बिल्लौरी आँखें
जंग जीतने के उपरांत पेशवा बाजी राव, महाराजा छत्रशाल की सेना के साथ जैतपुर के किले में प्रवेश करता है। महाराज छत्रसाल आरती उतारने के पश्चात बाजी राव का केसर, चंदन और चावलों के साथ विजय तिलक लगाकर स्वागत करता है, “पेशवा जी, विजय मुबारक हो।...मैं किस मुँह से आपका धन्यवाद करूँ। मेरे पास तो आपका आभार प्रकट करने के लिए भी शब्द नहीं हैं।... यदि आप सही समय पर न पहुँचते तो हम सब मारे जाते या कै़द कर लिए जाते। मैं आपका यह अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा।“
“क्यों लज्जित करते हो महाराज। अन्याय होता तो बाजी राव की आँखों से भी नहीं देखा जाता। यह तो हमारा कर्तव्य था। बाकी निज़ामों के साथ तो हमारा पुराना हिसाब-किताब था जो हमने आज बराबर किया है। हमारा तो मुगलों और निज़ामों के साथ शुरू से ही वैर और नित्य का लड़ाई-झगड़ा रहा है।“ पेशवा बाजी राव अपनी फ़राखदिली दिखलाता है।
महाराजा छत्रसाल, बाजी राव को किले के अंदर ले जाता है, “आओ, अतिथि देवो भवः। आपका जैतपुर के किले में स्वागत है। आप भी थक गए होंगे। यहाँ ठहरकर कुछ दिन आराम करें। आपकी सुख-सुविधा का हर प्रकार से ध्यान रखा जाएगा। जब तक हम शहीद हुए सिपाहियों का अन्तिम संस्कार कर लें और घायलों का इलाज भी होता रहेगा।“
“जैसी आपकी इच्छा।“ 12 मार्च 1730 ईसवी के शुभ दिन बाजी राव अपने दल के साथ किले में प्रवेश कर जाता है।
पेशवा बाजी राव और उसके चुने हुए सरदारों, पिलाजी यादव, नारो शंकर, तुकोजी पवार, आनन्द राव मकाजी, उदाजी रवार, मलहार राव, दावालजी सोमवंशी और राणोजी गायकवड़ आदि के ठहरने का प्रबंध किले के अतिथिगृह में कर दिया जाता है और शेष सेना किले के बाहर तम्बू गाड़कर पड़ाव डाल लेती है।
महाराजा छत्रसाल के साथ भोजनालय में बैठकर बातें करता बाजी राव पूछ लेता है, “महाराज अपनी रियासत के विषय में कुछ बतायें ? हमारे लिए यह नया इलाका है।“
महाराजा छत्रसाल गर्व से बताना प्रारंभ करता है, “हाँ-हाँ। क्यों नहीं। हम सब बताते हैं। मध्य भारत में बसे इस विशाल बुंदेलखंड (अब उतर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों के बीच विभाजित है) के प्रमुख नगर बांदा, चित्रकूट, दतिया, टीकमगढ, राठ, ललितपुर, इलाहाबाद, कौशांबी, सागर, धमोह, ओरी, पन्ना, हमीरपुर, माहोबा, नरसिंहपुर, सतना, रीवा, सिद्धी, सिंहरौली और छतरपुर (1707 ई. में छत्रसाल ने छतर पुर अपने नाम पर बसाया था) हैं। हमारी तो मंशा थी कि झांसी, जलौन, बीजावर, चरखड़ी, समंथर, सरीला आदि भिन्न भिन्न् रियासतों को बुंदेलखंड में मिलाकर अजैगढ़ (बाद 1765 ई. में इसको बुंदेलखंड की राजधानी बनाया गया था) या छतरपुर को राजधानी बनाने की थी। पर लगता है, अब यह केवल एक स्वप्न ही रह जाएगा और हमें पन्ना को ही अपनी राजधानी बनाना पड़ेगा।“
“उम्मीद पर दुनिया कायम है। अभी भी सपने सच करने के लिए आपके पास बहुत समय है। महाराज, निराश क्यों हो रहे हो ?“ बाजी राव हाथ में पकड़ी बुरकी मुँह में डालता है।
महाराजा छत्रसाल भोजन चबाता हुआ बोलता है, “हाँ, समय पर ही सब कुछ निर्भर करता है। पर हमारी दूरअंदेशी बताती है कि ऐसा अब संभव नहीं हो सकेगा। कभी चंदेलों के समय खज़राहो, बुंदेलखंड की राजधानी हुआ करती थी। सोलहवीं सदी (1501 ई.) में बुंदेलों ने ओरशा को राजधानी बनाया। फिर हमारे पिता ने दातिया को राजधानी बना लिया। अब हम दातिया के राजपूतों के कलह-क्लेश में से निकलकर पन्ना को करीब दो सालों तक राजधानी बनाने की सोच रहे हैं।“
“आपने जो सोचा होगा, अवश्य अच्छा ही सोचा होगा। वैसे आपके बुंदेलखंड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है ? महाराज, कुछ उस पर भी प्रकाश डालें।“
बाजी राव का प्रश्न सुनकर महाराजा छत्रसाल कुछ पल मूक रहने के पश्चात कहना प्रारंभ करता है, “पुरातन ग्रंथों में जिस छेदी रियासत का उल्लेख आता है, वह यह बुंदेलखंड ही था। महाभारत के दुर्योधन और उनकी संतान यहाँ राज करती रही है। दसवीं शताब्दी के शुरू में (912-914) कालिंजर से शासन करते कन्नौज के प्रातीहरसां से चंदेलों ने इसी धरती पर आज़ादी ली थी। दसवीं सदी के मध्य (950) में चंदेल राजपूतों ने ग्वालियर के ऐतिहासिक किले को कब्जे़ में लिया। चंदेल राजा धंगा के पौत्र विद्याधारा ने 917-29 ई. तक चंदेलों की रियासत की सीमाओं को चंबल और नर्बदा नदी तक विस्तार देते हुए दूर तक बढ़ा लिया था। महमूद गज़नवी ने विद्याधारा के राज्यकाल के समय में आक्रमण किया था, पर वह सफल न हो सका। दसवीं से पंद्रहवीं सदी तक चंदेलों का बुंदेलखंड पर राज रहा। चंदेल राजा धंगाा ने 950-1008 ई. के दौरान अनेक बोध मठ, हिंदू और जैन मंदिर बनवाये। दसवीं सदी के मध्य से ग्यारहवीं के अध तक निर्मित हुए विलक्षण और प्रसिद्ध खजराहो के मंदिर भी चंदेलों ने ही बनवाये थे। बारहवीं सदी में अजमेर के शासक पृथ्वीराज चैहान ने भी चंदेलों के साथ टक्कर ली थी। तेरहवीं सदी में मुगलों की चढ़त से चंदेलों की रियासत सिकुड़ने लग पड़ी। पर जैसे तैसे वे सोलहवीं सदी तक अपने आप को कायम रखे रहे। फिर सोलहवीं सदी (1501 ई.) से बुंदेलों ने यह देश अपने अधीन कर लिया। बुंदेलों के आगमन से सोलहवीं सदी में बुंदेलखंड के पहले बुंदेल शासक रुद्र प्रताप जी ने राजधानी बनाने के लिए ओरशा की नींव रखी थी। सोलहवीं सदी (1545 ई.) मंे दिल्ली के सिंहासन पर बिराजमान शेरशाह सूरी की मौत कालिंजर को हड़पने के समय हुई। फिर दिल्ली के सुल्तान बुंदेलों पर हावी होते गए। सोलहवीं से अट्ठारहवीं सदी तक बुंदेलखंड, मुगलों के प्रबंध के अधीन रहा है और बुंदेल राजपूत बगावत करते हुए अपनी आज़ादी के लिए युद्ध लड़ते रहे हैं। अकबर ने विशेष मंत्री कल्पी से बुंदेलखंड का शासन चलाने के लिए नियुक्त किए थे। हमारे पिता ने अपना राज्य स्थापित किया। फिर हमने मुगलों की कै़द से आज़ाद होकर (1761 ई. में) विद्रोह का झंडा लहराकर यमुना नदी के दक्खिनी हिस्से को अपने अधीन कर लिया। उसके उपरांत (1761 ई. के बाद) हमने माऊ को अपने अधीन कर लिया। फिर अपने पिता की मृत्यु के लिए जिम्मेदार धंदरां से बदला लेने की ठानकर अनेक युद्ध किए। कार्य कठिन था, पर मैं भी हठी था। आखि़र, उन्हें भयभीत होकर साहरा के किले में छिपना पड़ गया। मैंने भी घेरा डाले रखा। जब उन्हें विश्वास हो गया कि छत्रसाल हार मानने वाला नहीं है तो उन्होंने मेरे समक्ष घुटने टेक दिए। फिर सुलहनामा करने के लिए मुझसे अपनी बेटी का रिश्ता भी किया।“
बाजी राव भोजन करता करता रुक जाता है, “बुंदेलों की बहादुरी के बहुत किस्से सुने हैं।“
“हाँ, कोई झूठ नहीं है पेशवा जी। बुंदेलखंड में सिंध, बेतवा (वरावती), शहिज़ाद, कैन, बागीहन, तोनस, पाउज, दशन और चंबल नदियाँ बहती हैं। काली सिंध मालवा से निकलकर बुंदेलखंड के पश्चिमी घाट को छूती है। इसके समानान्तर पूर्व की ओर बेतवा बहती है। कैन आगे चलकर बागीहन और तोनस का पीछा करती है। वैसे यमुना और कैन ही दो मातृ नदियाँ है जिनके जल को वर प्राप्त हैं, जिसे पीकर हमारे योद्धा निडर और बहादुर बनते और इतिहास लिखते हैं।“
“हाँ, बुंदेलखंड की नदियों के नीर को वरदान मिले होने की बात तो हम भी मानते हैं और इन नदियों के जल में स्नान करके बुंदेली स्त्रियाँ अपने हुस्न को सान पर लगाकर निखरती हैं। राजपूतों की बहादुरी का लोहा और राजपूतानियों के हुस्न की चकाचैंध को पूरा भारतवर्ष मानता है।“ बाजी राव बोलता बोलता अपने ही विचारों की दुनिया में गुम हो जाता है।
“आप कहते हैं तो सही ही कहते होंगे, श्रीमंत। हसीना को अपने हुस्न की तारीफ़ सुनना और बहादुर को अपनी बहादुरी बयान करना सदैव आनंदमयी लगा करता है। यदि मैं आपको बेज़ार न कर रहा होऊँ तो कुछ निजी जीवन के बारे में भी बताऊँ ?“ महाराजा छत्रसाल झिझकते हुए कह देता है।
बाजी राव डकार लेता है, “हमें तो बल्कि सुनकर खुशी होगी और आपके अनुभवों से कुछ सीखने को मिलेगा।“
“असल में जवान होते ही मैं सबसे पहले आपके क्षत्रपति शिवाजी भौंसले से मिला था। तब मैं मुगलों का दक्खिन में मनसबदार होता था। शिवाजी द्वारा मुगलों के विरुद्ध छेड़ी जंग के कारण मैं उनका प्रशंसक था। 1670 ई. (दिसम्बर माह) में दक्खिन आने पर मैं उनसे विशेष रूप में जाकर मिला। मैंने उनकी सेना में सेनापति के तौर पर भर्ती होने की विनती की ताकि मैं उनके साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध लड़ सकूँ। लेकिन आप तो जानते ही हैं कि छत्रपति थोड़े सनकी-से स्वभाव के थे। शिवाजी केवल दक्खिनी भारतीयों पर विश्वास करते थे। उतरी भारतीयों पर उन्हें इतना अवश्विास था कि कभी भी वह कोई पद या ओहदा उतारी हिंदुस्तानी को नहीं देते थे। शिवाजी मुझसे कहने लगे कि नहीं, आप अपने क्षेत्र में जा कर अपना राज्य स्थापित करो। आप अपने लोगों की सहायता से अपनी भूमि मुगलों से आज़ाद करवाओ। आवश्यकता पड़ने पर हम मुगलों के विरुद्ध आपके युद्ध में आपका साथ देंगे। मैं निराश होकर लौट आया। परंतु मैंने उनकी बात पर अमल किया। बुंदेलखंड में अपना राज्य स्थापित करके मैंने मालवा के सिरोजन इलाके की ओर रुख किया। वहाँ के फौजदार मुहम्मद हाशम और चैधरी आनंद राय बांका को मेरी शक्ति का अंदाज़ा होने के कारण उन्होंने पूरी तैयार कर रखी थी। मैं चढ़ाई करने चल पड़ा। रास्ते में केसरी सिंह धंदर भी मेरे साथ कुंदागिरी में आकर मिल गया। हमने अचानक हल्ला बोलकर शत्रुओं के पचास-साठ योद्धे मार गिराये। उन्हें विवश होकर सिरोजन के किले में शरण लेनी पड़ी। मैंने उन्हें घेरे में रखकर आसपास के इलाकों को अपने कब्ज़े में ले लिया। उसके बाद मैंने सिरोजन से उतर-पूर्व दिशा की ओर जाकर जैत पटेल राम के शाहूकार को अगवा करके उसका धन लूटा। वापसी में पिपरात को कुचलते हुए मेरी सेना ने धोरा सागर पहुँचकर डेरा डाला। वहाँ धमाजी राय और बहुत सारे गौंड आकर मेरे साथ मिल गए। हम बांदा से दक्षिण-पूर्व की ओर पड़ने वाले पवित्र शहर चित्रकूट थकान मिटाने और नए युद्ध के वसीले पैदा करने के लिए चले गए। धमोनी के फौजदार खलिक के साथ हमारी पत्थरी, सागर और सिद्धगौन में कई मुठभेड़ें हुईं। उसकी फौज अधिक थी और शक्तिशाली भी। इसलिए हमें माऊ की ओर लौटना पड़ा।“
बाजी राव बीच में टोक देता है, “पर मैंने तो सुना था कि आपने खलिक को हरा दिया था ?“
“सुनिये न, वही बता रहा हूँ। हमने मेवाड़ के इलाके बगेलां से जीते। उसके पश्चात खलिक के साथ हमारा दुबारा रानीगीर के मैदान में 1672 ई. में सामना हुआ। यहाँ खलिक की शिकस्त हुई और वह खुद तो भाग गया, पर उसकी सम्पत और हथियार हमने संभाल लिए। मैं काफ़ी ज़ख़्मी हो गया था इस युद्ध में और इलाज के लिए माऊ आकर ही ठहरा। धमोनी विजय करके अभी हटे ही थे कि बंसा के जागीरदार केशवरी डांगी ने हमारे संग पंगा ले लिया। मेरी सेना ने दो महीने बंसा में उसकी हालत खराब किए रखी। केशवरी हार गया और उसका बेटा विक्रम सिंह डांगी हमारी शरण में आ गया। हम जागीर और पचास हज़ारी की उपाधि के साथ उसको सम्मानित करके लौट आए।“
“आपकी बातें बहुत दिलचस्प हैं। सुनकर बहुत मज़ा आ रहा है। आपने भी मेरी तरह बहुत समय रणभूमि में ही बिताया है।... कोई और किस्सा सुनाओ।“ बाजी राव छत्रसाल को फूंक देता है।
“हाँ, योद्धा का जन्म ही लड़ने के लिए होता है, पेशवा जी। हम एकबार पतरी, बाकी खान की जागीर की ओर पाँच-छह घुड़सवारों के साथ शिकार खेलने गए हुए थे। वहाँ के गुप्तचरों ने हमारी मुख़बरी करके सैयद बहादुर को बता दिया। सैयद बहादुर की फौजों ने हमें घेर लिया। संयोग से बाकी की हमारी सेना भी निकट ही थी। हमारा घमासान युद्ध हुआ और हम सागर उनसे जीतकर माऊ लौट आए। इस प्रकार बहुत से किस्से हैं। पन्ना को जीतना... रौहीला खान को हराना... और बहुत कुछ। हमारे बारे में तो कवियों ने कविता भी लिखे हुए हैं, ‘इत यमुना, उत नरबदा, इत चंबल, उत तोंस/छतारसाल सो लड़न की, रही ना काहू होंस।’ अर्थात यमुना से नर्बदा तक और चंबल से तोंस दरिया तक किसी की हिम्मत नहीं है जो छत्रसाल से पंगा ले। पर जवानी और सेहत से ही आदमी इतिहास लिख सकता है। खैर, रात खत्म हो जाएगी, पर बात खत्म नहीं होगी। फुर्सत में आपको सब सुनाएँगे। अब आप आराम करिये।“
“जी हाँ, अब तो नींद भी आ रही है। आपका भोजन बहुत स्वादिष्ट था।“ बुंदेल दास, बाजी राव के हाथ धुला देते हैं।
लम्बे सफ़र और जंग के कारण थका होने के कारण बाजी राव उस दिन भोजन करने के बाद बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में सो जाता है।
अगले दिन देर से जब पेशवा बाजी राव की आँख खुलती है तो उसके कानों में बहुत ही सुरीले स्त्री स्वर में भजन गायन के शब्द पड़ते हैं। बाजी राव वो मिठासभरी, रसभीनी-सी आवाज़ सुनकर एकदम अपने पलंग पर से उठकर बैठ जाता है।
बाजी राव को मधुर भजन गायन सुनकर अजीब प्रकार की शांति का अनुभव होता है। वह खड़ा होकर खिड़की में से बाहर देखता है। उसके कमरे के सामने ही किले के अंदर बने मंदिर में कोई लड़की भगवे वस्त्र पहने तानपुरा बजाती हुई बंदगी कर रही होती है।
बाजी राव अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह मंदिर में बैठी लड़की की ओर खिंचा चला जाता है। बागीचे में से होता हुआ पेशवा मंदिर के समीप पहुँच, मंत्रमुग्ध होकर खड़े खड़े ही भजन सुनता रहता है। भजन की समाप्ति पर जैसे ही पेशवा मंदिर के अंदर प्रवेश करता है तो बाजी राव को देखकर ठिठकी हुई वह लड़की फुर्ती से तानपुरा नीचे रख देती है।
बाजी राव आगे बढ़कर उस लड़की को बुलाने का यत्न करता है। पर वह ‘खम्मागणी’(आदरसहित नमस्कार) पेशवा सरकार।“ कहकर अपने पल्लू से अपना मुँह ढक लेती है।
पेशवा उसको कुछ कहने के विषय में सोच ही रहा होता है कि वह कोई अन्य शब्द साझा किए बिना ही पंजों के बल हिरनी की भाँति उछलती-कूदती वहाँ से भाग खड़ी होती है।
बाजी राव उस गोरवर्ण नवयुवती की शक्ल तो अच्छी प्रकार से देख नहीं पाता, परंतु उसकी कशिश भरपूर बिल्लौरी आँखें बाजी राव के सीने में बरछे की भाँति धंस जाती हैं। ठीक ऐसी ही बिल्लौरी आँखों का दीदार बाजी राव ने एक दिन पहले युद्ध के मैदान में भी किया था। काले वस्त्रों में बुंदेलों की एक सैनिका की पगड़ी का एक सिरा तलवारबाजी करते हुए खुल गया था। उस वक्त बाजी राव बिल्कुल उस महिला सैनिक के सामने बंगशों के छक्के छुड़ा रहा था। जैसे ही, उस नारी की बिल्लौरी आँखों में आँखें डालकर बाजी राव ने देखा था तो एक पल के लिए तो उस स्त्री का हुस्न देखकर बाजी राव के होश उड़ गए थे और वह तलवार चलानी भूल गया था। बाजी राव ने इतनी हसीन सूरत कम से कम अपनी ज़िन्दगी में तो पहले कभी नहीं देखी थी।
बाजी राव को टकटकी लगाये देखते उस सैनिका ने फुर्ती से अपना चेहरा पगड़ी का सिरा खोंसकर फिर से छिपा लिया था। वहाँ से अपना घोड़ा भगाकर दूर जाती हुई वह बहुत देर तक बाजी राव की ओर पीछे मुड़ मुड़कर देखती रही थी। बाजी राव की नज़रें उसका तब तक पीछा करती रही थीं, जब तक वह युद्ध में लड़ते सिपाहियों के बीच गुम नहीं हो गई थी।
इस पहली नज़र के साथ ही वे बिल्लौरी आँखें, बाजी राव के साथ कोई अमर रिश्ता बना गई थीं। एक गहरा निमंत्रण छुपा हुआ था उन नज़रो में... मुहब्बत के लिए विशेष निमंत्रण पत्र दे रही थीं वे आँखें... और जन्म-जन्मांतरों का साथ निभाने की प्रतिज्ञा उस दृष्टि मंे से झलकती थी। बाजी राव बुरी तरह सम्मोहित हो गया था। बड़ी कठिनाई से बाजी राव ने अपने आप को संभाला था लड़ने के लिए। उसके बाद तमाम युद्ध के दौरान वही बिल्लौरी आँखें बाजी राव की नज़रों के आगे टिमटिमाते तारों की तरह मंडराती रही थीं। बिल्लौरी आँखों वाली यह भजन गायिका रणभूमि में दिखी वही सैनिका थी।
बाजी राव बागीचे में बहुत देर तक टहलता रहता है। बाजी राव की निगाहें नारी गृह की तरफ ही केन्द्रित हुई रहती हैं। वह उस बिल्लौरी आँखों की तलाश में बहाने, बेहाने से पूरे किले में भंवरे की भाँति भिनभिनाता हुआ मंडराता रहता है। परंतु उस बिल्लौरी आँखों वाली के बाजी राव को दुबारा दर्शन नहीं होते।

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