Tuesday, 3 November 2015

अध्याय-10

फैसला

बाजी राव और मस्तानी को यह विवाहित जीवन की खुशियाँ अधिक देर नसीब नहीं होतीं। बाजी राव के बेटे नाना साहिब की पूर्व में तय की गई शादी निकट आ जाती है।

विवाह की तैयारियों में समस्त परिवार का व्यवहार मस्तानी के साथ यकायक बदल जाता है। काशी बाई का व्यवहार तो पहले दिन से ही मस्तानी के प्रति ईष्र्यालू और झगड़ालू ही रहा होता है। काशी बाई अपने पुत्र नाना साहिब को भड़का कर बाजी राव के साथ लड़वा देती है।
 
नाना साहिब अपने पिता बाजी राव को घेरकर खड़ा हो जाता है, “मेरी शादी के रंग में भंग डालने के लिए यह कौन है जिसे उठा लाए हो ? आपको शर्म नहीं आई ? एय्यासियाँ करने के लिए यही समय मिला था ? आप मेरे पिता नहीं, शत्रु हो।“

“मुँह संभालकर बात कर नादान लड़के। यह न भूल, मैं केवल तेरा पिता ही नहीं, पेशवा भी हूँ। मस्तानी मेरी स्त्री है। मेरी उनतींस साल की आयु हो गई है। ऐसे तो मैं कभी बड़े बुजुर्ग लोगों से आज तक नहीं बोला, जैसे तू ज़बान चला रहा है। कल का बच्चा है तू। नौ दस साल का है और यह तेवर ? बड़ा होकर क्या रंग लगाएगा ?“ बाजी राव भी पूरे क्रोध में आ जाता है।

इस प्रकार पिता-पुत्र काफ़ी समय तक तू तू, मैं मैं करते लड़ते झगड़ते रहते हैं तो राधा बाई उनको शांत करने के लिए बीच में आ जाती है, “बाजी राव, तू ठंडे दिमाग से सोच... यह गंभीर मामला है। मस्तानी को यहाँ देखकर लोग तरह तरह के सवाल हमसे करेंगे। हम क्या जवाब देंगे ? किस किस का मुँह पकड़ेंगे ? भिहू बाई के पति अभाजी जोशी और बारामती वाले समधी क्या कहेंगे ? वंकटराव गोरपड़े और अनू बाई के ससुराल इशालकरन जी वालों का खानदान हमारे मुँह में हाथ देगा ? तेरे बाबा के भाई नारायण कृष्णा जी, रुद्रा जी विश्वनाथ, विट्ठल जी विश्वनाथ(सभी रिश्तेदारों में लगते चाचा-ताऊ) और सबसे अधिक डर हमें राजमाचीकर वंशियों (बाजी राव के पिता के दूसरे ससुराल वाले) का है। हम किस किस की ज़बान को पकड़ेंगे ? क्या कहेंगेे, हम सबको कि मस्तानी कौन है ?“

बाजी राव तर्क प्रस्तुत करता है, “इसमें बुराई ही क्या है ? कह देना, मस्तानी मेरी दूसरी पत्नी है। मेरे बाबा की भी तो दो पत्नियाँ थीं। महाराज शाहू जी की चार बेगमें हैं। छत्रपति शिवाजी ने आठ विवाह करवाये थे। शहंशाह अकबर ने छŸाीस विवाह करवाये और हरम में तीन सौ स्त्रियाँ रखी थीं। बादशाह शाहजहाँ के तीन निकाह हुए थे। आलमगीर औरंगजेब की पाँच बीवियाँ थीं। निज़ाम और नवाब कितने कितने विवाह करवाते हैं। एक से अधिक स्त्री रखना शासक के लिए गौरव की निशानी है। बहु विवाह रुतबे और शक्ति का संकेत होते हैं।“

“वे मुगल बादशाह थे और तू एक हिंदू पेशवा है। और फिर, मस्तानी तेरी रखैल है। क्या हमारे समाज के सामने तेरा उसके साथ विवाह हुआ है ? बाबा ने मराठी ब्राह्मण स्त्री के साथ शादी की थी। तू एक मुसलमानी, खत्राणी...राजपूतानी या जो भी यह है, जिसको तुम उठा लाए हो। हम चितपवनी उच्च कुल के ब्राह्मण हैं। इसको कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?“ चिमाजी अप्पा भी अपनी टांग अड़ा देता है।

बाजी राव जि़रह करता है, “फिर बुंदेलखंड से आया दाज-दहेज़ देखकर तब क्यों आँखें बंद कर ली थीं ? आपको यह सब अब याद आ रहा है ?“

“बाजी राव, आप कोई दूध पीता बच्चा नहीं हो जो तुम्हें हर बात समझानी पड़े। मराठा कौम का मान हो आप और एक पेशवा भी। मौके की नज़ाकत को समझो और कुछ समय के लिए मस्तानी को उसके मायके में भेज दो। फिर शादी के बाद यह वापस आ जाएगी।“ चिमाजी अप्पा अपना सुझाव देता है।
“नहीं। ऐसा कतई नहीं होगा। मस्तानी वहीं रहेगी, जहाँ मैं रहूँगा।“ बाजी राव डट जाता है।

“तेरा बहुत समय तो युद्ध के मैदानों में बीतता है। कल रणभूमि में भी इसको साथ ही लेकर जाएगा ?“ राधा बाई खीझकर बोलती है।

“हाँ, ले जाऊँगा। कान खोलकर सुन लो... मैं मस्तानी के बारे में एक भी शब्द नहीं सुनना चाहता। ऊब गया हूँ, सफाइयाँ देते और समझाते हुए। मैं मस्तानी को लेकर कोथरूड़ (ज्ञवजीतनकए ादवूद ज्ञवजीतनक ठंह पद जीम मतं व िजीम च्मेीूंेए पे जीम ूमेजमतद ेनइनतइ व िजीम बपजल व िच्नदमए डंींतंेीजतं पद प्दकपंण् ैपजनंजमक तमसंजपअमसल दमंत जीम बमदजतम व िंद पदकनेजतपंसप्रमक बपजलण् ज्ञवजीतनक पे दवू वदम व िजीम नचउंतामज ंतमंे व िच्नदम) जा रहा हूँ। आपको शादी की रस्मों में मेरी ज़रूरत हुई तो बुला लेना। विवाह में मैं और मस्तानी शामिल होंगे और एकसाथ रहेंगे। नहीं तो नहीं। बस, यही मेरा अटल फैसला है।“

तैश में आकर बाजी राव ससवाद (ैंेूंक वे ं बपजल ंदक उनदपबपचंस बवनदबपस पद च्नदमए डंींतंेीजतंण् ैंेूंक पे ेपजनंजमक वद जीम इंदो व िज्ञंतीं तपअमत) छोड़कर मस्तानी को साथ लेकर कोथरूड वाडे की ओर चला जाता है। बाजी राव की अनुपस्थिति में शादी की कार्रवाई जारी रहती है। बाजी राव की माँ राधा बाई कुछ आवश्यक रस्मों में अकेले बाजी राव को शामिल होने के लिए मनाने चली जाती है, “बेटा बाजी राव, हमें जग में तमाशा न बना। घर चल और अपने बेटे के शगुन मना।“

“नहीं। मेरा कहा पत्थर की लकीर है। मैं अपना फैसला सुना चुका हूँ। मुझसे रोज रोज कुŸो सा मत भौंकवाओ। जहाँ मस्तानी नहीं जा सकती, वहाँ मैं भी नहीं जाऊँगा।“ बाजी राव आवेश में आ जाता है।

मस्तानी, माँ-बेटे का वार्तालाप ओट मंे खड़ी होकर सुन रही होती है। मस्तानी से प्रभावित तो बाजी राव पहले ही बहुत होता है, लेकिन इस समय मस्तानी को अपनी सूझ बूझ और लियाकत दिखाने का एक और अवसर मिल जाता है। वह पर्दे के पीछे से निकलकर बाहर आती है और राधा बाई के चरण स्पर्श करके बाजी राव को संबोधित होती है, “स्वामी। मुझ नाचीज़ को लेकर आपको घर में क्लेश नहीं डालना चाहिए। आपके परिवार वाले अपनी जगह पर सही हैं। मेरे एकदम आपके पुत्र के विवाह में प्रकट होने से आपके चरित्र पर अनेक प्रश्नचिह्न लग जाएँगे। आपकी अब तक की बनी हुई छवि बिगड़ जाएगी। मेरे विचार में आपको अकेले ही इस खुशी के अवसर में सम्मिलित होकर परिवार की खुशियों को साझा करना चाहिए। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके परिवार विशेषकर आपका बेटा नाना साहिब और बहू द्वारा मुझे कभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा। वह मुझे सदैव बखेड़े खड़े करने वाली कहकर धिक्कारा करेंगे। मेरी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि आप ससवाद जाकर विवाह में शामिल हों और खुशियों का आनन्द उठायें। बहुत सारी रस्में ऐसी हैं जो आपके कर-कमलों से ही सम्पूर्ण होनी चाहिएँ। जाइये और अपने कर्तव्यों को पूरा करिये।“

“पर तुम्हें यहाँ अकेली छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ ?“ बाजी राव दहाड़ता है।
मस्तानी बाजी राव की बांह पकड़ लेती है, “मैं कौन सा कहीं भाग चली हूँ ? मैं यहीं हूँ। आपके जाने से मुझे भी आपके परिवार के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने का अवसर मिल जाएगा। विशेषकर मुझे लेकर जो आपकी पत्नी काशी बाई के मन में घृणा और जलन है, वह कषैलापन भी मर जाएगा। माता श्री चलकर आए हैं। बुजु़र्गों का मान रखना हमारा धर्म और कर्तव्य है।“

राधा बाई बीच में बोल पड़ती है, “हाँ, मस्तानी ठीक कह रही है। मेरे सफ़ेद बालों की नहीं तो इसकी ही बात मान ले ? बाजी राव, भट्टों का स्वाभिमान मिट्टी में नष्ट करने का तुझे कोई हक नहीं है। कुछ दिनों की ही तो बात है। और फिर, अपनी इज्ज़त ढकी रह जाएगी। शीघ्र ही सब अतिति अपने अपने घरों को लौट जाएँगे। फिर जो चाहे कंजरियों को नचाते रहना।“

राधा बाई मस्तानी की ओर तिरछी नज़र से देखकर शांत हो जाती है। बाजी राव खामोश खड़ा मस्तानी की ओर देखता है। मस्तानी सिर हिलाकर बाजी राव को चले जाने के लिए प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार मस्तानी बाजी राव के व्यक्तित्व पर अपनी योग्यता का गहरा प्रभाव डाल जाती है। बाजी राव अपना निर्णय बदलकर अनमने-से मन से चला जाता है और अपने कर्तव्य निभाकर शीघ्र ही वापस मस्तानी के पास लौट आता है।

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