Tuesday, 3 November 2015

अध्याय-1



बुंदेलखंड का किला


विशेष नोट: इस उपन्यास की मांग के अनुसार मैंने ऐतिहासिक घटनाओं की देसी तारीखों (संवत सन) का उल्लेख करने की अपेक्षा अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी ईसवी का प्रयोग किया है। कुछ स्थानों पर मेरे पात्र भी वही प्रयोग करते हैं। इसको तकनीकी दोष न माना जाए। ऐसा मैंने देसी तारीखें उपलब्ध न होने के कारण और ऐतिहासिक ब्योरों के काल को सही दर्शाने के लिए किया है। जिसको आवश्यकता हो, वह स्वयं इन तारीखों से देसी तारीखों का अनुमान लगा सकता है। - उपन्यासकार।


बुंदेलखंड मध्य भारत में कमल के फूलों से लबालब भरी और कोसों दूर तक फैली बेलाताल झील के किनारे स्थिति राजपूतों का रियासती गढ़ है, जैतपुर (वर्तमान समय में ज़िला लक्ष्शीसराय, बिहार) ऋषि जयंत के नाम पर बसे जैतपुर के ऐन बीच पहाड़ी पर बना शाही किला दूर से ही नज़र आ जाता है। यह किला बुंदेल राजपूतों की आन, आबरू, बहादुरी, शक्ति और बलिदान का गवाह है। इस ऐतिहासिक किले ने बहुत सारा इतिहास अपनी कोख में संभालकर रखा हुआ है।



जैतपुर के इस शाही किले पर खड़े वृद्ध राजपूत महाराजा छत्रसाल ने दूरबीन आँखों पर लगाकर सुदूर क्षितिज तक देखा।

दूर से हवा में उड़ती धूल, भारी गिनती में घुड़सवार और पल पल करीब आ रहे मछली की पूंछ के आकार वाले केसरी रंग के लहराते मराठा परचम को देखते ही प्रसन्नता से उसकी बांछें खिल उठीं।

खुशी में झूमते चम्पत राय और लाल कंवर के पुत्र यानि बुंदेलखंड नरेश, महाराजा छत्रसाल ने दायें हाथ में पकड़ी गज़भर लम्बी दूरबीन को बायें हाथ की हथेली पर मारकर इकट्ठा कर दिया, “अब आएगा मज़ा ! इलाहाबाद के सूबेदार नवाब गज़नफर जंग अली मुहम्मद खान बंगस और उसके प्यादे दलेल खान की अटल मौत को उनका खुदा भी नहीं रोक सकता।...  1714 ई. को मध्य दोआब में फर्रूखाबाद नगर (अब कानपुर के समीप पड़ता उŸार प्रदेश का ज़िला), दिल्ली के बादशाह फरुखसियार के नाम पर बसाकर चापलूस मुहम्मतद खान ने एक वर्ष बाद नवाबी हासिल की और मुगल सेना का ‘बावन हज़ारी’ (Commander of 52,000 Soldiers) सेनापति बना था। बंगश कबीले की खागयई शाखा के ये शिया मुसलमान खुद को कौम-ए-बंगश कहलवाते हैं और रौहीला पठानों से अपने आप को उŸाम गिनते हैं। खुर्रम घाटी के बाशिंदे इस्माइल बंकेश के वंशज, ये बंगश अफ़गानी पठान सोचते हैं कि दुनिया पर इन्हीं का राज चलेगा और बाकी सबका ये नामोनिशान मिटा देंगे।... बंगश का पश्तो में अर्थ होता है - जड़ खोदने वाला। ये हमारी जड़ खोदने को घूमते हैं। शायद यह नहीं जानते, हम बुंदेली तो इनका बीज नष्ट कर देंगे। और फिर, दिल्ली के शहनशाह नसीर-उद-दीन मुहम्मद शाह (रौशन अख्तर) को भी सबक मिल जाएगा और दुबारा वह बुंदेलखंड पर हमला करने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचेगा।... हम बुंदेलों ने तो औरंगजे़ेब आलमगीर और बादशाह बहादुर शाह जफ़र की ईन नहीं मानी... हुँह...।“

सेनापति बख़्शी हंसराज ने महाराजा छत्रसाल को बीच में टोका, “ओ हो, महाराज। ऐसा कौन-सा चमत्कार आपने देख लिया है जो आप फूले नहीं समा रहे। अब तक तो युद्ध में हम हार रहे हैं और हरामी बंगश हमारी फौजों पर भारी पड़े हुए हैं। किसी समय भी वह हमारे किले पर कब्ज़ा कर सकते हैं...। शहजादा जगतराज को तो उन्होंने बंदी बना लिया है।“

महाराजा छत्रसाल ने दूरबीन सेनापति हंसराज की ओर बढ़ाते हुए कहा, “सेनापति जी, आप खुद ही अपनी आँखों से देख लो। पेशवा बाजी राव हमारी जंगी इमदाद के लिए अपने लश्कर के साथ तूफान मचाता आ रहा है।“

सेनापति हंसराज ने महाराजा छत्रसाल से दूरबीन लेकर खोली और अपनी बायीं आँख मूंदकर दायीं आँख से दूरबीन में से देखता हुआ बोला, “वह तो ठीक है राजन। पर आप यह दावे से कैसे कह सकते हैं कि पेशवा जी की मदद से हमारी हार जीत में बदल जाएगी।“
“हंसराज, विजय हमारे कदम ही चूमेगी। युद्ध का निर्णयाक फैसला अवश्य हमारे पक्ष में होगा। मराठा बाजी राव एक ऐसा योद्धा है जो आज तक एक भी जंग नहीं हारा। चाहे वह 1723 ई. में मालवा की जंग थी, चाहे 1724 ई. में धार पर कब्ज़ा या औरंगाबाद पर विजय प्राप्त करना। ये अभी हाल में हुए पालखेड़ के युद्ध में बाजी राव के वीरतापूर्वक गाड़े झंडों को कौन भूल सकता है ? पेशवा बालाजी विश्वनाथ का यह सुपुत्र जन्मा ही चितपवन ब्राह्मण घराने में है। लेकिन कर्म से वह क्षत्रिय है और अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उसने युद्धक्षेत्र में ही व्यतीत किया है।“

महाराजा छत्रसाल अभी सेनापति को बाजी राव के विषय में बता ही रहा होता है कि पाँच रानियों में से उसकी पटरानी देव कंवर वहाँ किले की छत पर अपने पति महाराजा छत्रसाल से आ सम्बोधित होती है, “महाराज, योजनाएँ ही बनाते रहेगो या कुछ हाथ पैर भी मारोगे ? पता नहीं, क्या किया होगा उन्होंने हमारे पुत्र के साथ ? बहूसा पदमावती (छोटी रानी और शहजादा जगतराज की असली माँ) भी काफ़ी चिंतित है और रो रोकर उसने अपना बुरा हाल कर लिया है। जैत कुंवर (शहजादा जगतराज की पत्नी) का मन भी अस्थिर है। राम जाने, जगतराज ज़िन्दा भी है या...।“

महाराजा छत्रसाल तिलमिला उठता है, “शुभ शुभ बोलो...राणीसा। आप क्या समझती हैं, मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा हूँ ? मुझे कोई चिंता नहीं है ? आखि़रकार मेरा खून है वह। मैंने उसकी खोज खबर के लिए सिपाही और गुप्तचर भेजे हुए हैं...। वे आते ही होंगे। हुँह... कहती हैं, जैत कुंवर का दिल डूबता जाता है। मुझे चिन्ता है, कुछ ऐसा वैसा न हो जाए। चलो, चलकर देखते हैं। राणीसा, आप भी उसको हौसला देना। बुलाकर लाओ जैत कुंवर को मेरे पास।“

महाराजा छत्रसाल, सेनापति हंसराज और पटरानी देव कंवर किले के बुर्ज़ पर से उतरकर दरबार की ओर चले जाते हैं। जैत कंवर दरबार में आ उपस्थिति होती है।

“सादर प्रणाम काका जू।“

“कुंवर ! जैसे मुगल अपनी रखैलों और रानियों के लिए महिल शब्द का प्रयोग किया करते हैं, उसी प्रकार हम राजपूत कंवर शब्द का प्रयोग राजकुमारों, राजकुमारियों और रानियों के लिए किया करते हैं। संस्कृत के इस शब्द का अर्थ शाही होता है और हम इसे कुंवर पुकारते हैं। कुंवर में आम इन्सानों से कोई भिन्नता तो होनी चाहिए कि नहीं ? ऊँठों वालों से दोस्ती करके दरवाज़े बन्द करके नहीं रखते।“

जैत कंवर घबरा जाती है, “जी, मैं कुछ समझी नहीं ?“

महाराजा छत्रसाल अपनी पुत्रवधु की ओर रौब से देखता है, “मेरे कहने का तात्पर्य है कि तुम शाही परिवार की बहू हो। बुंदेलों की स्त्रियों के दिल बहुत कड़े होते हैं। तुम जगतराज की व्यर्थ चिन्ता न कर। कुंवर को आम स्त्री की अपेक्षा बहादुर, बलवान और अधिक सहन-शक्ति की मालकिन होना चाहिए।“
“जी महाराज, मैं समझ गई। चाहे जितनी बड़ी समस्या आ जाए, आज के बाद आप मुझे कभी घबराई हुई और चिन्ताजनक स्थिति में नहीं देखेंगे।“

“हम तुम्हारे मुखारबिंद से यही सुनने के इच्छुक थे। जाओ, आयुष्मती भवः(लम्बी आयु हो)।“

दरबार में सब दरबारियों सहित महाराजा और रानियाँ गुप्तचरों के आने की प्रतीक्षा करने लग जाते हैं। सिवाय प्रतीक्षा के वे कुछ और कर भी नहीं सकते। पलक का झपकना एकबार एक क्षण बन जाता है। पंद्रह क्षणों का एक विस्सा। पंद्रह विस्सों का एक चासा और तीस चासों का एक पल।... साठ पलों की एक घड़ी।... इसी तरह आठ घड़ियों का एक एक पहर करके चार पहर यानि पूरा दिन बीत जाता है। प्रतीक्षा में बेज़ार होतीं सोचों के सागर में डुबकियाँ लगाने के बाद महाराजा छत्रसाल अपना मौन तोड़ता है, “हे मेरे ईश्वर ! ये भी दिन देखने थे। वह भी समय था जब 1671 ईसवी में मैं केवल बाइस वर्ष की युवावस्था में पाँच घुड़सवार और पच्चीस तलवारबाजों की छोटी-सी फौज लेकर मुगलों से लोहा लेता घूमता था। पर अब यह बुढ़ापा और शारीरिक दुर्बलता मेरा वश नहीं चलने देती। बीमारी के कारण मैं बेबस और लाचार-सा अनुभव करने लग जाता हूँ।“

“काका जू (बहुत सम्मानित बुजु़र्ग अथवा बाबा जी) यह समय आपकी जीवनी या आपकी बहादुरी के किस्से सुनने का नहीं है। तुरन्त कोई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।“ सिसक रही छोटी रानी पदमावती कंवर हस्तक्षेप करती है।

“मेरी प्रिय ! क्या मैं अब बूढ़ा ठाड़ा अपनी जान दे दूँ ? बहुत सोच-समझकर मैं पहले ही योग्य कदम उठा चुका हूँ।  इसीलिए तो मैंने पेशवा बाजी राव से सहायता की भीख मांगी है। बेशक पदमावती राणीसा, इसकी मुझे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।... चलो, जो ईश्वर को मंजूर है, हो जाएगा।“ महाराजा छत्रसाल की दूरअंदेशी बोलती है।

देव कंवर अपने कान खड़े करके माथे पर बल डालती है, “ऐसा क्या लिखा था आपने पेशवा को अपने पत्र में ?“

“दो सप्ताह पहले (1 मार्च 1730 ई.) सेनापति कविराज बख़्शी हंसराज से लिखवाकर भेजे अपने छंदबद्ध रुक्के में मैंने लिखा था कि ‘जो गत ग्राह गजेन्द्र की, सो गत भाई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजा लाज।’ मैंने इसके बदले में भारी धन मराठा सरदारांे को देने का भी वायदा किया है।“

तभी एक गुप्तचर दरबार में आ उपस्थिति होता है, “महाराज छत्रसाल की जय हो !“

सभा में उपस्थिति सभी व्यक्ति उत्सुकता से एकदम उठकर खड़े हो जाते हैं। महाराजा छत्रसाल तो समाचार जानने के लिए उतावला ही हो जाता है, “हाँ, क्या समाचार लाए हो ?“

“महाराज, बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि शहजादा जगतराज का कोई सुराग नहीं मिला है। पर अनुमान है कि उसको जैतपुर के बाहर घने जंगन में अन्य सैनिकों के साथ मुहम्मद शाह ने कैद कर रखा होगा।“

यह समाचार सुनते ही महाराजा छत्रसाल की टांगें उसके अपने ही शरीर का बोझ झेलने में असमर्थ हो जाती हैं और वह अपने सिंहासन पर गिर पड़ता है, “हे भगवान, मैं क्या उपाय करूँ इस अलगर्ज़, नादान और फुकरे लड़के का ? मैं इस जल्दबाज को कितनी बार समझा चुका था कि अपने भाइयों, पदम सिंह और हृदय शाह की तरह मन लगाकर युद्धविद्या सीख ले, काम आएगी। लेकिन इस नाफरामान और बदसाहसी लड़के ने कभी मेरी एक नहीं सुनी।... मुगल और निज़ाम तो हमारे दुश्मन थे ही। बल्कि हमारे अपने राजपूत बुंदेल भी शत्रु हैं और खार खाते हैं। कभी भी किसी समय भी कोई दुर्घटना घटित हो सकती थी। लो, आज वह घड़ी आ ही गई। जो कयास मैंने लगाया था, वह गलत नहीं था। कितनी बड़ी समस्या में डाल दिया है, इस मुँहज़ोर और बददिमाग लड़के ने ! क्या ज़रूरत थी आग में कूदने की ?... मैं तो बड़े हृदय से ही दुखी था। हृदय शाह है कि उसको दुनियावी कामों से मोह ही नहीं है। हृदय ने तो अपने लिए रीवा (मौजूदा मध्य प्रदेश में राजपूतों का एक शहर जिसका नाम नर्बदा नदी के नाम पर पड़ा है) से आया डोला भी अपने भाई को दे दिया था। शस्त्र विद्या हृदय शाह ने सीखी तो सही, पर उसको अमल में नहीं लाता है। कहता है, मैं हिंसा और युद्ध के सख्त़ खिलाफ़ हूँ। बना है बड़ा अहिंसावादी ! अब कौन छुड़ाकर लाएगा जगतराज को बंगशों की हिरासत से ?“

बख़्शी हंसराज तुरंत बोल पड़ता है, “महाराज, निश्चिंत रहो। मैं अभी कुछ सैनिक लेकर जाता हूँ और शहजादा की रिहाई का कोई यत्न करता हूँ।“

रानी देव कंवर आगे बढ़ती है, “नहीं सेनापति जी, आपका जाना ठीक नहीं। आपका यहाँ रहकर किले की रक्षा करना अत्यधिक आवश्यक है। मैं नारी सेना लेकर जाती हूँ और जगतराज की तलाश करती हूँ। महाराज क्या आज्ञा है ?“
महाराजा छत्रसाल अपनी झुर्राई वृद्ध आँखों को सिकोड़ता है, “मैं क्या कहूँ ? आप खुद समझदार हो। पर आपकी टुकड़ी में कौन कौन जाएँगी ?“

“मैं और जैत कुंवर अगुवाई करेंगी और चुनकर सभी श्रेष्ठ श्रेणी की जंगबाज सैनिकाओं को ही संग ले जाएँगी। आप चिन्ता न करें।“ देव कंवर रौब और आत्मविश्वास के साथ बोलती है।

“ठीक है, पर मेरी बेटी मस्तानी कुंवरसा को ले जाना न भूलना। मुझे अपने शिष्यों में से सबसे अधिक गर्व उसको युद्ध कला सिखाने पर है। मस्तानी जैसी भालेबाजी दूसरी कोई नहीं कर सकती। तीरअंदाजी तो वह आँखें बन्द करके भी कर सकती है। रास्ते खोजने में माहिर है और ग़ज़ब की स्मरण शक्ति है उसकी। एकबार जहाँ से रात के अँधेरे में से गुज़र जाए तो दिन में चाहे उसकी आँखों पर पट्टी बांध के उसको वहाँ से निकलवा दो, सारे रास्ते सही सही बता देगी। मस्तानी जब म्यान में से बिजली की भाँति चमचमाती तलवार खींचती है तो उसके दुश्मन का सिर उसके पैरों में बेरों की तरह लुढ़कता दिखाई देता है। घुड़सवारी में भी मस्तानी लाजवाब है।... जाओ मेरा आशीर्वाद आपके साथ है। विजयी भवो ! (तुम्हारी जीत हो।)

“जो आज्ञा ! प्राणनाथ, मस्तानी को मैं कैसे भूल सकती हूँ ? वह तो अवश्य हमारे संग जाएगी।“ कहकर राणी देव कंवर नारीगृह की ओर जाती है और सब जंगजू स्त्रियों को एकत्र करके अपने मंसूबे और युद्ध नीति के बारे में रातभर में समझा देती है। 
अगली सवेर होते ही किले का मुख्य द्वार खुलता है और चालीस-पचास घुड़सवार, नकाबपोश स्त्री सैनिक बाहर रणभूमि की ओर निकल जाते हैं। उनके जाने के बाद किले के द्वार पुनः बन्द कर दिए जाते हैं।

इन घुड़सवारों में सबसे आगे रानी देव कंवर है। उसके पीछे शहजादा जगतराज की सौतेली बहन, मस्तानी कंवर और उसकी पत्नी जैत कंवर है। शेष राजपूत और क्ष़त्रीय स्त्रियाँ हाथों में तलवारें, ढालें, धनुष, फरसा, गदा़, त्रिशूल, लोह-चक्र और भाले आदि शस्त्र उठाये उनके पीछे पीछे अपने अपने घोड़़े पूर्ण जोश के साथ दौड़ा रही हैं।

कई वर्षों से बुंदेलखंड की राजसी हालत ठीक न होने के कारण और सेना के अभाव को पूरा करने के लिए बुंदेल राजपूत स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ युद्ध में अपना योगदान दे रही हैं। रानी देव कंवर की सौतेली सास सारंधा भी अपने पति के साथ युद्धों में कंधे से कंधा भिड़ाकर लड़ती रही थी।

यह कोई नई या अलौलिक बात नहीं है। बहुत वर्षों से यह प्रथा चलती आई है। भगवान राम चन्द्र के समय त्रेता युग से ही महिलायें युद्धों में हिस्सा लेती आई हैं। राजा दशरथ की रानी कैकेयी सारी उम्र अपने पति के संग जाकर युद्ध लड़ती रही थी। समस्त बुंदेल महिलायें बचपन से ही युद्ध विद्या का अभ्यास करने लग जाती हैं। इन हिंदू राजपूतानियों के जत्थे में बहुत सारी क्षत्रीय स्त्रियों के अलावा अन्य निम्न वर्ग की स्त्रियाँ भी शामिल हैं। जंग में जातेे समय इन स्त्रियों के जंगजू टोलों ने काले रंग के कपड़े पहने होते हैं। चूड़ीदार पाजामी, घुटनों तक लम्बा चोला। सिर पर पीतल की टोपी लेकर घुमावदार काली पगड़ी बांधी होती है। पगड़ी का एक सिरा नाक पर से होता हुआ दूसरी तरफ के कान के ऊपर पगड़ी में टंगा होता है। केवल आँखें ही नंगी रखी जाती हैं। ये काले वस्त्र ही इनकी वेशभूषा है और इनके महिला होने की पहचान भी होते हैं।

किले से कुछ दूर बुंदेली स्त्रियों की मुठभेड़ दलेल खान की फौजों से होती है और वे पहले हल्ले में ही विरोधी निज़ाम मुहम्मद बंगश की सेना को पीछे हटने के लिए विवश कर देती हैं। तभी पेशवा बाजी राव की फौज भी आकर पीछे से आक्रमण कर देती है। दो फौजी दलों के बीच में घिरा दलेल खान बुरी तरह बौखला जाता है। छोटे से युद्ध के बाद बाजी राव से शिकस्त खाकर मुख्य निज़ाम मुहम्मद खान भाग जाता है और उसकी बहुत सारी बंगशी सेना को मराठा सैनिकों द्वारा बंदी बना लिया जाता है। इस युद्ध में मुहम्मद बंगश का पुत्र कयूम खान मारा जाता है। (कयूम खान की कब्र महोबा में बनी हुई है)।

जैतपुर की यह जंग जीतने के बाद मस्तानी कुंवर और जैत कुंवर शहजादे जगतराज की तलाश में सारा जंगल छान मारती है और उन्हें एक तालाब के निकट घायलावस्था में जगतराज मिल जाता है। रानी देव कुंवर, मूर्छित पड़े जगतराज को लेकर अपने सारे टोले के साथ बुंदेलखंड के दिल में बने जैतपुर के किले में लौट जाती है।

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