काम और मुहब्बत
बारिश हो, आँधी हो, बाजी राव सदैव शुरू से ही तड़के जल्दी उठकर बिना नागा कसरत और युद्ध अभ्यास करने का अभ्यस्त रहा है। लेकिन मुजरे से अगली सवेर उसका कुछ भी करने को मन नहीं करता। न उसको भूख लगती है और न ही प्यास। स्नान करने के बाद तैयार होते हुए उससे तो अपने गले में मराठों के प्रतीक चिह्न वाली मोतियों की मालायें भी ठीक से सब की सब पहनी नहीं जातीं। यहाँ तक कि बाजी राव को पूरे वस्त्र पहनने की भी होश नहीं रहती। वह केवल कमर पर लांगड़वाली लुंगी बांधकर मुँह फाड़े एकटक देखता हुआ मस्तानी के बारे में सोचता गुमसुम, चुप्पा बनकर स्थिर बैठा रहता है। मस्तानी के ख़यालों में खोये हुए को न अपने आसपास की होश होती है और न ही वह किसी के साथ कोई बातचीत करता है।
बाजी राव बिना देखे हुंकारा भरता है, “हूँ !“
“पेशवा जी ?“
“हूँ…?“
“पेशवा सरकार !“
“हूँ ? बक... क्या बकवास करनी है मूर्ख ?“
“श्रीमंत...। सर...का...र.. हैं कि ना...।“
“हूँ... हाँ।“
“हाँ... क्या जी ?“
“वही जो तू कहता है।“
“पर मैंने तो अभी कुछ कहा ही नहीं जी।“
बाजी राव सिर झटककर तुकोजी पवार की ओर देखता है, “इतनी देर से यूँ ही मगज़ खाये जा रहा है ? शीघ्र भौंक जो भौंकना है ? मेरा मस्तानी में ध्यान लगा हुआ है।“
“पेशवा जी, कल रात से देख रहा हूँ। आपने जब से मस्तानी का नृत्य देखा है, कुछ मुरझाये से लग रहे हो। कुशल तो है ?“
“कुशल ही तो नहीं है तुकोजी पवार जी। आप मुरझाये होने की बात छोड़ो। मैं तो बिल्कुल ही जड़ से उखड़ा पड़ा हूँ तब से। धर्म से कलेजा खींचकर निकाल लिया है जादूगरनी ने। किसी घायल परिन्दे जैसी अवस्था है मेरी। न ठीक से सांस आता है और न ही जान निकलती है। असीम सौंदर्य दिया है ईश्वर ने उसको। इंद्र के अखाड़े की रंभा, मेनका और उर्वसी जैसी अप्सराओं को मात देती थी रात को नृत्य करते हुए। मेरे तो कानों में अभी भी उसके घागरे के घुमाव और उसके घुंघरूओं की छनकार गूंज रही है। रात में जब वह गोल गोल फूल-से बनाती हुई नाच रही थी, मुझे तो यूँ प्रतीत होता था जैसे मैं शिवजी होऊँ और वह पार्वती बनकर मुझे प्रसन्न करने के लिए ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही हो। आफ़रीन गायकी और मधुर आवाज़...लाजवाब नृत्य और कमाल की भावों की अभिव्यक्ति... गजब की सुंदरता और गोरा गठा हुआ शरीर... क्या खाकर जन्मा होगा इसकी माँ ने इस लम्बी छरहरी सी आग जैसी को ! जा कंजर, मालूम कर कि यह मस्तानी कौन है ? मेरा तो उसके मखमली बदन पर लेटने को दिल कर रहा है। मन करता है, उठाकर ले जाऊँ। क्यों न इसे पुणे में सारी जि़न्दगी अपने दरबार में रखें। कमबख्त, मैं तो मर जाऊँगा मस्तानी के बग़ैर...।“ बाजी राव तड़के ही खाली पेट हाथ में पकड़ा जाम मुँह को लगा लेता है।
तुकोजी पवार भी रालें टपकाने लग जाता है, “हाँ श्रीमंत, यह औरत सुंदर तो मुझे भी बहुत लगी थी। मैं तो रात से अपने आप ही अपने अंगों को दबा दबाकर तसल्ली दिए जाता हूँ। इस शराब की सुराही जैसी को उठाने के लिए मैं भी मुजरा देखने के समय से हाथों पर थूकता फिरता हूँ, सरकार।“
“क्या कहा ? मस्तानी सिर्फ़ मेरी है। समझे ? यूँ न लांगड़ उठाये घूम। साला बैडि़यों का न हो तो... गांव बसा नहीं, मंगते पहले ही आ गए। बड़ा आया उठाने वाला... साले, पृथ्वी राज चैहान है तू ? ख़बरदार दुबारा मस्तानी के बारे में भूलकर भी ऐसा नहीं सोचना।“ बाजी राव आँखें निकालकर गुस्से में देखता है।
तुकोजी पवार काँप उठता है, “हुजूर, मेरे कहने का तात्पर्य था कि सुंदर तो खूब है। यदि यह नर्तकी अपने पूना दरबार की शोभा बन जाए तो अपनी नाट्यशाला को चार चाँद लग जाएँगे। मैं तो खुद रात से ही सोचे जा रहा हूँ कि ब्रह्मा ने पहले कागज पर नक्शा बनाकर पूरी तरह नापतौल कर बनाई होगी। इसको बनाते हुए कई बार गिराया होगा और फिर जाकर यह सर्वश्रेष्ठ देह तैयार हुई होगी। पहली बार में तैयार होने वाली कलाकृति तो नहीं लगती है जी। बिल्कुल ही चलता-फिरता ताज है हुजूर। धर्म से अग्निबाण जैसी आँखें हैं मस्तानी की पेशवा जी।“
बाजी राव खीझ पड़ता है, “अरे मूर्ख, आँखों की याद न दिला। मेरा तो रात से बुरा हाल हुआ पड़ा है। बातें ही बनाये जाएगा या इसके बारे में कुछ जानकारी भी लाएगा ? मैं बताऊँ, मुझसे तो सब्र नहीं होता...। आज रात को... अव्वल तो अभी उसको मेरी सेज का शृंगार बनाने का प्रबंध करो। नहीं तो मैं बुंदेलखंड की ईंट से ईंट बजा दूँगा। मराठा हूँ मैं, मराठा। अपना तो गुज़ारा नहीं होता मस्तानी के बग़ैर।“
बाजी राव का चहेता सरदार पिलाजी यादव कमरे के अंदर प्रवेश करता हुआ कहता है, “इसकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी, श्रीमंत। मैंने सब खोज कर ली है। यह मस्तानी कुंवर महाराज छत्रसाल की एक मुस्लिम रानी (वास्तव में रखैल, रानी नहीं) की बेटी है।“
“अच्छा ? मैं भी सोचता था कि यह हिंदू तो हो नहीं सकती। ऐसा नायाब हीरा अपने ब्राह्मण नहीं तराश सकते। यह करिश्मा तो राजपूत और एक मुगलानी के मिलन से ही हो सकता है भाऊ (मराठी में ‘भाऊ’ बड़े भाई को कहते हैं)। हुस्न से झोलियाँ तो ईश्वर मुस्लिम स्त्रियों की ही भरता है। ये मुसलमान तो अपने हिंदुओं की मिन्नते करते हैं कि ज़रा इस्लाम कुबूल करो, जन्नत में तुम्हें हूरें देंगे। खूबसूरत स्त्रियों को हरमों में रखने के शौक ने इन साले मुगलों की नसल सुधार दी है। सुंदर स्त्रियों की कोख से आगे और अधिक सुंदर लड़कियाँ पैदा होती जाती हैं। इसलिए मुगलानियाँ बेहद हसीन और आकर्षक हुआ करती है। हाय ! गऊ माता की सौगंध ! बेशक आधी मुसलमानी है, पर फिर भी मुझे इस मुसलमानी के साथ इश्क करने की सोचकर ही दुगना नशा चढ़े जाता है, पिलाजी।“ बाजी राव अपने समीप पड़ी सुराही में से और शराब डालकर पीने लग जाता है।
पिलाजी यादव अपने चतुर दिमाग को खुरचता है, “और क्या श्रीमंत, इश्क करना और आदमी को सेज सुख देना तो ये मुस्लिम स्त्रियाँ ही जानती हैं जी। अपनी ब्राह्मण स्त्रियाँ तो चुम्मी देते हुए भी राम राम जपे जाती हैं। दूर मत जाइये। आपको मैं अपनी पंडिताइन की बात सुनाता हूँ जी... एक बार खासी रात हो गई। वो तो मेरे पास आने का नाम ही न ले। मैंने तो प्रतीक्षा में करवटें बदल बदलकर बिस्तर का कचूमर निकाल दिया। इस तरह बल डाल दिए जैसे चादर घड़े में से निकाली हो। खीझकर मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई - भागवान मेरा पेटा (मराठा पगड़ी) ला जल्दी से। वह रसोई में से ही बोली - मैं कहूँ, आधी रात को पेटा बांधकर कहाँ जाना है ? मैंने कहा, मुझे चैथ पर दक्खिन की सरदेशमुखी लेने जाना है। औरत के टखनों में अक्ल होती है। वह फिर भी कुछ न समझी। बना संवारकर बोली - दिन तो चढ़ जाए। तड़के चले जाना। मैंने तो जी खीझकर रसोई में जाकर पकड़ ली। मैंने कहा, तू क्या समझती है, अगर हमें सरदेशमुखी घर में न मिलेगी तो कहीं बाहर भी नहीं मिलेगी। नाट्यशाला वाली तो नित्य हांकें लगाती हैं... तब कहीं जाकर वो समझी जी। फिर आकर मेरे संग लेट गई। लाश सी बनकर साड़ी उतारते हुए भी ‘हरे कृष्ण...हरे कृष्ण’ करती रही। मैंने ज़ोर से एक थप्पड़ उसके मुँह पर दे मारा। मै बोला - साली, बड़ी द्रौपदी न बन। तेरा खसम हूँ, दुर्योधन नहीं कि तेरा चीर हरण करने लगा हूँ और तू भगवान कृष्ण को इज्ज़त की रक्षा के लिए बुला रही है।“
बाजी राव खिलखिलाकर हँसने लग जाता है, “यादव, अजीब है तुम्हारा परिवार भी... कंजर के, मुझे कब मस्तानी के सुंदर शरीर की सरदेशमुखी मिलेगी ? मुझे प्रेम हो गया है मस्तानी से, प्रेम रे ! मर जाऊँगा अगर मस्तानी न मिली तो।“
पिलाजी यादव मचलकर कहता है, “पेशवा जी, महाराजा छत्रसाल हमारा कर्जाई है। हमने उसकी जान, माल और रियासत की रक्षा की है। इसके एवज में मिलने वाली ‘चैथ’ (रक्षा करने के बदले मेहताने के रूप में रियासत की आमदनी का चैथा हिस्सा जो टैक्स के रूप में मराठों द्वारा वसूला जाता था।) के साथ यदि आप कंचनी मस्तानी को भी मांग लो तो मजाल है कि वह इन्कार कर जाएँ।“
“एक बात समझ में नहीं आती, महाराज छत्रसाल ने अपनी बेटी को कंचनी बनाकर हमारे सामने मुजरा क्यों करवाया है ?“ वहमी राणो गायकवाड़ भी बातचीत में सम्मिलित होते हुए कहता है।
“आप नहीं जानते गायकवाड़ जी। महाराज छत्रसाल की उन्नीस रानियाँ और अनेक दासियाँ हैं। राजा-महाराजा असल संतान और अपने उŸाराधिकारी तो पटरानियों और कुछ चुनी हुई रानियों से पैदा हुई औलाद को ही मानते हैं। बाकी को तो अपनी गलतियाँ समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं। हो सकता है, यह मस्तानी भी किसी दासी की ही पैदाइश हो ?“ बाजी राव अपना अनुमान प्रकट करता हुआ मस्तानी को प्राप्त करने की तरकीबें बुनने लग जाता है।
आनन्द राव मकाजी कमरे में पसरती जा रही खामोशी को तोड़ने का यत्न करता है। वह अपनी बात एक गाली से शुरू करते हुए कहता है, “उन्नीस रानियाँ और पैंतीस चालीस दासियाँ, रखैलें हैं छत्रसाल के हरम में ? धन्य है भाई। मैं तो सोचता हूँ, इतनी औरतों को महाराजा छत्रसाल खिलाता क्या होगा ?“
“यह न पूछो उन्हें क्या खिलाता होगा, यह पूछो इतनों के लिए महाराजा खुद क्या खाता होगा ?“ ख़यालों के चक्रवातों में से निकलकर बाजी राव तुरंत जवाब देता है।
कमरे के वातावरण में सभी का ठहाका गूंज उठता है।
राणो गायकवाड़ से भी कहे बिना नहीं रहा जाता, “यह राजे-महाराजे भी औरतों के साथ भोजन वाला व्यवहार करते हैं। जब छ्त्तीस प्रकार के पकवान सामने परोसे गए हों तो व्यक्ति सब कुछ नहीं खा सकता। बस, बुरकी बुरकी सभी व्यंजनों में से लगाकर ये रजवाड़े पेट भर लेते हैं।“
आनन्द राव मकाजी दिलचस्पी दिखाता हुआ आनन्द लेता है, “और बाकी बचा भोजन ?“
“बाकी बचा दासों के पेट भरने के काम आता है, भाऊ। संभव है, मस्तानी भी महाराजा की छोड़ी जूठ में से किसी दास के छके हुए भोजन का नतीजा हो ?“ सदैव गंभीर रहने वाला मल्हार राव मुँह खोलता है।
बाजी राव सभी को झिड़कता है, “चुप रहो ! हरामियो। तुम भी दूसरे की गोद में बैठकर दाढ़ी बनाने लग जाते हो। याद रखो, हम इस समय महाराजा छत्रसाल के अतिथि हैं। चलो, काम करो अपना और मुझे एकांत बख़्शो।“
सभी वहाँ से अपने अपने ठिकानों की ओर चले जाते हैं। बाजी राव अपने कक्ष में दारू पीता हुआ फिर से मस्तानी के कामुक सपनों और विलासी सोचों में डूब जाता है। जैसे जैसे वह मस्तानी के विषय में सोचता जाता है, वैसे वैसे उसके हृदय के अंदर मस्तानी के प्रति मुहब्बत बढ़ती जाती है। वह मन ही मन मस्तानी को इश्क करने लग जाता है। दूसरी ओर हवस भी उसके अंदर हिलोरे लेने लगती है। बाजी राव के जे़हन में पैदा हुई कामेच्छा भी दुगनी होकर बढ़ने लगती है और वह अधीर होकर बिस्तर पर लेटते ही तड़पने लग जाता है।

No comments:
Post a Comment