शनिवार वाड़ा
बाजी राव और मस्तानी का प्रेम कोथरूड़ बाग (पूणे का एक इलाका) के एकांतमयी वातावरण में पलने लग पड़ता है। बाजी राव दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासी मंे डूबा रहने लगता है। दिन भर मस्तानी, बाजी राव के साथ घुड़सवारी और युद्ध अभ्यास करती रहती है। कभी कभी तो बाजी राव के संग शनिवार वाड़ा में शिकार खेलने भी चली जाती है। संध्या समय वह बाजी राव के बराबर बैठकर मदिरापान करती, नृत्य दिखलाती और अपनी सुरीली आवाज़ में गीत-ग़ज़लें भी सुनाती है। मस्तानी बड़ी निपुणता से अनेक साज बजाना जानती है। शाइरी करने के शौक के कारण मस्तानी ने पढ़ना-लिखना भी सीखा हुआ है। वह अनेक भाषाओं का ज्ञान रखती है। रात्रि में नृत्य करते हुए मस्तानी को बाजी राव अपनी बाहों में उठाकर उसके होंठों से अपने होंठ जब जोड़ लेता है तो यूँ लगता है मानो कृष्ण बंसरी बजा रहे हों। मस्तानी भी बाजी राव के साथ इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाती है जैसे चंदन के वृक्ष से नाग लिपटा होता है।
मस्तानी बहुमूल्य गहनों और रेशमी वस्त्रों में सदैव सज धज कर रहती है। सबसे बड़ी बात वह जवान और अति सुशील है। मस्तानी बाजी राव से आयु में दस वर्ष छोटी है। गोरी-चिट्टी और लम्बी छरहरी भरपूर यौवना मस्तानी के हुस्न का जादू बाजी राव के सिर चढ़कर बोलने लग पड़ता है। मस्तानी के प्रेम में बाजी राव सब रिश्ते-नाते और दुनियादारी बिसरने लग जाता है। बाजी राव का संसार सिमटकर रह जाता है जो मस्तानी से शुरू होकर मस्तानी पर ही खत्म हो जाता है।
ससवाद (करहा नदी के तट पर बसा पूणे का एक क्षेत्र) से दूर कोथरूड़ में रहने के कारण बाजी राव का रिश्ता लगभग अपने परिवार से टूट ही गया होता है। वह ससवाद एक जिम्मेदारी पूरी करने ही आता-जाता है। परंतु उसका मन वहाँ नहीं लगता। बाजी राव का मन तो मस्तानी के पास ही बहलता है।
बाजी राव मस्तानी को वेल नदी के पास पाबल (श्रीरर तुलका का पूणे से 39.94 किलोमीटर दूर पड़ता एक पंचायती गांव) के नागेश्वसर महादेव मंदिर को दिखाने ले जाता है। मस्तानी भिन्न भिन्न नृत्य मुद्राओं वाली नर्तकियों की मूर्तियों वाले मंदिर की सुंदरता देखकर मोहित हो उठती है। वहाँ के एकांत में मस्तानी मंदिर के पुजारी से मंदिर के विषय में पूछती है।
पुजारी उन्हें बताता है, “इस मंदिर में दूर दूर से लोग अपने प्रेम की प्राप्ति और रिश्तों के लम्बे निभने की मन्नतें मांगने आते हैं। आपके जैसी प्रेमी युगलों का तो यहाँ तांता लगा रहता है। इस मंदिर को कन्नू राजा पाठक ने अपनी महबूब नर्तकी के लिए चैहदवीं सदी में बनवाया था।“
मस्तानी मजाक में बाजी राव से पूछ लेती है, “शाहजहाँ ने मुमताज महल के लिए ताज महल बनवाया था। क्या कभी मेरे लिए भी आप ऐसा जगह कुछ बनवाओगे ? आप तो कहते थे, कुछ बनवाऊँगा जिसको देखकर सारी दुनिया दंग रह जाएगी। कब बनवाओगे ?“
बाजी राव उतर में कुछ नहीं कहता और मस्तानी को बांह से पकड़कर वहाँ से ले जाता है। जब वह मुल्ला-मूथा दरिया के निकट पहुँचते हैं तो बाजी राव मस्तानी से प्रश्न करता है, “मस्तानी, एक बात बता, कैसा लगा तुम्हें हमारा पूणाका (पूणे) ? तेरा यहाँ चित लगा कि नहीं ? मराठों की मातृभूमि बढि़या है कि बुंदेलखंड ?“
मस्तानी हँसती हुई उतर देती है, “स्वामी, विश्व में सर्वोतम तो वही जगह होती है जहाँ आप जन्मे, पले और बड़े हुए होते हो। लेकिन जहाँ वर्तमान समय में रह रहे हो और आने वाली वहाँ आयु बितानी हो तो जड़े जमाने के लिए उस धरती को भी प्यार करना पड़ता है। नहीं तो इन्सान सदा उखड़ा रहता है।“
“नरबादा (मस्तानी), मेरा छत्रपति महाराज शाहू की राजधानी सतारा से अपना केन्द्र बदलने से बहुत पहले से विचार बना हुआ है। मुझे हर काम में शाहू जी की दखलअंदाजी नहीं भाती। मैं भी बिना रोक टोक मुगलों की तरह ऐश परस्ती करना चाहता हूँ। अब पूरा जीवन मैं लड़ मरकर तो व्यतीत नहीं कर दूँगा न?... कभी पूणा एक छोटा सा गांव हुआ करता था। अब यह एक बड़ा शहर बन चुका है। मराठा राजनीति का गढ़ कह लें तो कोई अतिकथनी नहीं होगी। इसके कई पेठ (नगर) हैं और प्रत्येक पेठ में अनेक वाड़े(Residence Complex½) हैं। पर मैं एक दूसरा ही वाड़ा बसाने की सोच रहा हूँ। मस्तानी वाड़ा।“
“वाह ! बहुत सुंदर योजना है। पर कहाँ बनाओगे नया वाड़ा ?“
“यहीं, कस्बा पेठ के समीप मुल्ला-मूथा दरिया के किनारे ही। और कहाँ ? महाराज शाहू जी ने लाल महल वाली यह जागीर मुझे प्रदान की हुई है। मेरा लक्ष्य एक एक ऐसा वाड़ा बनाने का है जो बाकी सभी वाड़ों से खूबसूरत और आलीशान हो। किले की भाँति सुरक्षित हो। वाड़े का हर मकान केवल दो मंजि़ला हो। छत पर सोने के लिए शयन कक्ष। निचली मंजि़ल पर कोई खिड़की न हो ताकि अंदर बसने वाले पर्दे में रह कर अपना जीवन अपनी इच्छानुसार व्यतीत कर सकें।“ बाजी राव अपनी कल्पना में बसा नक्शा खींच देता है।
मस्तानी यह सुनकर उमंगित हो उठती है, “ठीक है। मैं इस कार्य में आपका पूरा सहयोग करूँगी। मेरी ओर से चाहे आज से ही तैयारियाँ प्रारंभ कर दो।“
बाजी राव, मस्तानी के साथ एक नया संसार निर्मित करने के लिए ज्योतिष्यिों को 10 जनवरी 1730 ई. के दिन बुलाकर मुहूर्त निकलवाता है तो शनि देव की कृपा वाला शनिवार का शुभ दिन निकल आता है। मस्तानी के नाम के वाड़े का एकदम विरोध न हो, इसलिए बाजी राव मस्तानी के परामर्श पर उस नये वाड़े का नाम शनिवार वाड़ा यह सोचकर रख देता है कि बाद में उस नाम को बदल दिया जाएगा। सात दिन बाद 17 जनवरी 1730 ई. को नवीन और आधुनिक सुविधाओं वाले शनिवार वाड़े का बाजी राव नींव पत्थर रखकर निर्माण कार्य आरंभ करवा देता है।
राजस्थान के प्रसिद्ध ऐतिहासिक कुम्मवत खत्री को भवन निर्माण का उŸारदायित्व सौंपते हुए बाजी राव समझाता है, “यह वाड़ा पूणे के सब वाड़ों से उŸाम होना चाहिए। समीप के इलाके जूनर के जंगल से सागौन वृक्षों की लकडि़याँ, चिचवड़ से पत्थर, जूजेरी के नींबू बूटों का प्रयोग करके इस को जितना संभव हो सकता है, हमारे रहने के लिए तैयार कर दो।“
कुम्मवत कागज-कलम तैयार कर लेता है, “चिंता न करिये, श्रीमंत। मैं दिन रात एक कर दूँगा। आप इसकी योजना मुझे बता दो एकबार, फिर मंैं जानूँ या मेरा काम जाने। आपकी कल्पना को साकार करके रख दूँगा। ऐसा शानदार वाड़ा तैयार करूँगा कि लोग मुँह में उंगलियाँ दबाकर देखते रह जाएँगे।“
“हम इसके पाँच द्वार बनाना चाहते हैं। सबसे बड़ा मुख्य दरवाज़ा उतर दिशा मंें दिल्ली की ओर खुलता हो ताकि जब भी हम शनिवार वाड़े से बाहर कदम रखें तो दिल्ली पर राज करने का लक्ष्य हमें स्मरण रहे। इसका नाम भी हम दिल्ली दरवाज़ा ही रखेंगे। इस दरवाज़े की मजबूती छातीची होनी चाहिए, माटीची नहीं। मेरा आशय यह है कि दरवाज़ा बहादुर मराठा मर्दों की छाती जैसा मजबूत हो। मिट्टी की तरह भुर जाने वाला नहीं। दरवाज़ा कम से कम इतना बुलंद हो कि होडा (पालकी) सहित हाथी आसानी से इसमें से निकल सके। शत्रु का हाथी टक्कर मारकर इसे ध्वस्त न कर सके। इसलिए दरवाज़े में पचास-साठ तीखे नुकीले बांहों बराबर कील जड़ दो। पूरा दरवाज़ा सख्त लोहे से ढका हो।“
“बेफिक्र रहें, श्रीमंत। पूरा दरवाज़ा लोहे की चादर से मढ़ा होगा। जंगी हाथी के माथे की सीध में आधे आधे गज़ के बहतर कील लगाएँगे। साधारण व्यक्ति के निकलने के लिए छोटा-सा दरवाज़ा लगाएँगे ताकि हमला होने की सूरत मंे फौज जल्दी अंदर प्रवेश न कर सके।“ कुम्मवत खत्री दरवाज़े की तस्वीर बनाकर दिखाता है।
“हाँ, दरवाज़े से निकलते ही रास्ता एकदम बायीं ओर मुड़ना चाहिए ताकि हमलावर को आगे बढ़ने में कठिनाई पेश आए और हमारी सेना आगे बढ़ने वालो को ढेर करती जाए।... एक दरवाज़ा मस्तानी के लिए विशेष तौर पर बनाया जाए। उस ‘मस्तानी दरवाजे़’ (मस्तानी के पोते अली बहादुर के कारण इसको अली बहादुर दरवाज़ा भी कहते हैं) को सिर्फ़ मस्तानी ही अंदर-बाहर जाने के लिए इस्तेमाल किया करेगी। तीसरा दरवाज़ा सुरक्षा की दृष्टि से बनाया जाएगा - खिड़की दरवाज़ा। चैथा दक्षिणी गणेश दरवाज़ा भगवान गणेश रंग महल और कस्बा गणपति मंदिर की ओर जाते हुए रास्ते में बनाया जाए। इस दरवाज़े के द्वारा वाड़े की स्त्रियाँ मंदिर जाया करेंगी। पाँचवा जमभुल दरवाज़ा (कई वर्ष बाद बाजी राव के पोते पेशवा नारायण राव की अर्थी के इस दरवाजे़ सेे श्मसान भूमि को जाने के बाद अब इस दरवाजे़ को नारायण दरवाज़ा कहा जाने लगा है) एक खास मकसद के लिए गुप्त सा बनाया जाए। हमारे वंशजों के मनोरंजन के लिए लुकछिप कर पर्दे में आने वाली रखैलें और कंचनियाँ इस दरवाज़े का प्रयोग किया करेंगी।“
“ये तो दरवाजे़ हो गए। बीच मंे कैसे और कौन से भवन बनाये जाने हैं ?“
“इसमें हमारी प्रिय मस्तानी के लिए विशेष ‘मस्तानी महल’ बनाया जाए। एक थोरलिया रायनचा दीवानखाना (Marathi : The court reception hall of the eldest royal, meaning Baji Rao-I) जहाँ हम दरबार लगाया करेंगे। नृत्य दीवानखाना (Dance Hall) हमारे मुजरे देखने के लिए होगा और जूना आरसा (पुराना आरसी) महल (Old Mirror Hall) फुर्सत के समय वक्त बिताने के लिए होगा जो सारा का सारा शीशों से जड़ा हो...। और हम क्या कहें, आप खुद समझदार और अच्छे कारीगर हो।“ बाजी राव मोहरों की अनेक थैलियाँ कुम्मवत खत्री को इस कार्य के लिए दे देता है।
मोहरों को देखकर कुम्मवत खत्री अवाक और प्रसन्न हो जाता है, “बस, मैं समझ गया सब। आप देखते चलें, मैं आपको क्या करके दिखाता हूँ, हुजूर !“
वाड़े के निर्माण कार्य युद्धस्तर पर प्रारंभ हो जाते हैं।
No comments:
Post a Comment