Monday, 2 November 2015

अध्याय-13

झड़प


मस्तानी को बाजी राव के जीवन में आए दो वर्ष का समय बीत चुका होता है। 1730 ई. के मध्य में बाजी राव अहमदाबाद की जंग में उलझा होने के कारण मुगलों के साथ भिड़ने के लिए चला जाता है और पीछे मस्तानी अकेली रह जाती है। दिन रात वह बाजी राव की यादों में खोई रहती है।


चिमाजी अप्पा प्रायः मस्तानी से मिलने के लिए कोथरूड़ आता रहता है और उसकी आवश्यकता की वस्तुएँ देकर चला जाया करता है। लेकिन एक दिन चिमाजी अप्पा मस्तानी से मिलने जाता है तो रात में वहीं ठहर जाता है।

चिमाजी अप्पा उस दिन बहुत उदास होता है और दोपहर से ही निरंतर शराब पीने के कारण शाम तक बहुत अधिक शराबी हो जाता है। शराब पीते पीते चिमाजी अप्पा अचानक ज़ोर ज़ोर से रोने लग पड़ता है। मस्तानी उसका रुदन सुनकर उसके पास जाती है। अतिथिगृह के द्वार में प्रवेश करते ही मस्तानी देखती है कि चिमाजी अप्पा हाथ में जाम लिए गलीचे पर लेटा पड़ा होता है। मस्तानी ने ऐसी अवस्था मेें चिमाजी अप्पा को पहले कभी नहीं देखा होता।

मस्तानी, चिमाजी अप्पा को उठाकर बिठाती है, “देवरसा, यह आज आपको क्या हो गया है ?“

चिमाजी अप्पा मस्तक पर बल डालकर बड़ी कठिनाई से आँखें खोलता है, “वाहिनी सा...हि...बा ! मुझे रोको नहीं। मैं आज मदिरा पी पीकर मर जाऊँगा।“

“क्यों मरना है ? यह कैसी बातें कर रहे हैं आप ?“ मस्तानी, चिमाजी अप्पा के करीब ही गलीचे पर बैठ जाती है।

चिमाजी अप्पा की शराब उतरने लग जाती है।

“मैं ठीक कह रहा हूँ। यह भी कोई जि़न्दगी है। स्त्री के बिना पुरुष का क्या हाल होता है ? यह मैं ही जानता हूँ। आज आपकी देवरानी रकमा बाई की बहुत याद आ रही है। रकमा को मरे दो महीने हो चले हैं(उसकी मृत्यु अगस्त 1730 ई. में हुई थी)। महीने भर के सदाशिव राव (चिमाजी अप्पा और उसकी पत्नी रकमा बाई का पुत्र) को मेरे पास छोड़कर वह भगवान के पास चली गई। मैं बहुत अकेला रह गया हूँ...।“

“ईश्वर की करनी को कौन टाल सकता है ? मुझे आपके साथ पूरी सहानुभूति है। आप दूसरा विवाह कर लें।“ मस्तानी अप्पा को दिलासा देती है।

“आई तो बहुत कह रही है कि मैं अनपूर्णा बाई से विवाह करवा लूँ, पर...।“
“पर क्या ?“

“ले, वो बच्ची सी मेरी क्या ज़रूरतें पूरी करेगी ? मुझे तो कोई दूसरी खेली खाई नखरैली औरत चाहिए।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी के चेहरे पर अपनी दृष्टि गड़ा लेता है।

मस्तानी अपनी नज़रें झुका लेती है, “दूसरी कौन ? कौन सी औरत ?“

“वही जो मुर्गाबी की तरह चलती है...जिसकी सुराही जैसी बिलांद भर लम्बी गर्दन है...जो मोरांे की तरह ठुमक ठुमक कर नृत्य करती है... कोयल की तरह सुरीला गाती है... लौटे जैसी जिसकी कमर है...जंगी हाथी की भाँति हमेशा झूल झूलकर मस्त चाल से चलती है...बस, वही मृगनैनी चाहिए हमें तो चिŸा बहलाने के लिए...।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी के समीप खिसक जाता है।

मस्तानी, चिमाजी अप्पा की बदनीयत भाँपकर दूर खिसक जाती है, “यह क्...क्या कह रहे हो ? किसकी बात करते हैं अ...आप ?“

“अभी भी नहीं समझी। मस्तानी, मैं तेरी बात करता हूँ। कंजरी, तू दिन रात आँखों में रड़कती है।“ चिमाजी अप्पा झपटकर मस्तानी को बांह से पकड़कर खींचता है और अपने आलिंगन में लेकर चूमने लग पड़ता है।

“नही...। मुझे छोड़ दो।“ मस्तानी उसकी पकड़ से छूटने के लिए ज़ोर लगाती है।

परंतु अप्पा उसको अपनी बाहों में और अधिक कसकर भींचते हुए फर्श पर गिरा लेता है और उसके ऊपर चढ़ जाता है, “तवायफ़ ! तवायफ़ों की तरह पेश आ। अधिक शरीफ़जादी बनने कोशिश न कर। तेरे ये नखरे मेरे सामने नहीं चलने वाले।“

चिमाजी अप्पा की पकड़ में से आज़ाद होने का संघर्ष करती मस्तानी अपनी कमर में बंधा छुरा निकालकर चिमाजी की छाती पर वार कर देती है और उसको धक्का देकर दूर फेंकती हुई उठ खड़ी होती है, “अप्पा, अपनी औकात में रह। मुझे कमज़ोर स्त्री न समझना। मस्तानी हूँ मैं, मस्तानी। बुंदेलखंड की राजपूतनी। फाड़कर रख दूँगी।“

चिमाजी अप्पा द्वारा मोटे वस्त्र पहने होने के कारण छाती पर छुरे से मामूली सा चीरा आता है। चिमाजी अपने ज़ख़्म को स्पर्श करते हुए छुरा लिए खड़ी मस्तानी की ओर देखता हुआ उठने का यत्न करता है, “मुझे भी निजाम न समझना। मराठा हूँ, मराठा ! मस्तानी, देखना मराठे ही करेंगे तेरे दांत खट्टे। दो कौड़ी की वेश्या और ये तेवर ? देख लूँगा तुझ बड़ी वेश्या को... अभी बनाता हूँ तुझे बंदी, कंजरी कहीं की।“

चिमाजी अप्पा तीव्र गति से मस्तानी पर झपट पड़ता है। मस्तानी, चिमाजी अप्पा के हाथ आने से पहले ही भागकर दीवार पर ढाल से टंगी तलवार खींच लेती है, “अप्पा, पहली और आखिरी बार कह रही हूँ। मेरी ओर दुबारा आँखें उठाकर भी देखा तो आँखें निकाल लूँगी और तेरा वो हश्र करूँगी जो वारंगल की रानी तेलंगाना ने उसकी अस्मत को हाथ डालने वाले नवाब का किया था। तेरी भलाई इसी में है कि तू चुपचाप यहाँ से चला जा और दुबारा मेरी नज़रों के सामने न आना, नहीं तो मैं बहुत बुरा करूँगी।“

मस्तानी चंडी का रूप धारण किए खड़ी होती है। चिमाजी अप्पा अवसर की नज़ाकत को समझ जाता है और लज्जित सा होकर वहाँ से चला जाता है।

मस्तानी, बाजी राव से अप्पा के साथ हुई इस झड़प के विषय में कोई बात नहीं करती। लेकिन इस घटना के बाद मस्तानी हर समय बाजी राव के अंग-संग रहने का निश्चय कर लेती है और युद्धों के दौरान भी बाजी राव के संग ही जाने का मन बना लेती है।

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