे नहीं हटा करता। तूने कहावत नहीं सुनी। मरहटा...मर के हटा या मार के हटा...।“ बाजी राव वेग में आकर मस्तानी को और अधिक शिद्दत से भोगने लग जाता है।

जल में हलचल मचाते बाजी राव और मस्तानी की प्रेमभाव को प्रकट करती आवाज़ें हमाम में गूंजने लग जाती हैं...“हूँ...हँ...हा....ऊँ...आ... हँ...अ...!!!“

हमाम का पानी किनारों से इस प्रकार टकराने लग जाता है मानो किसी सागर में भूचाल आया होता है।

...और फिर संभोग के शिखर पर पहुँचकर तूफान समाप्त होने के बाद मस्तानी और बाजी राव पानी में निढ़ाल होकर यूँ गिर पड़ते हैं जैसे घायल सिपाहियों की लाशें रणभूमि में पड़ी होती हैं।

मस्तानी मोह के साथ बाजी राव के बालों में हाथ फिराती है, “उफ्फ मेरे मराठे! जान निकालकर ही हटा।“

“क्या बताऊँ मस्तानी ! नशा करवाकर शरीर में से सारी जान ही निकाल लेती हो। सारा ज़ोर लग गया। देह बेजान हुई पड़ी है। पर तुझे छोड़ने को चि नहीं करता। मन करता है, और संभोग करूँ। सारी सारी रात तुझे भोगकर भी मन नहीं भरता। और बातों को छोड़, तू एकबार नज़ारा ही ला देती है। मेरी जान, आनन्द आ गया। ऐसा लगता है मानो दिल्ली के किले पर केसरी मराठा परचम गाड़ दिया हो।“

“और कौन सा झंडा गाड़ने की कसर छोड़ी है ? औरत के दिल से बड़ी कोई सल्तनत नहीं होती। जो वहाँ झंडा गाड़ लिया, समझो उसने दुनिया फतह कर ली !“ मस्तानी, बाजी राव को कसकर छाती से लगा लेती है।

“मस्तानी, जब तू मुझे आलिंगन में लेकर भींचती है या मेरे ऊपर सवार होकर क्रीड़ा करती हुई अपना लचकीला बदन पतली टहनी की भाँति मरोड़ती है न, धर्म से सच जान, मैं तो आनन्द के सरूर में मरने जैसा हो जाता हूँ।... कहाँ से सीखी है इतनी उम और आनन्द प्रदान करने वाली यह संभोग कला ?... अवश्य खजराहो(जिला-छत्रपुर, मध्य प्रदेश) के मंदिरों की कामुक मूर्तियों को देखती रही होगी, तभी तेरे अंदर इतना काम समाया हुआ है। मैं तो कईबार सोचा करता हूँ कि मूर्तिकारों ने ये मूर्तियाँ तुझे देख देखकर ही निर्मित की होंगी। भई, खूब लुच्चे हो तुम बुंदेली लोग तो। मंदिरों में भी लुच्चापन बिखेरे फिरते हो।“

मस्तानी, बाजी राव को बांहों में कसती हुई कहती है, “नहीं, मेरे पेशवा सरकार, फिर तो आपको खजराहो के मंदिरों में कामग्रस्त मुद्राओं में बनी नग्न और काम उकसाऊ मूर्तियों के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं है।“

“चल, तुम करवा दो ज्ञान, प्रिय !“ बाजी राव मस्तानी की गोरी गर्दन को चूमने लग जाता है।

“वास्तव में, खजराहो चंदेलों की राजधानी थी। यह संस्कृत के शब्द खजूरवखा का बिगड़ा रूप है। खज यानी खजूर और वखा, उसको ढोने वाला। खजूर गरम होती है और मनुष्य के अंदर काम भावनाओं को पैदा करती है। खजूर खाया करिए आप भी।“

“मेरे अंदर तो मस्तानी तुझे देखकर ही विलासी भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। हर समय मस्तिष्क में काम का भूत चढ़ा रहाता है।“

“हटो, झूठे कहीं के। अच्छा... मैं बता रही थी कि चंदेलों ने खजराहो में महादेव, लक्ष्मण, चतर्भुज आदि लगभग 85 मंदिरों का निर्माण किया था, इसलिए आज भी वहाँ हिंदू और जैन मंदिर भारी संख्या में देखने को मिलते हैं। पुरातन कथा के अनुसार हेमावती नाम की एक ब्राह्मण कन्या को चंद्रमा ने जबरन पकड़कर भोगा और फिर उसके एक बेटा हुआ। उसका नाम उसने चंद्रवर्मन रखा। इस चंद्रवर्मन से ही चंद्रवंशी चंदेलों के वंश का आगमन होता है। चंदेलों के शासन के समय युवक मठों में विद्या ग्रहण करने के लिए जाया करते थे और उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता था। इसलिए वे ग्रहस्थ जीवन से कोरे रह जाते थे। उनके अंदर काम जाग्रत करने और संभोग की शिक्षा देने के लिए चंदेलों ने क्रीड़ा मुद्राओं वाली मूर्तियाँ बनवाई थीं। फिर इन्हें मंदिरों के बाहर स्थापित इसलिए किया था कि लोग काम पर नियंत्रण रखकर काम से ऊपर उठ सकें। इसी में ग्रसित न रहें। यदि मंदिर मंे प्रवेश करने से पूर्व आपका उन उकसाऊ मूर्तियों को देखकर मन भटकता है तो इसका अर्थ है कि आपको अभी और साधना की आवश्यकता है। आप अभी प्रभु को प्राप्त करने की अवस्था में नहीं पहुँचे हो और मंदिर में जाने के योग्य नहीं हो। वरना उन मूर्तियों को उद्देश्य अश्लीलता का प्रदर्शन करना नहीं है।“

“अच्छा ! चल आ अब पहले एक भरपूर संभोग करते हैं और काम से ऊपर उठते हैं।“ बाजी राव अपनी बांहों में मस्तानी को उठाकर हमाम के कुंड में से बाहर आ जाता है।

पानी से बाहर निकलते ही पेशवा और मस्तानी के गीली देहों को सेविकाएँ सुंगधित वस्त्रों से पोंछ देती हैं। दोनों जन निर्वस्त्र ही एक दूजे से आलिंगनबद्ध होकर आरामगाह की ओर चले जाते हैं। बाजी राव गोल सिरहानों की टेक लगाकर शराब और हुक्का पीने लग जाता है। मस्तानी अफीम का टुकड़ा खाकर बाजी राव को पान परोसती है। बाजी राव गीत सुनने की इच्छा प्रकट करता है। मस्तानी गाती हुई नग्न नृत्य करने लग जाती है। दोनों पूरी रात एकसाथ दारू पीते और रंग रास में व्यस्त एक-दूसरे को प्रेम करते रहते हैं।

कई कई महीने ऐसी रंग रास की महफि़लों का सिलसिला चलता रहता है। बाजी राव और मस्तानी शराब के नशे में धु होकर एक दूजे को प्यार करते हुए रंगरेलियों का आनन्द उठाते रहते हैं।

दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासियाँ और शाही काम कल्लोलें करते हुए हुए बाजी राव का समय बहुत हसीन गुज़रता है। इस प्रकार के संभोग यज्ञ में आठों पहर, वार, सप्ताह, पखवाड़े, महीने और वर्ष मशरूफ होकर मस्तानी भी बाजी राव के इश्क में कुल आलम को भूल जाती है।

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