अंगूठी
मस्तानी आए दिन नये वस्त्र, नये गहने पहने होती है। हर बार जब वह ससवाद आती तो सिर से पैरों तक का हार-शिंगार और वस्त्र उसके सदैव बदले हुए होते हैं। यदि कुछ नहीं बदलता तो मस्तानी के बायें हाथ की तर्जनी में पहनी हीरे की अंगूठी कभी नहीं बदलती। हर बार वही अंगूठी देखकर एक दिन मस्तानी की ननद भिहू बाई पूछ लेती है, “वाहिनी साहिबा (भाभी), आपके बाकी तो सब जेवर नित्य बदले हुए होते हैं परंतु आप कभी यह अंगूठी नहीं उतारते।“
“नहीं, वनसा(ननद)। कभी नहीं।“ मस्तानी मुस्कराकर उतार देती है।
अनू बाई भी उत्सुक हो जाती है, “स्नान करते समय या रात को सोते समय भी नहीं ?“
“नहीं, कभी भी नहीं।“ मस्तानी इन्कार में सिर हिलाती है।
गोपिका बाई की भी अंगूठी में दिलचस्पी जाग्रत हो जाती है, “ऐसी क्या विशेषता है इस अंगूठी में ?“
“इसमें तो मेरी जान बसी हुई है और यह हमारी बुंदेलों की इज्ज़त आबरू की रक्षक है। एकबार पहनने के बाद बुंदेलों की लड़कियों की उंगली में से अंगूठी जीते जी नहीं उतरती। बस, उनकी मृत्यु के बाद ही उतारी जाती है।“ मस्तानी गंभीर हो जाती है।
“हमें भी तो कुछ बताइये न, इस अंगूठी का रहस्य ?“ दूर बैठी उनकी बातें सुन रही काशी बाई वार्तालाप में अपनी टांग अड़ाती है।
मस्तानी खंखारते हुए इतिहास की कहानी शुरू कर देती है, “बुंदेलखंड वतन के वासी हम बुंदेल अपनी आन, बान और शान के लिए अपने रक्त की एक एक बूँद बहा देते हैं। हम मित्रों के लिए खून देना भी जानते हैं और शत्रु का खून लेना भी हमें आता है। लहू की अन्तिम बूँद देने और लेने की खासियत के कारण हमें बुंदेल कहा जाता है। अर्थात् रक्त की बूँदें बहाने यानी लेने देने का, रक्त के कतरों का व्यापार करने वाले लोगों की जाति। हम तो अपनी कुल देवी विद्यावासिनी को भी रक्त की बूँदें ही भेंट में चढ़ाते हैं। हमें तो गुढ़ती भी नंगी तलवार पर रक्त की बूँदें लगाकर दी जाती है। मेरी दादीसा यानी काकाजू महाराजा छत्रसाल जी की धर्म माता जी सारंधा(महाराजा छत्रसाल की सौतेली माँ) रानी बड़ी बहादुर और दिलेर स्त्री थी। हमारा कुल अयोध्या के राजा भगवान राम चंदर के बेटे कुश से चलता है। दादीसा मेरे दादासा राजा चंपत राय की सबसे प्यारी रानी अर्थात् पटरानी थी। दादीसा का एक भाई था अनरुद्ध सिंह, वह अपनी पत्नी शीतला देवी को बहुत प्रेम करता था। एक बार तुर्कों के साथ युद्ध में पराजित होकर वह अपनी जान बचाकर रणक्षेत्र से भाग आया। घर आए अनिरुद्ध को सारंधा ने तलवार म्यान में से खींच कर उसको ललकारा कि या तो विजयी होकर आता, नहीं तो शहीद हो जाता। कायरों की तरह रणभूमि में पीठ दिखाकर आने के लिए अपने भाई को दादीसा ने लाहनतें दीं और कहा कि वह खुद उसको मौत की सज़ा देगी। अनिरुद्ध सिंह का स्वाभिमान जाग उठा और वह उन्हीं पैरों से वापस लौट गया और छह महीने पश्चात जंग जीतकर घर लौटा। दादीसा के साथ बाद में सीतला देवी, उनकी भाभीसा बहुत लड़ी और ताना मारती हुई बोली कि जान से जीत अधिक प्यारी थी तो जब तुम्हारा विवाह हुआ था, तब अपने पति को भेज कर देखती। मेरे पति को क्यों भेजा ? दादीसा ने कहा, “अगर ऐसी स्थिति आ गई तो पति क्या, वह अपने पुत्र के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करेंगी।“
“वाह ताई साहिबा ! बड़े जिगर वाली थी आपकी आजी (दादी) फिर तो।“ गोपिका बाई प्रभावित हो जाती है।
मस्तानी को भी अपनी दादी की वीर गाथा सुनाने में आनन्द आने लग पड़ता है। काशी बाई पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से वह स्वयं ही आगे का किस्सा बयान करने लग जाती है, “दादासा अपनी पाँच रानियों में से सब से अधिक प्रेम सारंधा दादीसा को करते थे। दादासा की बहादुरी के विषय में सुनकर दिल्ली दरबार से शहजादा दारा शिकोह ने दादासा को नौ लाख की काल्पी (Kalpi is a city and a municipal board in Jalaun district in the Indian State of Uttar Pradesh. It is on the right bank of the Yamuna) की जागीर और मंत्री पद की पेशकश कर दी। दादासा बुंदेलखंड की राजगद्दी अपने भाई पहाड़ सिंह को सौंप कर दिल्ली दरबार में चल गए। दादासा अपनी बहादुरी से आए दिन ईनाम और जागीरें बादशाह से प्राप्त करते चले गए। परंतु दादीसा का मन प्रसन्न नहीं होता था। वह एक दिन दादासा से बोलीं कि कहाँ हम ओरशा के राजा थे और कहाँ आप बादशाह के हुक्म बजाने वाले गुलाम बन गए हैं ? यह सुनकर दादासा ने सब कुछ त्याग दिया। वह वापस ओरशा आ गए।“
राधा बाई बीच में टोक देती है, “और फिर अपके आजोबा(दादा) ने अपना राज वापस ले लया था ?“
“हाँ ! उन्होंने अपने भाई पहाड़ सिंह को तो अस्थायी तौर पर ही राजा बनाया था। उसको दादासा ने दूसरी रियासत देकर वहाँ का राजा बना दिया। पर समय बड़ा बलवान होता है। राजाओं से भीख मंगवा देता है और रंक को राजा बना देता है।“ मस्तानी का स्वर गमगीन हो जाता है।
सभी स्त्रियाँ एकदम कान खड़े कर लेती हैं और उनके मुँह से एकसाथ निकल जाता है, “फिर क्या हुआ ?“
मस्तानी गहरा निश्वास लेते हुए कहती है, “दिल्ली का बादशाह शाहजहां बीमार होकर बिस्तर पर पड़ गया। उसके पुत्रों में राजगद्दी के लिए जंग छिड़ गई। शहजादा मुराद और शहजादा मुहीद-उद-दीन ने बागी होकर दक्खिन से दारा शिकोह के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए दादासा चंपत राय से मदद मांगी। दादासा ने दारा शिकोह के साथ पुराने संबंध होने के कारण इन्कार कर दिया। लेकिन दादीसा ने उन्हें यह कहकर मना लिया कि दर पर आए सवाली को खाली हाथ नहीं लौटाया करते। दादासा रज़ामंद हो गए और दारा शिकोह की फौजों के साथ हुई भयानक जंग में दादीसा खुद भी लड़ी थीं। एक जगह युद्धभूमि में दादीसा की मुठभेड़ विरोधी सेना के सिपहसालार वली बहादुर खान के साथ हो गई। दादीसा ने वली बहादुर खान को बुरी तरह घायल कर दिया। वह घोड़े पर से नीचे गिर पड़ा। दादीसा को उसका अरबी घोड़ा पसंद आ गया और दादीसा ने सिपाहियों को उस घोड़े को कब्ज़े में लेने का आदेश दे दिया। युद्ध की विजय के उपरांत शहजादा मुहीद-उद-दीन तख़्त पर बैठकर आलमगीर औरंगजेब बन गया। दारा शिकोह का सिपहसलार वली बहादुर खान कपटी था। वह औरंगजेब की शरण में जाकर उसका वफ़ादार बन गया। बादशाह औरंगजेब ने उसको क्षमा करके अपनी सेवा के लिए रख लिया। उसने वली बहादुर को उच्च पद और जागीरें प्रदान कीं। दादासा चंपत राय को आलमगीर ने ओरशा से बनारस और बनारस से यमुना नदी तक के इलाके दिए और बारह हज़ार घुड़सवार फौज का मनसब बना दिया। बारह हज़ारी मनसब बनने के पश्चात एकबार फिर दादासा बादशाह और दिल्ली दरबार के अधीन हो गए।“ यह बताते हुए मस्तानी खामोश हो कर ख़यालों की बाढ़ में बह जाती है।
शांत हो गई मस्तानी को गोपिका बाई कुरेद कर पूछती है, “फिर वे दुबारा राजा कैसे बने ?“
मस्तानी सभी के चेहरों की ओर गौर से निहारती है, “दादीसा रानी सारंधा जैसी स्त्री से हार जाने के कारण वली बहादुर दादासा के साथ खुंदक रखने लग पड़ा। सीधा पंगा तो वह नहीं ले सकता था पर आए दिन कोई न कोई इल्लत अवश्य करता रहता। काकाजू महाराज छत्रसाल उस समय अभी बाल्यावस्था में ही थे। एकबार काकाजू वली बहादुर खान के घोड़े पर सवार होकर जा रहे थे। वली बहादुर ने देखकर काकाजू से वह घोड़ा छीन लिया। जब दादीसा रानी सारंधा को पता चला तो वह काकाजू पर बहुत गुस्सा हुईं और कहने लगी कि घोड़े के छिन जाने का दुख नहीं है, पर तुम मुँह लटकाकर खाली हाथ घर लौटने की अपेक्षा वली बहादुर को सबक सिखाकर आते तो वह दुबारा कभी बुंदेलों की किसी वस्तु पर आँख नहीं रख सकता था। दादीसा ने झिड़का कि क्या तुम्हारी रगों में बुंदेलों का खून नहीं दौड़ता ? काकाजू महाराज छत्रसाल उस समय बहुत छोटे थे। दादीसा उसी समय बीस-पच्चीस घुड़सवारों के साथ गए और उन्होंने वली बहादुर को आलमगीर औरंगजेब के दरबार में जा ललकारा। दादीसा ने व्यंग्य करते हुए कहा, “वाह रे खान, चम्बल की घाटी में खाई मार भूल गया जो तूने दुबारा बुंदेलों से पंगा ले लिया? तुझे शर्म नहीं आई, एक बच्चे से घोड़ा छीनते हुए ?“ वली बहादुर खान के हिमायती उठ खड़े हुए। दोनों पक्षों के बीच तलवारें चलने लग पड़ीं। औरंगजेब को पता चला। वह दादीसा से बोला, “आपने इससे घोड़ा छीना था। इसने आपसे छीन लिया है। हिसाब बराबर।“ इस पर दादीसा बोली, “नहीं, हिसाब बराबर नहीं। जंग का उसूल है, हारने वाले के माल-असबाब को विजयी द्वारा अपने कब्जे़ में लेना। पर वली बहादुर ने बच्चे से घोड़ा छीनकर चोरी-डकैती की है। हम अपना घोड़ा हर कीमत पर वापस लेंगे।“ आलमगीर औरंगजेब ने वली बहादुर से पूछा कि क्या करना है ? वह बोला, “ये कोई दूसरा जो चाहे घोड़ा ले लें। यह घोड़ा मुझे प्यारा है, मैं इसे नहीं दूँगा।“
इस पर दादीसा बोलीं, “घोड़ा तो हमें भी प्यारा है और हमें यही लेना है। दूसरा घोड़ा लेकर हम क्या करेंगे ? हमारे पास क्या घोड़े नहीं हैं ?“
वली बहादुर बोला, “ मैं यह घोड़ा नहीं दे सकता। बेशक घोड़े के वजन के बराबर सोने की मोहरे तौलकर मुझसे ले लें।“ उधर हमारी दादीसा हठ पर थीं कि हमें हर हालत में यही घोड़ा चाहिए। आप जो चाहे कीमत ले लो। आलमगीर ने दादीसा से पूछा कि आप क्या कीमत दे सकते हैं ? दादीसा झट बोलीं कि तमाम जागीरें और मनसबी इस घोड़े पर कुरबान करते हैं। बादशाह औरंगजेब पूछने लगा कि आप एक घोड़े के पीछे ओहदे और जागीरें तक छोड़ने को तैयार हो ? दादीसा ने बताया कि घोड़े के लिए नहीं, स्वाभिमान और इज्ज़त से सिर ऊँचा करके जीने के लिए हम हर बलिदान देने के लिए तैयार हैं। दादासा की मनसबी और जागीरें लेकर बादशाह ने घोड़ा दे दिया। दादासा और दादीसा ओरशा लौट आए।“
“फिर तो बड़ी बददिमाग थी आपकी दादी। एक घोड़े के बदले जागीरें और रुतबे ठुकराकर घाटे वाला सौदा कमाया उसने !“ काशी नाक चढ़ाती है।
मस्तानी काशी बाई की ओर कड़ी नज़र से देखती है, “घाटे का नहीं, मुनाफे का। इज्ज़त मान धन से नहीं खरीदे जाते। इन्सान के पास स्वाभिमान ही न रहा तो पीछे क्या बचा फिर ?“
“वाहिनी साहिबा, आगे क्या हुआ यह बताओ न ?“ भिहू बाई मस्तानी की साड़ी का पल्लू खींचती है।
“औरंगजेब की वली बहादुर खान अक्सर चापलूसी करता रहता था और बुंदेलखंड पर कब्ज़ा करने के लिए उकसाता रहता था। औरंगजेब ने अपनी सेना भेजकर दादासा पर चढ़ाई कर दी। पूरे तीन साल युद्ध होते रहे। कई लड़ाइयाँ दादासा जीतते रहे और कई हारते रहे। एकबार ओरशा के किले का घेरा लम्बा हो गया और दादासा की तबीयत बहुत खराब हो गई। वह चिंतित हो गए कि शत्रु से लड़ने के योग्य नहीं रहे और हार कर बंदी बनना उन्हें स्वीकार नहीं था। दादासा को वज़ीरों ने चोर दरवाजे से किला छोड़कर भाग जाने का परामर्श दिया। दादासा मान गए, पर दादीसा रानी सारंधा अड़ गईं। दादासा कहने लगे- जीवत रहेंगे तो लड़ सकेंगे, नहीं मारे जाएँगे। दादीसा बोली - कायरता के साथ जीने से बहादुरी के साथ मरना लाख गुना बेहतर है। दादासा की हालत बीमारी के कारण बहुत बिगड़ गई। लड़ना तो दूर की बात रही, वह अपने आप बिस्तर पर से उठने योग्य भी न रहे। उन्होंने दादीसा से विनती की कि वह उन्हें मार दें ताकि वह शत्रु के हाथों अपमानित होकर मरने की अपेक्षा इज्ज़त की मौत मर सकें। दादीसा ने तलवार से दादासा का गला काटकर और अपनी अंगूठी का हीरा चाटकर उसी समय दादासा के साथ आत्महत्या करके मौत को गले लगा लिया। उन्हें मरना स्वीकार था, पर इज्ज़त-आबरू पर दाग लगना बर्दाश्त नहीं था।“ मस्तानी गर्व से सिर ऊँचा कर लेती है।
“अच्छा तो मस्तानी तेरी अंगूठी का हीरा चाटने से भी मृत्यु हो सकती है ?“ राधा बाई समीप बैठी बोल उठती है।
मस्तानी अंगूठी को सहलाने लग जाती है, “हाँ, माताश्री। इसलिए काकाजू ने मुझे यह उपहार में दी थी। जब मैं अल्हड़ लड़की से नवयौवना होकर स्त्री बनी थी तो मेरे काकाजू, महाराजा छत्रसाल ने मुझसे कहा था कि पुत्री, तू जवान हो गई है। कई बार सुन्दरता का वरदान इन्सान का सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। काकाजू ने यह अंगूठी देते हुए कहा था कि मर जाना, पर कभी इज्ज़त को दाग न लगने देना। यह अंगूठी तेरी रक्षा करेगी।“
“अंगूठी कैसे आपकी रक्षा करेगी ?“ गोपिका बाई भोले पन में प्रश्न कर देती है।
मस्तानी अंगूठे के नाखून की मदद से अंगूठी के हीरे को ऊपर उठाकर खोलते हुए उस में पड़ा सफेद रंग का बुरादा दिखलाती है, “यह देखो, यह विष है। देखने में यह ज़रा-सा लगता है, पर किसी शत्रु की जान लेने या खुद के मरने के लिए पर्याप्त है।“
“क्या ?“ सब स्त्रियों की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। मस्तानी अंगूठी के हीरे को पुनः बंद कर लेती है।
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