मुजरा
संध्या समय पेशवा बाजी राव और उसके सरदारों के लिए महाराजा छत्रसाल द्वारा भोजन की विशेष दावत दी जाती है। भोजन के पूर्व मनोरंजन के लिए नृत्य-गान होता है। शराब और अनेक प्रकार के शर्बत वितरित किए जाते हैं। दारू पीता हुआ बाजी राव काफ़ी मदहोश हो जाता है। महाराजा छत्रसाल बाजी राव की खूब खातिरदारी करता है। पेशवा बाजी राव के लिए विशेष रूप से विभिन्न प्रकार के पकवान बनवाये जाते हैं।
महाराजा छत्रसाल खुद यद्यपि शाकाहारी है, पर वह बाजी राव के लिए मांसाहारी आहार खास तौर पर बनवाता है। आवभगत करता हुआ स्वयं महाराजा छत्रसाल, बाजी राव के पास जाकर पूछता है, “श्रीमंत, कैसी है हमारी दावत ? आशा करता हूँ कि आपको आनन्द आ रहा होगा ? यदि किसी प्रकार की कोई कमी या किसी वस्तु की ज़रूरत हो तो निःसंकोच बता दें, यह दास उसे तुरंत पूरा करने का यत्न करेगा।“
“शेष तो सब बहुत उतम है।... दारू तो आपकी लाजवाब है। अति उतम ! और मंगा लो।... याद रखो, मराठा बाजी राव पेशवा पी रहा है...!“ पेशवा बाजी राव के अंदर से सुच्चे मोतियों की भस्म वाली इलायचीदार शराब बोलती है।
महाराजा छत्रसाल यह देखकर खुशी से फूला नहीं समाता है, “हम तो श्रीमंत इसका सेवन नहीं करते। हमारे प्राणामी धर्म में यह वर्जित है। बस आपके जैसे विशेष अतिथियों की सेवा के लिए यह आब-ए-जन्नत रखा हुआ है।“
“आब-ए-हयात तो सुना था, पर आब-ए-ज़न्नत ?“ बाजी राव जाम में पड़ी शराब में अपना चेहरा देखता है।
“हाँ, जनाब-ए-आली ! इसको पीते ही व्यक्ति खुद को जन्नत में पहुँचा हुआ अनुभव करने लगता है और उसको इंद्र के अखाड़े की अप्सराएँ नृत्य करती दिखाई देने लग जाती हैं।“ महाराजा छत्रसाल शेखी बघारता है।
“इसमें कोई शक नहीं। हम स्वर्ग लोग का नज़ारा देख रहे हैं, आपका आब-ए-जन्नत पीकर... पर अप्सराओं और परियों का नृत्य हमें दिखलाई नहीं देता। शायद हमारी दृष्टि कमजोर है ! बुंदेल सम्राट, मुझे बेहद अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि संगीत का प्रबंध आपका बहुत अच्छा नहीं। यह ठंडी-सी ठुमरी... आपकी नृत्यांगनाओं को ठीक से ढाई मात्रे भी नहीं आते... मुर्दा से साज बजाने वाले और शोक-सा गीत-संगीत। शहनाइयों के मातमी राग सुनकर ऐसा लगता है जैसे मैयत पर आए हुए हैं।... शायद हमारी नाट्यशाला ही सबसे उतम है कि हमें दूसरों किसी महफ़िल में कुछ अच्छा ही नहीं लगता।... आपके दरबारी कवि लाल और भूषण में भी कोई अधिक दम दिखाई नहीं देता।... क्या आपके पास कोई जबरदस्त मुजरे वाली नहीं है जो एक ऐड़ी मारकर सारी पृथ्वी हिलाकर रख दे ?... जिसके पैरों में बंधे घुंघरुओं की छनकार दशम द्वार खोल दे और ऐड़ी की धमक धरती धंसाते हुए सीधी कलेजे में बजे।... या कोई ऐसी गायिका नहीं है जिसका गीत सुनकर सागर की लहरें भी रुककर सुनने लगे ? ... कोई चंचल-सी कंचनी या गायिका जो बस समां बांधकर रख दें ?“ नशे में डूबा बाजी राव दरअसल अप्रत्यक्ष रूप से उस बिल्लौरी आँखों वाली के बारे में पड़ताल करना चाहता है।
महाराजा छत्रसाल कुछ पलों के लिए सोच में पड़ जाता है और फिर दाढ़ी खुजलाता हुआ बोलता है, “अच्छा ! यह बात है तो पेशवा जी अपने दिल पर हाथ धर लो। आपको दिखलाते हैं जलवा…।“
महाराजा छत्रसाल अपने दास को बुलाकर उसके कान में फुसफुसाकर कोई आदेश देता है।
अगले ही क्षण सभी साज़िंदे बदल जाते हैं। नृत्यमंच का पर्दा धीमे धीमे पीछे हटता है। नए साज़ छिड़ जाते हैं। लाल और सुनहरी रंग के लहंगे वाली एक लम्बा घूंघट किए बैठी नवयौवना ग़ज़ल गाना आरंभ करती है। उसकी पहली टेर पर ही बाजी राव आवाज़ पहचान लेता है और चुस्त होकर बैठ जाता है। ज्यूँ ही वह ग़ज़ल का मतला गाती हुई अपने गोरे दिलकश और नूरानी मुखड़े पर से घूंघट उठाती है तो बाजी राव की आँखों से उसकी चिंगारियाँ छोड़ती बिल्लौरी आँखों का सीधा सामना हो जाता है। बाजी राव को अपने दिल की धड़कन वहीं की वहीं रुक गई महसूस होती है। वह एकाग्रचित होकर बिल्लौरी आँखों वाली अट्ठारह उन्नीस वर्ष की नवयौवना नर्तकी का नृत्य बग़ैर पलके झपकाये देखता रहता है। सुनहरी और चाँदी के गोटे की कढ़ाई वाले हीरे मोती से जड़ा लहंगा, तंग चोली और जबरदस्त हार-शृंगार तथा कमर तक चमकते सुनहरी रंगत देते केश उस हुस्नपरी को और अधिक खूबसूरत बनाकर पेश कर रहे होते हैं।
उसकी सुंदरता देखकर बाजी राव के होशोहवास गुम हो जाते हैं और उसको खाने या पीने की कोई होश नहीं रहती। दीवानगी के आलम में मदहोश हुआ बाजी राव किसी अन्य ही दुनिया में विचरने लग जाता है। उसको सब कुछ स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। नर्तकी के नाज-नख़रों और ज़ालिम अदाओं पर बाजी राव बुरी फिदा हो जाता है। नृत्य की ताल और ठेके, बाजी राव के दिमाग में गूंजने और हलचल मचाने लग जाते हैं।
“धा धिन धिन धा, धा धिन धिन धा, धा तिन तिन ता, ता धिन धिन धिन। (तीन ताल सोलह मात्रा। विभाग चार, तीन ताली, एक खाली)। धा धी ना, शा ती ना(दादरा, छह मात्रा, दो विभाग, एक ताली, एक खाली)।... धिना धिधा तिरकिट धिना धिधा तिरकिट धाधा तिरकिट धाधा तिरकिट धिना धिधा तिरकिट तूना किड़नग तागे ता तिरकिट (ताल लक्ष्मी, अट्ठारह मात्रा, विभाग पंद्रह, पंद्रह ताली, कोई न खाली)... ता... था... थइया...थइया...थम्म !!!“ नर्तकी नाच नाचकर आँधी ला देती है।
बाजी राव को उस कंचनी पर नृत्यदेव नटराज की कृपा और कंठ में सरस्वती का वास प्रत्यक्ष दिखलाई देता है। बाजी राव प्रसन्न होकर वाह-वाह कर उठता है।
नृत्य समाप्त होने पर बाजी राव शराब वितरित कर रहे एक बुंदेल दास से पूछता है, “यह कौन है जिसके जादुमयी हुस्न और दिलकश आवाज़ ने सारे आलम को मस्ताना बना दिया है ?“
“पेशवा सरकार, यह मस्तानी है !“ कहकर दास आगे बढ़ जाता है।
“मस्...ता...नी ! वाह ! मस्तानी ! कितना उपयुक्त नाम है इस सुंदर बाला का। जितनी हसीन खुद है, उतना ही दिलचस्प और खूबसूरत इसका नाम है। मस्...ता...नी...। हाय, मैं मर जाऊँ मस्तानी...मस्तानी...मस्तानी...।“ बाजी राव खुद अपने आप से स्वकथन करता हुआ मस्तानी के ख़यालों में गुम रहता है। उसके बाद वह महफिल में उपस्थित होता हुआ भी अनुपस्थित हो जाता है।
रात मंे बिस्तर पर लेटकर बाजी राव अपने सिरहाने को मस्तानी की कल्पना कर कस कसकर बांहों में भरता रहता है। उसकी सारी शराब उतर चुकी होती है। बल्कि यह कह लो कि मस्तानी का नृत्य देखते हुए उसको शराब तो चढ़ी ही नहीं थी। यदि कोई नशा बाजी राव के दिल-दिमाग पर हावी होता है तो वह मस्तानी की तिलस्मी सुंदरता की मदहोशी होती है।
रातभर मस्तानी को याद करते हुए बाजी राव करवटें बदल बदलकर रात बिताता है। कभी युद्ध में देखी बिल्लौरी आँखें बाजी राव को दिखाई देने लग जाती है जो क्रोध की चिंगारियाँ छोड़ती बाजी राव को देखकर एकदम शांत और निर्मल हो गई थीं।... कभी मंदिर में देखीं भक्ति में लीन-विलीन निश्छल और मासूम बिल्लौरी लोचनों का दृश्य उसके सामने आ जाता है।... और कभी नृत्य के समय सन्मुख हुए कामोतŸोजक बिल्लौरी नयन उसके आगे विद्यमान हो जाते हैं जो प्रेम और भक्ति की अमृत धारा बरसा रहे होते हैं।... कभी उसको मुजरा करती नर्तकी के नशीले बिल्लौरी नेत्र के साथ हुई मुठभेड़ सामने आ जाती है जो सौ सांपों के डंकों से भी अधिक असरदार और लूट लेने की सामथ्र्य रखती है।
रात के अँधेरे में बाजी राव अतिथिगृह की छत को निहारता उन बिन काजल कजलाये मशालों की तरह दिपदिपाते नयनों की कल्पना करता रहता है। खुली आँखों से ख्वाब देख रहे बाजी राव को मस्तानी कभी चंडी, कभी मीरा और कभी मेनका बनकर दिखाई देने लग जाती है। जंगजू, भक्तिनी और अप्सरा वाले मस्तानी के तीनों रूपों के साथ बाजी राव को इश्क हो जाता है। मस्तानी के विषय में सोचते ही बाजी राव का दिल धड़कने की बजाय फड़कने लग जाता है। बाजी राव, सारी रात मस्तानी की याद में नीर बिन हाँफती मीन की भाँति तड़पकर बिना सोये ही बिताता है। नींद उसकी आँखों से बगावत करके रूहपोश हो जाती है।

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