संग्राम
चिमाजी अप्पा अपने मन-मस्तिष्क में मस्तानी के विरुद्ध एक गुप्त जंग का बिगुल बजा देता है और मस्तानी को तंग करने के लिए राजनीतिक चालंे चलनी प्रारंभ कर देता है। सर्वप्रथम वह मस्तानी के विरुद्ध पाँचवे छत्रपति महाराजा शाह के पास जाकर उनके कान भरने का प्रयत्न करता है, “देखो महाराज, हमारे योद्धे को क्या हो गया है ? बस एक मामूली सी नर्तकी ने उसको अपनी उंगलियों के इशारों पर नचा रखा है। यदि हमने अवसर को न संभाला तो हमारा मराठों का भविष्य बहुत धुंधला हो जाएगा।“
छत्रपति शाहू, चिमाजी अप्पा की बात सुनकर बहुत देर तक चुप रहने के पश्चात बोलते हैं, “ऐश करने दो, अप्पा। यूँ ही व्यर्थ की चिंता न कर। चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं। बाजी राव बहुत समझदार है।“
चिमाजी अप्पा अपनी बात नीचे लगती देखकर और ज़ोर लगाता है, “इससे पहले कि एक कंजरी हमारी गौरवशाली मराठा इतिहास का अंग बन जाए, हमें कुछ करना चाहिए। इस प्रकार मूक दर्शक बनकर तमाशा देखने से काम नहीं चलेगा।... बाजी राव की जगह रणभूमि में है, न कि एक मुसलमानी के नृत्य मंच पर ! वह तो दिन रात उसी के पल्लू से बंधा रहता है। आपकी बात बाजी राव कभी अनसुनी नहीं कर सकता। आपने उसको पेशवाई प्रदान की है। इसलिए आप ही उसको समझाकर सीधे रास्ते पर डालें ताकि वह इस मस्तानी का पीछा छोड़कर युद्धकार्यों की ओर ध्यान दे सके। हम समस्त भारतवश मंे मराठा राज फैला सकें। एक स्वतंत्र हिंदू राज पैदा करने का छत्रपति शिवाजी ने जो स्वप्न देखा था, उसको हम कैसे पूरा करेंगे ?“
“पेशवा बाजी राव के काम से कोई शिकायत नहीं है और यह उनका पारिवारिक मामला है। जिसमें छत्रपति द्वारा किसी प्रकार की दख़लअंदाजी करना उचित नहीं होगा। मेरे विचार में तुम्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।... और हाँ, अप्पा, गुस्से में कुछ ऐसा न कर देना जिसके लिए बाद में तुम्हें पछताना पड़े। याद रखना, मस्तानी की ओर आग करोगे तो सेक सबसे पहले बाजी राव को लगेगा। बाजी राव बहुत चाहता है मस्तानी को। हाँ, कमबख्त, सुंदर भी बहुत है।“ महाराजा शाहू अपने सिर खुजलाता हुआ चिमाजी अप्पा को टाल देता है और चले जाने कहता है।
छत्रपति द्वारा इन्कार किए जाने पर चिमाजी अप्पा धर्म गुरू महाराज ब्रह्ममहिंदरा स्वामी के पास अपनी शिकायत लेकर जाता है। चिमाजी अप्पा जानता है कि महाराज शाहू के बाद केवल गुरू ब्रह्ममहिंदरा ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसका कहा बाजी राव कभी नहीं टाल सकता। बाजी राव धार्मिक मार्गदर्शन के लिए प्रायः आचार्य ब्रह्ममहिंदरा के पास जाता रहता है।
चिमाजी अप्पा गुरू महाराज को उकसाने का बहुत यत्न करता है, लेकिन उन्होंने भी बाजी राव और मस्तानी के रिश्ते के बारे में कोई एतराज न किया और चिमाजी अप्पा को कह दिया, “बाजी राव ने उसके साथ विवाह करवाया है। वह उसकी पत्नी है। वे दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। फिर हम कौन होते हैं, उनके गृहस्थ जीवन मंे खलल डालने वाले ?“
चिमाजी अप्पा इन दोनों पुरुषों से निराश होकर दूसरे षड्यंत्र घड़ने लग जाता है। कई बार जो काम पेशेवर पुरुष भी न कर सकें, वह काम घरेलू स्त्रियाँ कर दिया करती हैं। चिमाजी अप्पा अपनी माँ राधा बाई के पास जाता है और उसको भावुक करने का यत्न करता है, “आई(माँ), अपने हँसते-खेलते घर को तो जैसे किसी बुरे की नज़र लग गई है। भाऊ बाजी राव को पता नहीं इस मुसलमानी ने क्या सुंघाया हुआ है ? हर समय मस्तानी के नाम की ही माला जपता रहता है और उसकी सांसों में सांस लेता है। औरत को, और वह भी एक रखैल को इतना सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए। स्त्री की गर्दन के पीछे अक्ल होती है। शीघ्र ही पगला जाती है। मुझे तो भय है कि यह कलयोगिन कहीं हमारा सारा खानदान ही न तबाह करके रख दे।“
“हाँ पुत्र, मेरे से अधिक उसकी किसे चिंता है ? मैं तो स्वयं उठते-बैठते बहुत चिंता करती हूँ। मुनड़ा, वह तो हम सभी को भुलाये बैठा है। दिन रात मस्तानी की बगल में से नहीं निकलता और उसके पास पड़ा शराब पीता रहता है। पता नहीं, क्या तावीत घोलकर पिलाये हैं उस जादूगरनी ने ? भगवान सुमति दे मेरे राव को। मैं तो महादेव के मंदिर में हवन करवाऊँगी।“
चिमाजी अप्पा जलती आग पर और तेल डालता है, “हाँ, माताश्री, मैं तो छोटा होने के कारण कुछ कह नहीं सकता। पर आप यदि थोड़े कान खींचो तो शायद भाऊ कुछ संभल जाए।“
“मैं तो बहुत ज़ोर लगाकर हाँफ गई हूँ, ज़ोरू के गुलाम पर। कोई भड़ुआ मेरी माने भी सही। जब भी सामने पड़ता है, मैं तो तभी कलपती हूँ। भई अक्ल की राह पकड़। अब तुम्हें और अक्ल तो आने से रही। बच्चा हो तो दो हाथ मारकर टिका दूँ। बराबर का है, अब बता क्या करूँ, पुत्र ? मैं तो असमर्थ और विवश हूँ। दूसरी उपस्त्री तो तुम्हारे पिता ने भी रखी थी। पर उसने ये करतूतें नहीं की थीं। परदे में भीखू की माँ के पास जाया करता था और मुँह लपेट कर तड़के को मेरे पास चला आता था। पर बाजी राव ने तो लक्षण ही उलटे पकड़ लिए। ये स्त्रियाँ तो महाभारत करवा देती है बेटा। रावण की सोने की लंका एक स्त्री के पीछे ही राख हो गई थी।“
“मेरा वश चले तो उस मस्तानी कंजरी को चुटिया से पकड़कर नर्बदा नदी में गोते लगवाऊँ। शराब तो भाऊ पहले भी पीता था, पर तब ऐसा नहीं करता था जैसा अब हर समय मदहोश हुआ रहता है। ईश्वर जाने, ये बुंदेलखंड वाले क्या डालकर दारू निकालते हैं ? भाऊ की तो कतई बुद्धि भ्रष्ट कर रखी है। भाऊ को सदैव दारू में धुत किए रखती है। दो बार मेरे हाथों मरते बच गई। एकबार पहाड़े के कातिल को भेजा थो, वो नाकाम रहा और अपनी जान गवां बैठा। दूसरी बार दासी के माध्यम से ज़हर वाली अफ़ीम दी, साली ने मुँह में ही नहीं धरी। लगता है, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।“ चिमाजी अप्पा क्रोध में दांत पीसता है।
संयोगवश उस समय महाराजा छत्रसाल द्वारा भेजे शर्बतों के मटकों के पहुँचने का संदेश आ जाता है। चिमाजी अप्पा को अपनी भड़ास निकालने का एक और बहाना मिल जाता है। वह सारे शर्बतों वाले घड़े ले जाकर नदी में उलटवा देता है। जब मस्तानी को इस बारे में पता चलता है तो उसको बहुत दुख होता है। वह बाजी राव के पास रोष प्रकट करती है, “उन्हें बिखेरना क्यांे था ? यदि स्वीकार नहीं करने थे तो लौटा देते। शर्बत था, कोई ज़हर तो नहीं था। किसी गरीब के मुँह में पड़ता।“
क्रोध में बाजी राव जाकर चिमाजी अप्पा से इसकी पूछताछ करता है। चिमाजी अप्पा बड़ी चुस्ती के साथ अपना पक्ष प्रस्तुत करता है, “हाँ, ज़हर ही था वो।... शर्बत नहीं, वह शराब थी शराब। भाऊ आपकी बुद्धि पर तो दारू पिला पिलाकर उस दो टके की नर्तकी ने पर्दा डाल दिया है। आपको हर समय मदिरा पिला कर वह मदहोश किए रखती है। शराबों कबाबों के साथ आपकी बुद्धि मारी गई है। आप कभी होश में हो तो आपको पता चले। पक्का शराबी बना दिया है उसने आपको।“
बाजी राव अप्पा पर भड़क पड़ता है, “मस्तानी ने हमंे मांस खाने और मदिरापान करने की राह नहीं डाला। अपितु हमने उसको शराब पीने की लत लगाई है। उसका प्राणामी धर्म तो मांस और मदिरा के प्रयोग की मनाही करता है। तुम अच्छी प्रकार जानते हो, हम तो मस्तानी के आने से बहुत पहले से इन वस्तुओं का सेवन करते आ रहे हैं।... तुम तो यूँ ही रस्सियों को सांप बनाये जा रहे हो। वह तो महज शर्बत था। केसर, कुमकुम और मेवों वाला लाल, पीला रंग-बिरंगा। जिसे तुमने मदिरा समझकर बिखरवा दिया है। गर्मियों में मेहदे को ठंडक देता है यह शर्बत। तुम्हें शराब और शर्बत में अन्तर नहीं पता ? तुम तो खुद दारू पीते हो। कम से कम सूंघकर तो देख लेते, यदि पीकर नहीं देखना था। तुम्हें ज्ञान हो जाता कि वे घड़े शर्बत के थे या शराब के।“
“भाऊ, आपके तो दिमाग पर काम का पर्दा डाला हुआ है। आप मस्तानी के विरुद्ध कुछ सुनना ही नहीं चाहते। हम भूले नहीं शर्बतों को। यह वही कुंवरसा मस्तानी के शर्बत हैं जिन्हें पीकर आप कई कई दिन मदहोश पड़े रहते हो।“
बाजी राव, अप्पा से बहस करता है, “मैं तुम मूर्खों को कैसे समझाऊँ ? चलो, मैं मस्तानी को अभी बुलाकर उससे शर्बत बनवाकर दिखाता हूँ। तुम अपनी आँखों से देख लो।“
बाजी राव, मस्तानी को बुलवाकर समस्त परिवार को एकत्र कर लेता है। बाजी राव के आदेश से मस्तानी गुड़ और कुमकुम डालकर शर्बत बनाती है और अपनी सास राधा बाई को एक प्याला पेश करती है, “लो माताश्री, पीकर बताओ कैसा है ? कुमकुम डाला होने के कारण इसका रंग ही लाल शराब जैसा लगता है। लेकिन एकदम मीठा है और इसको पीने से कोई नशा नहीं होता। बल्कि पीने वाले की प्यास बुझती है।“
राधा बाई ने नाक चढ़ाते हुए एक घूंट भरा तो शरबत उसको सच में बहुत स्वादिष्ट लगा और वह पूरा प्याला पीने से स्वयं को रोक न सकी, “वाह ! लाजवाब है। पहले कभी यह चीज़ क्यों नहीं पिलाई, मस्तानी ?“
“आई, आप मौका ही कब देते हो मस्तानी को ?“ बाजी राव प्रसन्न होकर सबको मस्तानी का बनाया शरबत बांटने लग जाता है। सब मस्तानी की प्रशंसा करते हैं तो चिमाजी अप्पा पहले से भी अधिक जलभुन जाता है।
चिमाजी अप्पा अपनी इस पराजय को लेकर मन ही मन विष घोलने लग जाता है। अब चिमाजी अप्पा के पास एक अन्तिम शस्त्र बाजी राव की पहली पत्नी काशी बाई रह जाती है। वह काशी बाई को मस्तानी के विरुद्ध भड़काना प्रारंभ कर देता है, “वाहिनी साहिबा(भाभी), मुझसे आपका दुख देखा नहीं जाता। भाऊ ने तो आपको बिल्कुल ही आँखों से ओझल कर रखा है। उसको तो वह वेश्या मुसलमानी ही हर तरफ दिखाई देती है। पता नहीं क्या सिर में डाला है उस मस्तानी भूतनी ने ?“
काशी बाई के अंदर से मानसिक पीड़ा उछलकर बाहर आ जाती है, “मुझे भी लगता है जैसे उस तवायफ मस्तानी ने कोई जादू-टोना कर रखा हो। यह तो मेरी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते।“
चिमाजी अप्पा आग को और अधिक हवा देता है, “मुझ तो बताते हुए भी लज्जा आती है... यह अंगूठी देखो। आपके मायके वालों ने जो भाऊ को उपहार में दी थी, एक मल्लाह को भाऊ ने उठाकर दे दी।“
अंगूठी देखकर काशी बाई को सातों कपड़ों में आग लग जाती है, “लेकिन यह आपके पास कैसे आई ?“
“भाऊ ने मस्तानी से मिलने जाने के लिए नदी पार करनी थी और किश्ती में नदी पार करवाने वाले मल्लाह को मेहताने के रूप में यह अंगूठी दे दी। कल वह दरबार में आकर यह अंगूठी देकर धन ले गया है। मैंने जब भाऊ से इस बारे में पूछा तो कहने लगा कि नदीं में तूफान आया हुआ था। मल्लाह जाना नहीं चाहता था। मेरा मस्तानी के पास जाना आवश्यक था। मैंने लालच देने के लिए अंगूठी देकर कहा था कि बहुत सारा धन दूँगा। दरबार में आकर ले जाना। उस समय मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं था।... वाहिनी साहिबा, आप ही सोचो भला कोई प्रेम की निशानी भी ऐसे खैरात में बांटता है ? इतनी क्या आफ़त आ पड़ी थी, प्रलय में जाने की ? मस्तानी कहीं भाग चली थी ?“
चिमाजी अप्पा की इतनी भर वार्ता सुनकर काशी बाई की रूलाई फूट पड़ती है और वह रोती हुई अपने कक्ष में चली जाती है। चिमाजी अप्पा अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर मुस्कराता है। उसको विश्वास हो जाता है कि उसका तीर सही निशाने पर जा लगा है।
बाजी राव घर में आता है तो गुस्से में फनफनाती काशी बाई उसके साथ लड़ पड़ती है, “मैं सारी उम्र परमेश्वर मान कर आपको पूजती रही हूँ। आपको एक होनहार पुत्र पैदा करके दिया है और आपके बचपन की साथी हूँ। आप पल में ही उस कंचनी के होकर बैठ गए ?“
बाजी राव को गुस्सा आ जाता है और वह गुस्से में एक थप्पड़ काशी बाई को मार देता है, “खामोश ! तेरी बिलांद भर की जो जुबान चलती है, काटकर रख दूँगा। मस्तानी भी मेरी पत्नी है। दूसरे लोगों के साथ अब तू भी मुझे ताने मारने लगी है।“
“मुझे तो चुप करवा लोेगे। लेकिन प्रजा को कैसे चुप करवाओेगे ? सारे पूणे में लोग तरह तरह की बातें करते फिरते हंै।“ काशी बाई सिसक सिसककर रोने लग जाती है।
बाजी राव उसके समीप पलंग पर बैठकर उसको अपनी छाती से लगा लेता है, “काशी, तू तो जानती है कि मैं पेशवाई को सलामत रखने के लिए कितना संघर्ष कर रहा हूँ। जैसे महाभारत में अर्जुन को केवल चिडि़या की आँख ही दिखाई देती थी, वैसे ही मुझे भी केवल दिल्ली ही दिखाई देती है। देख, महाराजा छत्रसाल की बेटी का रिश्ता स्वीकार करना मेरे लिए राजनीतिक समझौता था। अगर हवस होती तो मैं मस्तानी का डोला भी स्वीकार कर सकता था। परंतु फिर मुझे मस्तानी के पिता की जागीर में से न तो उसके भाइयों के बराबर हिस्सा मिलता, न अपने कर्ज़ चुकाने और युद्धों के लिए माली इमदाद और न ही हमारी दिल्ली पर मध्य रास्ते बुंदेलखंड में छावनी बन पाती। क्या तू नहीं चाहती कि तेरा पति दिन दुगनी, रात चैगुनी प्रगति करे और समस्त भारतवर्ष में मराठा हिंदू स्वराज और साम्राज्य स्थापित करे ? हम अपने धार्मिक स्थान मुगलों से स्वतंत्र करवायें ताकि हमारे हिंदुओं को अपने तीर्थ स्थानों पर अपनी इच्छा से जाने की छूट हो और अपने धर्म का पालन करने के लिए मुसलमान हाकिमों को जजि़या न देना पड़े। मुसलमान हमारे मंदिरों को खंडहर बना रहे हैं। मूर्तियाँ तोड़ रहे हैं। जबरन हिंदुओं को मुसलमान बना रहे हैं। हमारा धन, हमारी संपŸिायाँ और हमारी अस्मतों को लूट रहे हैं। हिंदुस्तान देश हमारा है और शासन मुसलमान कर रहे हैं। तू नहीं चाहती कि इस सबकी रोकथाम की जाए ? मुगलों को नथ डाली जाए ? छत्रपति शिवाजी ने (30 मार्च 1645 ई.) व्रत रखकर स्वतंत्र हिंदवी राज्य की नींव रखी थी। जिसको कायम और सुरक्षित रखना मेरा धर्म है।“ इतना कहकर बाजी राव शांत हो जाता है और काशी बाई की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लग पड़ता है।
धार्मिक विचारों की होने के कारण काशी बाई ढीली पड़ जाती है, “स्वामी, मुझे तो आप शांत करवा लोगे, लोगों और भाईचारे का मुँह कैसे बंद करोगे। ?“
मस्तानी के साथ रहने के बाद बाजी राव को ढंग आ चुका है कि स्त्री की कब कौन सी रग दबानी चाहिए। बाजी राव सोच विचार मंे डूबी और हिचकियाँ भरती काशी बाई की गाल को चूम लेता है, “प्रिय काशी, एकबार एक बाप और बेटा गधा खरीद कर ला रहे होते हैं। रास्ते में उन्हंे कोई मिलता है और ताना कसता है - देखो तो, ये बाप बेटे भी गधे हैं। गधे को साथ साथ चलाये जा रहे हैं। बाप को इतनी भी अक्ल नहीं कि बच्चे को गधे पर बिठा दे। यह सुनकर बाप अपने बेटे को गधे पर बिठा देता है। कुछ आगे जाने पर कोई अन्य कहता है -कितना बदतमीज बच्चा है। बूढ़ा बाप पैदल जा रहा है और बेटा मौज से गधे पर चढ़ा बैठा है। लड़का फौरन उतरकर गधे पर बाप को बिठा देता है। फिर कोई अन्य उसके करीब से निकलने वाला राहगीर कह देता है -सयाना होकर भी बाप गधे पर बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है। अब दोनों ही गधे पर बैठ जाते हैं। आगे जाने पर कोई अन्य आता है और कहता है - कितने निर्दयी हैं। एक जानवर पर जुल्म ढा रहे हैं। ईश्वर ने अच्छी भली टांगें दी है। चल नहीं सकते ? यह सुनकर दोनों गधे पर से उतर जाते हैं और गधे की टांगे बांधकर उसको एक डंडे पर लटका कर चल पड़ते हैं। इस पर सभी लोग देखकर हँसते हैं। इस कहानी का यह सार निकलता है कि सुनो सबकी, पर करो अपने मन की। जितने मुँह उतनी ही बातें। लोगों की कोई जुबान तो पकड़ नहीं सकता। लोग तो कल को कहंेगे कि कुएँ में छलांग लगाओ तो तुम छलांग लगा दोगे ?“
“पर जिस समाज में हम रहते हैं, उसका आदर-सम्मान तो करना ही बनता है। मैंने कल मंदिर में सुना था कि ब्राह्मणों में आपके और मस्तानी के संबंधों को लेकर पंथक मसला बहुत गरमाया हुआ है। शायद वे कल दरबार में भी आपके पास आएँ।“ काशी बाई अपने पति बाजी राव को कसकर आलिंगन में ले लेती है।
“आ जाने दो, मैं अकेले अकेले को देख लूँगा। देशास्था ब्राह्मणों को पेशवाई छिनने का दुख है। वे सोचते हैं कि चितपवन भट्टांे ने मुनीमी (बाजी राव का पिता पेशवा बनने से पूर्व मुनीम था) करते पेशवाई कैसे प्राप्त कर ली। यूँ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं और हमें नीचा दिखाने के बहाने खोजते रहते हैं। मैं उनकी सब चालंे समझता हूँ। मैंने अब तक युद्ध ही लड़े हैं। डरता नहीं मैं किसी से।“ बाजी राव क्रोध में आ जाता है।
काशी बाई आँखों में उमड़ते आँसू बहाती हुई बोलती है, “रोना तो पतिदेव इसी बात का है कि आप गृहस्थ जीवन के साथ भी युद्धभूमि वाला व्यवहार ही कर रहे हो। बाहर के युद्ध तो आपने बहुत लड़े और जीते, काश ! कभी पारिवारिक जंग भी जीत कर देखो तो आपको पता चले। आप तो हर समय मुझसे दूर ही रहे हो।... कभी जंग लड़ने, कभी सियासत में हिस्सा लेने के बहाने और कभी चैथ एकत्र करते घूमते हो। पति के वियोग में तड़पती नारी की अवस्था आप क्या समझो। भगवान ने तो नारी का सिर्फ़ बुत बनाया है। लेकिन पुरुष जब उसका स्पर्श करता है तो उसमे प्राण पड़ते हैं और वह देह का बुत उस समय पत्थर से जीती जागती स्त्री का रूप धारण करता है। रामायण में एक कथा आती है - अहल्या राम चंद्र भगवान अर्थात पुरुष के स्पर्श से ही वास्तव में पत्थर से स्त्री बनती है। एक युद्ध स्त्री के अंतःकरण में भी चलता रहता है। कभी मेरे साथ वह युद्ध लड़कर मुझे सेज संग्राम में पराजित करो तो मैं आपको असली मर्द मराठा योद्धा मानूं और मुहब्बत की सल्तनत पर आपकी पेशवाई को स्वीकार करके अपने चुम्बनों की चैथ देती हुई अपने बदन की सरदेशमुखी आपको समर्पित कर दूँ।“
बाजी राव, काशी बाई की ठोढ़ी पकड़कर उसका झुका हुआ चेहरा ऊपर उठाता है और उसकी आँखों में आँखें डालकर देखता है। उसका काशी बाई बहुत संुदर लगने लग पड़ती है। बाजी राव काशी को बिस्तर पर लिटाकर चूमने लग पड़ता है और काशी बाई की नौ गज़ की सूती साड़ी खुलकर पलंग के नीचे जा गिरती है।...
No comments:
Post a Comment