Monday, 2 November 2015

अध्याय-17

कचेहरी


काशी बाई के पास चंद दिन रहकर उसको शारीरिक संबंधों से संतुष्ट करने के बाद बाजी राव मस्तानी के पास चला जाता है। मस्तानी के साथ कुछ रातें व्यतीत करने के पश्चात वह काशी के पास अपनी उपस्थिति दजऱ् करवाने आ जाता। इस प्रकार, कुछ अरसे बाद बाजी राव ससवाद में आकर काशी को शांत करके पुनः मस्तानी के पास रहने के लिए कोथरूड़ चला जाता। बाजी राव के जीवन के दिन और रातें काशी और मस्तानी के बीच बंटने लग जाती हैं। वह किश्ती की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे सफ़र करता हुआ अपने परिवार और मस्तानी के साथ अपना रिश्ता निभाते हुत अपने जीवन में संतुलन बनाये रखने का यत्न करता रहता है।



समय इस प्रकार अपनी गति चलता रहता है। बाजी राव के मस्तानी के साथ रिश्ते का लेकर विवादों के अलाव सुलगते रहते हैं। फिर अचानक ऐसी हवा बहती है कि वह अलाव प्रचंड अग्नि का रूप धारण करते हुए एक विस्फोटक ज्वालामुखी बन जाते हैं। उनमें से ऊँची-ऊँची लपटें उठने लग पड़ती हैं।

मस्तानी के विषय को लेकर भाईचारे में हो रही भिन्न-भिन्न प्रकार की बातों के चक्रवात समस्त पूणे में घूमकर पेशवा के दरबार तक पहुँच जाते है। अप्पा स्वामी के प्रोत्साहन से पंडितों का एक दल पेशवा के दरबार में हंगामा खड़ा करने के लिए आ धमकता है। बाजी राव अपने सिंहासन पर से उठकर आदर सहित उनका स्वागत करता है, “आओ आचार्य, आसन ग्रहण करो।“

ब्राह्मणों को बिठाकर उनके विरोध के लिए स्वयं को तैयार करता हुआ बाजी राव सोच रहा होता है कि काशी के ब्राह्मणों ने तो छत्रपति शिवाजी को भी नहीं बख़्शा था। शिवाजी महाराज का भी नाक में दम किए रखा था। 1673 ई. में जब उन्होंने सार्वजनिक राज्याभिषेक का मुद्दा उठाया था तो रूढ़ीवादी ब्राह्मणों ने शिवाजी को क्षत्रिय मानने से इन्कार कर दिया था। फिर मैं महज एक पेशवा इनके सम्मुख किस खेत की मूली हूँ।

ब्राह्मणों की मंडली में से एक उनका मुखिया मुद्दा उठाता है, “श्रीमंत आप पेशवा हो, हमारे शासक। मराठा योद्धाओं और आने वाली पीढि़यों के लिए प्रेरणा-स्रोत आपको ही बनना है। इतिहास के सुनहरी पन्नों ने आपने नाम को दजऱ् करवाना है। आपके द्वारा किए अधार्मिक कार्य केवल आपका या भट्ट खानदान का ही नहीं, अपितु समूचे चितवन ब्राह्मणों का सिर लज्जा से झुका सकते हैं और भविष्य में मराठों को अपमान और लज्जा का सामना करना पड़ सकता है।“

“आप तो वेदों के श्लोकों से भी अधिक उलझी भाषा का प्रयोग करने लग गए हो। मुझे तो आपकी संस्कृत बिल्कुल समझ में नहीं आती। कृपा करके बुझारतें न डालें और मुझे सरल भाषा में बतायें, जो आप कहना चाहते हैं? मैंने कभी कोई गलती नहीं की।“ बाजी राव खंखारते हुए रौबीली आवाज़ में बोलता है।

पंडितों की मंडली में से अन्य कोई बोलता है, “पेशवा जी, नादान न बनो। इन्सान तब सिरे से गलत होता है जब वह सोचने लग जाए कि वह गलत नहीं है। आप हमारे इस दरबार मंे यूँ आने का कारण भलीभाँति जानते हैं...। चलिए, फिर भी हम खुलकर बताते हैं। हमंे तो उल्लेख करते हुए भी लज्जा आती है।“

“यदि विषय आपको लज्जित करता है, तो क्या वैद ने कहा है कि उस पर अवश्य बात करनी ही है ?“

“हाँ... और आप वह कुकर्म बेझिझक खुलआम कर रहे हो।“ एक और पंडित जोश में आकर बोलता है।

बाजी राव पूरे संयम और धैर्य में रहता है, “कौन सा कुकर्म किया है हमने ?“

“जैसे आप कुछ जानते ही नहीं। भोले न बनिये। आपके आचरण में आई गिरावट को सारा जग जानता है। आप एक मुसलमान कंचनी को सरेआम अपने घर में रखकर उसके साथ अवैध संबंध स्थापित किए हुए हैं। हम आपकी रखैल मस्तानी की बात कर रहे हैं।“

“आचार्य जी, वह रखैल नहीं। हमारी बेगम...हमारी बायिको(पत्नी) है। हमने बाकायदा उसक साथ विवाह किया हुआ है।“

“हमने तो किसी ने आपका विवाह होते देखा नहीं। कोई है गवाह आपके पास ?“

“अग्नि साक्षी है। इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है ? हमारे कई सरदार उस समय वहाँ उपस्थित थे, जब मस्तानी ने हमारी तलवार के साथ अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लिए थे।“

ब्राह्मणों का मुखिया गरम हो जाता है, “श्रीमंत हम ऐसे विवाह को स्वीकार नहीं करते। यह तो शास्त्रों और विधि विधान का घोर उल्लंघन है। जीवत प्राणी के अवसर पर उपस्थिति होते हुए वस्तु के साथ शादी नहीं की जा सकती। हम इस विवाह को नहीं मानते। कुल पुरोहितों से कुंडलियाँ मिलवाकर लगन के लिए शगुन निकाला जाता है। हल्दी बटना होता है और पवित्र नदी केे जल से पवित्र होकर माला बढ़ाई जाती है। कन्यादान होता है। अग्निकुंड के चारों तरफ फेरे लेकर दुल्हन को मंगलसूत्र पहनाया जाता है। क्या आप भूल गए कि मराठों के विवाह कैसे हुआ करते हैं, श्रीमंत ? यह भी कोई विवाह हुआ, जैसा आपने मस्तानी के संग रचाया है ?... मस्तानी पर्दा नहीं करती। आपके साथ सुना है, रणभूमि में भी जाती है। पालकी की बजाय आपके बराबर घोड़े की सवारी करती है।“

“द्रोपदी पांडवों के साथ अज्ञातवास और माता सीता भी तो भगवान राम के साथ बनवास में हर समय साथ रहने के लिए गई थीं। बनवास तो केवल राम चंद्र को मिला था, सीता माता को नहीं।“ बाजी राव तर्क देता है।

एक अन्य ब्राह्मण की आवाज़ उभरती है, “हम कुछ नहीं जानते। उसको देखकर कल हमारी बहू-बेटियाँ भी बागी हो जाएँगी और बेपर्दा होकर मुजरे करने लगेंगी। हम यह सहन नहीं कर सकते। हमको आपके पियादे गणेश बाबू ने सब बताया है कि मस्तानी अप्सराओं की भाँति नृत्य करती है और गाती है।“

“नृत्य तो मन की उमंग है। भगवान कृष्ण की भक्तिन मीरा बाई भी तो यही सब करती थी। प्रभु भक्ति में लीन होकर नाचती, गाती थी। नृत्य का तो आविष्कार ही भगवान भोले शंकर शिवजी महाराज ने किया, स्त्रियों के लिए लास्य और पुरुषों के लिए तांडव की रचना करके। क्या आप नहीं जानते कि शिवजी भगवान पार्वती माता को प्रश्न करने के लिए नृत्य का सहारा लिया करते थे ? दूसरी से आठवीं सदी के मध्य रचे गए नाट्य शास्त्र में भरतमुनि वर्णन करता है कि सतयुग के सुनहरी युग के बाद त्रेता का युग आया तो सृष्टि में अहम परिवर्तन हुए। देवताओं ने अपने सिरमौर देव इंद्र देवता को सृष्टि रचियता ब्रह्मा के पास भेजा। नाट्य शास्त्र के प्रथम कांड के ग्यारहवें बारहवें श्लोक में आता है कि इंद्र ने ब्रह्मा से कहा कि हे सृष्टि के सृजनहार ! विश्व में दुख बहुत बढ़ गए हैं। कोई ऐसा यत्न करें कि मानवजाति को आनंद और मनोरंजन प्राप्त हो सके। कोई ऐसा उपाय निकालें जिससे आँखों और कानों को तृप्ति मिले। चार वेद केवल उच्च श्रेणियों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए कोई पाँचवा वेद रचो जिसका शूद्र भी रसानंद ले सकें और वह सबका साझा हो। ब्रह्मा अंतध्र्यान हो गए और उन्होंने ऋग्वेद  मंे से शब्द, सामवेद में से संगीत, यजुर्वेद में से अभिनय और अथर्ववेद में से रस प्राप्त करके पाँचवे वेद की रचना की। ब्रह्मा ने नाट्य वेद की शिक्षा भरतमुनि को दी और भरतमुनि ने आगे अपने सौ पुत्रों को इसका ज्ञान करवाया। इस प्रकार नाट्य वेद इंद्रपुरी से उतरकर मातृलोक में आया। इस तरह नाट्य, नृत्य और संगीत के सुमेल वाला यह ग्रंथ विश्व में स्वीकृत हुआ है। ये चीजे़ं तो हमारे धर्म के साथ ही चली हैं। हमारे प्राचीन गं्रथों में वर्णन आता है कि एक बार शिव पार्वती को सुनहरी तख़्त पर बिठाकर उसकी सुंदरता के अमृत को अपनी निरंतर दृष्टि से पी रहे थे। जितना शिव इस अमृत को पीते जाते, उतना ही वह बढ़ता जाता। शिव पार्वती के सौन्दर्य पर मोहित होकर उसकी संुदरता के जाम से खुद को मदहोश करने लग पड़े। शिव ने सुरूर में आकर पार्वती को प्रसन्न करने के लिए नृत्य करना शुरू कर दिया। यह देखकर देवी-देवता और परियाँ एकत्र हो गईं। लक्ष्मी गाने लग पड़ी। सरस्वती ने वीणा, इंद्र ने वेणु, विष्णु ने मृदंग और ब्रह्मा ने खड़तालें बजानी प्रारंभ कर दीं। शिव से यह नृत्य उसके शिष्य तंडू ने सीखा और इसको सुधारकर तांडव का नाम दिया। भगवान विष्णु भी तो वृंदावन में गोपियों के साथ नाचते-गाते रासलीला रचाया करते थे। कृष्ण जी बचपन से नर्तक थे। क्या वह यमुना नदी के तट पर चाँद की चाँदनी मंे गोपियों और ग्वालिनों के साथ नृत्य नहीं करते थे। उनके नृत्य में मुजरे की तरह शिंगार रस की अधिकता होती थी। भगवत पुराण की दसवी पोथी में ऋषि वेदव्यास ने इस नृत्य पर पाँच कांड रचे हैं। जब कृष्ण जी अपनी बंसरी से मधुर धुनें बजाते थे तो यह संगीत गोपियों को खींच लाता था। ग्वालिनों को कृष्ण बंसरी के सुर इतना मंत्रमुग्ध करते थे कि वे जहाँ भी होतीं, सभी काम छोड़ कर सरेआम कृष्ण के पास आ जाती। उनके पति भी उनको न रोक पाते। रात रातभर यमुना तट पर रास-नृत्य होता रहता। कहते हैं जब कृष्ण गोपियों के संग नृत्य करते तो हर गोपी के साथ एक अलग ही कृष्ण नृत्य करता दिखाई देता। इस नृत्य में रूहानियत शामिल हो जाती और वह आध्यात्मिक मिलन का माध्यम बन जाता। नृत्य को तो धार्मिक स्वीकृति भी प्राप्त है। सदियों से नृत्य को पूजा की एक विधि के रूप में स्वीकारा जाता रहा है। शिव मानस में इसका उल्लेख है। मंदिरों की नर्तकियों को देवदासियाँ कहा जाता है। हमारे भात के प्राचीन मंदिरों में नृत्य मुद्राओं वाली सुशोभित मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं। नृत्य तो मन की स्व के साथ एक संवाद रचाने वाली अवस्था है। जिस प्रकार हम नदी में स्नान करके शारीरिक मैल से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार नृत्य रूपी व्यायाम करते हुए जब हमें पसीना आता है तो उससे इन्सान पवित्र हो जाता है। तन के रोमछिद्रों से अंदर की सारी मैल बाहर निकल कर शरीर को भी धो देती है। फिर नृत्य स्नान तो नदी स्नान की अपेक्षा उम ही हुआ जो मनुष्य के शरीर को अंदर और बाहर से स्वच्छता प्रदान करता है। फिर क्या बुराई है नृत्य करने में ? नृत्य प्रेम के प्रकटीकरण का सुंदर माध्यम है। वास्तव में प्रेम भाव ही नृत्य की अंतरात्मा है जो शारीरिक स्तर से आध्यात्मिक मंडलों में प्रवाहित होता है। शेष, राम आपका भला करे, जो गायन की बात है, क्या आप आरती करते हुए भजन गायन और मंत्रों का उच्चारण नहीं करते ?“

एक अन्य पंडित बोलता है, “हमारी बात और है। वह ग़ज़ल गाती है जो कि एक अरबी विधा है। ग़ज़ल के तो शाब्दिक अर्थ ही है - प्रेमी की प्रंशसा करना। इसको अय्यास लोग सुनते हैं। मस्तानी मुजरा करती है। मुजरा वो नाच है जो मुगल अपनी ऐशपरस्ती के लिए ईरान और अफ़गानिस्तान से हिंदुस्तान में लेकर आए थे। वह विदेशी संस्कृति हम पर थोप रही है। हम अपनी संस्कृति को कतई पतित नहीं होने देंगे।“

बाजी राव अपना तर्क प्रस्तुत करता है, “अधिक कट्टर न बनो। आप अरबी घोडि़यों की सवारी क्यों करते हो ? प्रसाद में काबुल के पिस्ते और बादाम क्यों प्रयोग करते हो ? ईरान के बने वस्त्र क्यों पहनते हो ? बदखशन के फल और खाड़़ी देश के अनार क्यों खाते हो ? नृत्य और संगीत कला के रूप मंे हंै और कला सीमाओं की कै़द में नहीं रहती। हम हिंदुस्तानी भजन गायन और तांडव, कत्थक और भरत नाट्यम आदि नृत्यों को धर्मप्रचार के लिए प्रयोग करते थे और मुगल मुजरा नृत्य को निजी मनोरंजन के लिए प्रयोग करते थे। सूफियों में बेपरवाह नृत्य करके मुर्शद मनाने की प्रथा है। प्रभु भक्ति में भी कोई आत्मा भी लीन होगी, जब वह खुशी और हर्षातिरेक की अवस्था में रहेगी। जीवन के दुखों और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मनोरंजन भी परम आवश्यक है और नृत्य-मुजरा एक मनोरंजन का माध्यम है। मस्तानी हमारा मन बहलाने के लिए जो मुजरा शैली का नृत्य करती है तो यह कोई गुनाह तो नहीं है ?“

“हमने तो सुना है, वह भारतवर्ष की ही नहीं है। कहीं बाहरी दूर देश की पैदावार है और वह भाषा भी कोई परायी ही बोलती है।“ उनमें से सबसे कम आयु का ब्राह्मण चोट करता है।

बाजी राव हँसकर बहस करने लगता है, “हाँ, उचित फरमाते हैं आप। उसकी भाषा आपसे भिन्न है और वह मनुष्यता के भले के लिए बोली बोलती है। एक इन्सान को दूसरे से जोड़ने वाली भाषा का मस्तानी प्रयोग करती है। उसकी सरल बोली जीव, जंतु, पंछी और पौधे भी समझते हंै। क्योंकि उसकी बोली में धार्मिक पक्षपात तत्व नहीं है और वह आपकी तरह कट्टर नहीं है। मस्तानी को अनेक भाषाओं का ज्ञान है। उसने पढ़ने लिखने की शिक्षा पाई है। इसलिए वह मराठी के अतिरिक्त राजस्थानी, सिंधी, फारसी, गुजराती, उर्दू, अरबी, हिंदी और संस्कृत के शब्दों का सहज ही प्रयोग कर लेती है। वह स्वामी प्राणनाथ के प्राणामी मत को मानती है और उनकी धार्मिक पुस्तक ‘कुलसम स्वरूप’ को पढ़ा होने के कारण यह स्वाभाविक ही है कि उसके द्वारा मराठी बोलते हुए दूसरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग हो जाता है। रही बात विदेशी होने की, तो मस्तानी महाराजा छत्रसाल की संतान है। बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल अस्सी-इक्यासी बरस पहले ( 4 मई 1649 ई.) को कर्च कचनई में जन्मे राजपूत हैं। सारी उम्र वह मुगलों से लड़ते रहे हैं और कट्टर हिंदू हैं। भूल गए कि महाराजा छत्रसाल ने अपनी सेवाएँ छत्रपति शिवाजी को भी दी थीं ? शायद आपको ज्ञान नहीं है कि 1684 ई. में बुंदेलपति केसरी महाराजा छत्रसाल ने जजि़या लेने आये मौलणियों के सिर कलम करके कुरान के परों में लपेटकर मुगल बादशाह को भेजे थे। वह सदैव औरंगजेब द्वारा(9 अपै्रल) 1669 ई. में जारी किए गए आदेश ‘काफर कफूर’ का भारी विरोध करते रहे हैं। महाराजा छत्रसाल के पिता चंपत राय ने बहुत पहले ही मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया था और वह मुगलों के साथ लड़ते हुए बादशाह के चहेते अब्बू फजल को मारकर भगवान को प्यारे हो गए थे। मुगलों और पठानों के साथ बुंदेल पिछले पचास वर्षों से भिड़ते आ रहे हैं। इस विद्रोह के बदले उनके अनेक मंदिरों का अपमान हुआ, लाखों योद्धाओं को शहीद किया गया, बच्चों-बूढ़ों को कै़द किया गया और असंख्य स्त्रियों के साथ घोर अत्याचार भी हुए। परंतु फिर भी बुंदेल साहस के साथ लड़ रहे हैं। बुंदेलों के वंश की उत्पति भगवान विष्णु से होती है। पवारों और धंदरों की भाँति वे सूर्यवंशी हैं और कमल पुष्प उनका राजसी चिह्न है। विद्यावासिनी देवी की वे उपासना करते हैं। आप उनकी बेटी मस्तानी को विदेशी कैसे कह सकते हैं ?“

“मुगलों की तरह राजपूतों में भी बहु-विवाह और रखैले रखने की प्रथा है। मुसलमान होने के कारण क्या मालूम, मस्तानी की माँ का हिंदू महाराजा छत्रसाल के जनानखाने में क्या रुतबा है ? मस्तानी की माँ तो मुसलमानी है न ?“ तीसरा ब्राह्मण फुंकारता है।

बाजी राव अपनी दलील देता है, “मस्तानी की अम्मा का दजऱ्ा और धर्म कुछ भी हो, उसका पिता तो एक हिंदू है न ? उससे भी बढ़कर वह बुंदेलखंड का महाराजा है जो मस्तानी के शाही रक्त होने का साक्षी है। वह कोई ऐरी गैरी और साधारण स्त्री नहीं है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि वंश पुरुष के साथ चलते हैं। बच्चा जब जन्म लेता है तो उसका गोत्र और धर्म वही होता है जो उसके पिता का हो। मैं चितपवन ब्राह्मण भट्ट खानदान का वंशज कहलाता हूँ क्योंकि मेरे बाप दादा का एक वंश था। न कि माता का। मेरे माताश्री देशास्था ब्राह्मण घराने से आए हैं। मैं चितपवन ब्राह्मण कहलाता हूँ, देशास्था नहीं। मुझे बताओ, आप अपने पिता के नाम से जाने जाते हों या माँ के नाम से ?“

“कुछ लोग तो कहते हैं कि मस्तानी महाराजा छत्रसाल की असली संतान नहीं है। मस्तानी का असली पिता जहानत खान था। वह छत्रसाल द्वारा गोद ली गई पुत्री अथवा सौतेली बेटी है।“

“लोगों का क्या है, वे तो बहुत कुछ कहेंगे। जितने मुँह, उतनी ही बातें। बुंदलपति केसरी महाराज छत्रसाल बहुत जिम्मेदार और सुलझे हुए इन्सान हैं। वह सौतेली बेटी को सगी कहकर क्यों हमारे साथ ब्याहेंगे ? यदि ऐसी बात होती तो वह मस्तानी को धर्मपुत्री भी बता सकते थे।“

“पर वह नमाज पढ़ती है और रोजे़ रखती है और वह भी कट्टर हिंदू पेशवा परिवार के घर में रहते हुए। राम...राम...राम।“ पंडितों का मुखिया प्रश्न दाग देता है।

बाजी राव पेट में हँसता है, “अनशन यानि कुछ समय के लिए अस्थाई तौर पर जानबूझ कर अन्न का त्याग करने की प्रथा सिद्धों, नाथों और योगियों ने शरीर को आरोग्य रखने और अन्न की किल्लत को पूरा करने के लिए चलाई थी। अन्न त्याग कर फाका रखने को व्रत कह लो अथवा रोज़ा। अर्थ और उद्ेश्य तो उसके एक जैसे ही हैं। आपको मस्तानी के नमाज़ अदा करने के बारे में ज्ञान है। परंतु इसका इल्म नहीं है कि वह आरती भी करती है और कृष्ण भगवान की भक्ति में भजन गायन भी। वास्तव में, जैसे मैं पहले बता चुका हूँ कि मस्तानी स्वामी प्राण नाथ के प्राणामी मत को मानती है। प्राणामी हिंदू और इस्लाम धर्म की अच्छी बातों को अपनाने का संदेश देते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी स्वराज का सपना देखा था और बादशाह अकबर ने हिंदुत्व और इस्लाम को एक करने के लिए दीन-ए-इलाही चलाया था। धर्म का काम होता है - जोड़ना। मनुष्य को मनुष्य से तोड़ना नहीं। एक धर्म का पालन करना ही बहुत कठिन होता है। मैं तो मस्तानी पर बलिहारी जाता हूँ कि वह एक समय में दो दो धर्मों का पालन कर रही है। हमारे हिंदुओं में तैंतीस करोड़ देवता हैं। क्या कभी किसी ने शिव भक्त को दुर्गा देवी की पूजा करने से रोका है ? या ब्रह्मा की भक्ति करने वाले को रोका है कि वह विष्णु या महेश की आराधना न करे ? कभी किसी ने काली देवी के उपासक को गणपति को मानने से रोका है ? बस, यह समझ लो कि मस्तानी के तैंतीस करोड़ पर एक देवी-देवता हैं। इसलिए वह नमाज़ भी पढ़ती है। ईश्वर एक है और धर्म उसकी प्राप्ति  के अलग अलग रास्ते हैं। शायद आप धर्म शास्त्र और धर्म व्याकरण को समझ नहीं सके।“

यह सुनते ही वे सभी ब्राह्मण जो अभी तक चुप बैठे थे, भी भड़क उठते हैं, “धर्म क्या है, अब हम पंडितों को आपसे सीखना पड़ेगा ? पेशवा जी, आपने अनेक युद्ध लड़े हैं और जीते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म को आप अपनी मनमजऱ्ी से तोड़-मरोड़कर प्रयोग किए जाओ। आप कौन होते हैं, धार्मिक फैसले करने वाले ?“

“किसी के निजी जीवन में दख़ल देने वाले आप कौन होते हैं ? फिर भी आप हमारे दरबार में चले आए हो, हम आपका सम्मान करते हैं और चाहते हैं कि इस विवाद का यही समाप्त कर दिया जाए। हमने मस्तानी को अपनी पत्नी बनाया है और यह एक अटल सच्चाई है। हम उसको नहीं छोड़ सकते। आपके हृदय को शांत करने का कोई राह है तो आप ही हमें इस चक्रव्यूह से निकलने का मार्ग बतायें ?“ बाजी राव नम्रता से बोलता है।

“श्रीमंत, अब आप हमारी बोली बोलने लगे हैं... हिंदू पेशवाई में मुसलमान स्त्री से संबंध अधर्म है। एक काम हो सकता है।... प्रायश्चित करके मस्तानी का शुद्धिकरण कर लिया जाए और उसको ब्राह्मण बना दिया जाए।“

“प्रायश्चित ? किस बात का प्रायश्चित ? प्रायश्चित तो पापों का किया जाता है। क्या हमारे संग प्रेम करने से मस्तानी ने कोई पाप या गुनाह किया है जो वह प्रायश्चित करे ? मस्तानी कर्म से क्षत्रिय है और क्षत्रिय ही रहेगी। उसकी आत्मा गंगा जल की तरह साफ और पवित्र है, पवन की तरह निर्मल है और हवन की आहुति की भाँति शुद्ध है। फिर आप उसका क्या शुद्धीकरण करोगे ?“ बाजी राव तिलमिला उठता है।

“आपको धार्मिक रीति-रिवाजों पर किंतु-परंतु करने का कोई अधिकार नहीं है। हम कैसे विश्वास कर लें कि आपकी मस्तानी के साथ शादी हुई है ? मस्तानी का जीवन ढंग इस्लामी है। यदि आप उसके साथ शादी करवाकर उसका रहन-सहन, उसका तौर-तरीका, जीवन जीने की दृष्टि, मानसिक सोच विचार अर्थात समस्त जीवन शैली परिवर्तित कर सकते हो तो हमें कोई आपŸिा नहीं, आपके और उसके रिश्ते को लेकर।“ ब्राह्मणों का मुखिया अपना निर्णय सुना देता है।

“मेरे और मस्तानी के जीवन में खलल डालने और हमारे रिश्ते पर कीचड़ उछालने का तो आपको भी हक नहीं है। प्रेम करते समय खुद को बदला जाता है और प्रेमी को उसके उसी रूप में स्वीकारना होता है जिसमें वह हो। उसे बदला नहीं जाता। यही इश्क का उसूल है। हमारा विवाह जब बुंदेलखंड में हुआ था तो उसमें हमारी सेना के अनेक सरदार उपस्थित थे। नर्बदा नदी के तट पर उस विवाह को अन्तिम स्पर्श दिया गया था। यदि आपको इससे राहत नहीं मिलती तो हम दुबारा से इस आने वाले वसंत उत्सव में मस्तानी के साथ विवाह रचाएँगे। आप सभी आकर उसके साक्षी बन सकते हैं।“ बाजी राव खीझ कर सभा विसर्जित कर देता है और क्रोध में दरबार से उठकर चला जाता है।

ब्राह्मण शांत होकर अपने अपने घरों को चले जाते हैं।

बहरहाल, उसी वर्ष 1730 ई. के अंत में बाजी राव मस्तानी के साथ दुबारा विवाह रचा लेता है।

इस विवाह में उसकी माँ राधा बाई और पत्नी काशी बाई को छोड़कर शेष सभी सम्मिलित होते हैं। विवाह के अवसर पर बाजी राव मस्तानी के लिए ब्राह्मण देवकी नंदन पाठक को गीत गोबिंद व्याख्या सहित लिखने और एक बारांदरी बनाने का आदेश देता है।

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