अतीत का साया
बाजी राव की तरफ से पूणे के अपने महल में लश्कर के पहुँचने का पैगाम भेज दिया जाता है। इस संदेश में बाजी राव की ओर से गोलमोल ढंग से मस्तानी की मौजूदगी को लेकर इशारा तो किया जाता है, पर खुलकर मस्तानी के साथ हुए उसके विवाह के संदर्भ में कोई खुलासा या वर्णन नहीं किया जाता।
संदेशा मिलते ही चिमाजी अप्पा पूणे के बाहर पड़ाव वाले स्थान पर बाजी राव से मिलने आता है। चिमाजी अप्पा खुशी में उछलकर बाजी राव के गले मिलता है, “शेर-ए-मराठा की जय हो ! दादा (बड़ा भाई), यह जंग भी मराठा जीत ही गए ? वाह मेरे मराठा राणा मर्द ! शत्रु कर दिए खुर्द-बुर्द। जियो ! दादा !“
“कोई शक था, अप्पा ? बाजी राव जब रणभूमि में चला जाए तो विजय स्वयं चलकर हमसे बगलगीर हो जाती है। आज तक कभी हारे हैं जो अब हार जाते। पराजय हमारा खौफ़ खाती है। मैदान-ए-जंग में से मराठा कभी ऐसे नहीं हटा, मरके हटा या मार के हटा !!“
चिमाजी अप्पा के अंदर विजय की खुशी ठाठें मार रही होती है, “इत्मीनान से बैठकर आप से युद्ध का हाल सुनेंगे। हमारे मराठा बहादुरों के वीरतापूर्ण कारनामों की गाथाएँ और जयगान गाकर जश्न मनाएँगे। एकबार पूणे तो पहुँचो।“
“हाँ हाँ, अप्पा। अभी तो थकान उतार रहे हैं। तुम्हें बहुत सारी खुशखबरियाँ सुनानी हैं। यह जंग मराठा इतिहास में एक सुनहरी मोड़ साबित होगी।... आओ तुम्हें किसी से मिलवाऊँ।“ बाजी राव अपने भाई चिमाजी अप्पा को मस्तानी के पास ले जाता है।
“मस्तानी, यह है मेरा छोटा भाई चिमाजी अप्पा और अप्पा, यह है महाराजा छत्रसाल की पुत्री और मेरी महबूबा तुम्हारी नई वाहनी साहिबा, मस्तानी।“
ज्यों ही चिमाजी अप्पा और मस्तानी एक-दूसरे के रू-ब-रू होते हैं तो दोनों आश्चर्यचकित रह जाते हैं। एक-दूसरे को सम्मुख देखकर उन्हें झटका-सा लगता है। उन्हें लगता है मानो अतीत का कोई बिछड़ गया साया आज पुनः उनसे आ जुड़ा हो। दोनों को कुछ वर्ष पहले की एक घटना स्मरण हो आती है। जब एक युद्ध जीतने के बाद चिमाजी अप्पा निजाम शाहजहाँ खान को मारकर उसकी बिल्लौरी आँखों वाली रखैल को उठा लिया था और रास्ते में चालाकी के साथ वह चिमाजी अप्पा की कैद में से भाग गई थी। चिमाजी अप्पा उस हसीन मस्तानी के हुस्न का आनन्द लेने से वंचित रह जाने के कारण कई महीने दुख मनाता रहा था। मस्तानी को अब अचानक अपनी आँखों के आगे देखकर चिमाजी अप्पा को अत्यंत प्रसन्नता और आश्चर्य होता है। मस्तानी भी चिमाजी अप्पा को पहचान लेती है और अपने आने वाले भविष्य को लेकर खामोश और भयभीत हो जाती है।
बाजी राव मस्तानी को आलिंगन में ले लेता है, “क्यों अप्पा, दंग रह गए न मेरी पसंद को देखकर ? मस्तानी को प्राप्त करके मुझे ऐसा लगता है मानो मेरी बरसांे की तलाश और भटकन खत्म हो गई हो।“
चिमाजी अप्पा, मस्तानी को आँख मारता है। मस्तानी भी उसके संकेत को समझ जाती है कि वह बाजी राव को अतीत की घटना के विषय में कुछ नहीं बताएगा। तीनों जन बैठकर बातें करने लग जाते हैं। चिमाजी अप्पा, बाजी राव को कोई बहाना बनाकर बाहर भेज देता है। बाजी राव के बाहर जाने के बाद चिमाजी अप्पा अपने होंठों पर जीभ फेरता हुए लार टपकाता है, “आखि़र, ऊँठ पहाड़ के नीचे आ ही गया ? क्यों मस्तानी जान, देखना भागकर अब भी ? हमें भी पता चले, तू हमसे कहाँ तक, कितनी दूर और कितनी तेज़ भाग सकती है ? अब मराठे करेंगे तेरे दाँत खट्टे।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी की कलाई पकड़ लेता है।
मस्तानी एक झटके से अपनी कलाई छुड़ा लेती है और सीना तानकर कहती है, “इसबार मैं भागूँगी नहीं। भगाने आई हूँ मराठा सरदार।“
“ऋषि को तप और तवायफ़ को रूप का अंहकार हो ही जाता है, मस्तानी बाई। यह तो वक्त ही बताएगा, कौन भागता है और कौन भगाता है। पहले जी भरकर मेरे बड़े भाई बाजी राव का दिल बहला। जब पेशवा का मन तेरे से भर जाएगा, फिर मैं अपने दरबार में तेरे मुज़रे देखा करूँगा। सुना है, धरती पर ऐड़ी मारकर तू भूचाल ही ला देती है।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी की गाल पर चिकौटी काट लेता है।
मस्तानी अपनी बांह से अप्पा का हाथ दूर झटक देती है, “मैं बाजी राव स्वामी को अपना सबकुछ मान चुकी हूँ। अप्पा, तुम अपनी औकात में रहना ! कहीं यह न हो कि मैं तुम्हारी जि़न्दगी में भूचाल ला दूँ। लगता है, पहले कभी बुंदेलों से वास्ता नहीं पड़ा। मैं तुम्हारे भ्राता पेशवा को पति स्वीकार चुकी हूँ। मैं उनकी वफ़ादार और खिदमतगार बनकर रहूँगी। ऐसी कोई हरकत न करना जो हमारे दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध हो। बाजुओं तक सोने की चूडि़यों से भरी मेरी ये कलाइयाँ तलवार चलाना भी जानती हैं। बाकी समझदार को इशारा ही काफ़ी होता है।“
तभी बाजी राव वापस आ जाता है, “क्या गुफ्तगू हो रही है देवर और भाभी में?“
मस्तानी स्थिति को संभालने के लिए बात बदल जाती है, “बस, कुछ नहीं। अप्पा स्वामी आपकी तारीफों के पुल बांध रहे थे।“
चिमाजी अप्पा, मस्तानी को अधिक संजीदगी से नहीं लेता और यह समझ लेता है कि बाजी राव कुछ देर मस्तानी को रखैल बनाकर रखेगा और फिर मन भर जाने पर छोड़ देगा।
चिमाजी अप्पा के साथ एकांत में बातचीत करने के लिए बाजी राव, मस्तानी को जनाना खेमे में भेज देता है। मस्तानी के बाहर निकलते ही चिमाजी अप्पा बाजी राव को कुरेदता है, “यह मस्तानी वाला क्या किस्सा है ? आपको भेजा किसी और उद्देश के लिए था और आप कर कुछ और ही आए ?“
“अप्पा, क्या बताऊँ। गया तो मैं जंग जीतने था, पर दिल हार गया यार। मस्तानी का नृत्य देखते ही मैं मस्तानी को पाने के लिए पागल हो गया था। मैं बहुत चाहने लग गया हूँ इस स्त्री को। अब एक क्षण भी इसके बग़ैर नहीं रह सकता। इसलिए तुमसे प्रार्थना है कि तुम मेरे साले यानी काशी बाई के भाई कृष्णा राव महादेव जोशी को साथ ले जाकर काशी को मस्तानी के बारे में इस ढंग से बताओ कि वह मस्तानी का ज़रा भी विरोध न करे। काशी अपने भाई की बहुत बात मानती है। कुछ ऐसा कर दो कि बाकी परिवार वाले भी हमारे संबंधों को स्वीकार कर लें। जो होना था, वह तो अब हो गया।“ बाजी राव अपनी जुगत समझाता है।
“भाऊ, वह तो ठीक है। पर आप तो जानते ही हो कि आई (माँ) को भिक्खु भाई और काकी (सौतेली माँ) के साथ अब तक नफ़रत है। बाबा (पिता) आई को छोड़कर ज्यादा तवज्जो काकी को दिया करते थे। याद है, अपनी आई (सगी माँ राधा बाई) कैसे आसमान सिर पर उठाकर बर्तन तोड़ा करती थी। थोड़ा बहुत हंगामा तो होगा ही, पर मैं कोशिश करके देख लेता हूँ यदि मामला कुछ ठंडा हो सके तो...।“
“अप्पा, कोशिश नहीं, तुम पूरी शक्ति लगाओ। इस रिश्ते से सारी कौम को लाभ है। हम पूरे भारत में केसरी मराठा परचम लहराकर स्वराज स्थापित देंगे।“
“वह कैसे ?“
“देखो अब तक हमको राजपूतों की निष्ठा को लेकर चित में एक धुकधुकी ही लगी रहती थी। राजपूत गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। आज वह सिंधिया (हबशिया) के साथ हैं, कल निजामों की ओर, परसों बादशाह कनी और चैथे दिन बागियों का पलड़ा भारी हुआ तो उनके साथ चल पड़े। हवा की तरह अपना रुख बदलते आए हैं ये राजपूत। हमें यह भी पता नहीं होता कि मेवाड़
(Mewar/Mewad, is a region of south-central Rajasthan state in western India. It includes the present-day districts of Bhilwara, Chittorgarh, Rajsamand, Udaipur and some parts of Gujarat and Madhya Pradesh and Haryana) तक हमारी फौज के पहुँचते उनके समर्थन का तराजू किधर झुकेगा। बुंदेलों के साथ यह रिश्ता गांठ कर हम राजपूतों की ओर से निश्ंिचत हो सकते हैं। हम पूर्वी और पश्चिमी घाट के मध्य पड़ते दक्खिनी और मध्य भारत, मावला के सारे इलाकों के हुक्मरानों अर्थात दक्खिन के निजामों का राह काटते हुए दिल्ली आँखें मूंदकर जा सकते हैं। बुंदेलखंड, दिल्ली के बिल्कुल आधे रास्ते में पड़ता है। हमारी वहाँ छावनी बनने से हमारा बहुत लाभ हो सकता है। महाराजा छत्रसाल अपने समय का एक बढि़या योद्धा रहा है। उनके पिता चम्पत राय को आलमगीर औरंगजेब ने अपने दरबार में विशेष स्थान दिया था। पन्ना की हीरों वाली खानों तक हमारी पहुँच होगी। हमारा खजाना खाली है। वह हमें युद्ध लड़ने के लिए मदद और चैथ भी निरंतर देंगे। मस्तानी के साथ उन्होंने मुझे पाँच लाख लूगदा चोली (दहेज), मंहगे उपहार और महाराजा शाहू जी के लिए सवा दो लाख की रकम भी अलग से दी है। हमें पुत्र बनाकर अपनी वसीयत के अनुसार अपने दो पुत्रों के बराबर का तीसरा हिस्सा बुंदेलखंड से दक्खिनी तट तक का क्षेत्र अर्थात नर्बदा की जागीर और पन्ना की हीरों वाली खानों को देने की घोषणा भी की है।“ बाजी राव अपने समस्त देखे हुए सपनों का खुलासा कर देता है।
चिमाजी अप्पा प्रसन्न होकर सिर हिलाता है, “हूँ ! फिर तो हम मराठों के लिए घाटे का सौदा नहीं हंै। अपितु एक राजनीतिक संधि है यह। हमें तो बुंदेलों का धन्यवादी होना चाहिए। राजपूतों पर राज करेंगे ! धन लेंगे!! और उनकी स्त्रियों को दबोचेंगे !!! भाऊ, अपनी तो पौं बारह हो गई। ‘चुपड़ी हुई, उस पर दो दो’ वाली बात है यह तो। लाभ ही लाभ। घाटा किसी तरफ से नहीं दिखाई देता।“
“लाभ हानि तुम विचारते रहो। मेरे लिए तो कुल दुनिया की दौलत और जागीर एक तरफ और मस्तानी दूसरी तरफ। मुझे मस्तानी से प्रेम हो गया है अप्पा, प्यार।“
चिमाजी अप्पा बाजी राव की जांघ पर हाथ मारता है, “दादा, युद्धों में अधिक समय रहने के कारण आप अतृप्त रहते हो। दिमाग खुश्क हो गया लगता है। ठीक है, कुछ देर रंगरास की महफि़लों का आनन्द उठाइये और अपने अंदर भड़कती काम की ज्वाला को शांत करिये। यह जिसे आप प्रेम कह रहे हैं, महज देह आकर्षण और काम लालसा है। ऋषि अगस्त, सोम, इंदर, विश्वामित्र जैसे भी इससे मुक्त नहीं हो सके थे। मैं पूणे जा कर इस मामले से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाता हूँ। चिंता न करें। अपनी तरफ से मैं ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दूँगा। थोड़ी बहुत घरेलू जंग और क्लेश का तो आपको सामना करना ही पड़ेगा। उप-स्त्री का मामला है, कोई छोटी मोटी बात तो नहीं।“
“बाजी राव ने तो जब से होश संभाला है, बस युद्ध ही लड़े हैं। न मैं कभी हारा हूँ और न घबराया हूँ। पर पता नहीं क्यों, इस बार कलेजा-सा कांपता है। खै़र, माँ भवानी की कृपा से मुझे आशा है कि सब ठीक हो जाएगा।“
कुछ अन्य सरदारों के साथ चिमाजी अप्पा वापस घर आकर मस्तानी के विषय में बता देता है और काफ़ी हद तक मस्तानी के लिए अपने परिवार में समाहित होने योग्य जगह भी बना देता है।
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