Monday, 2 November 2015

अध्याय-14

                                                                                                                                                                                                   
हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुलक
हैदराबाद के इर्द गिर्द वाले क्षेत्र में गोलकुंडा (Shephered’s Hill) पर  624 ई. से 1075 ई. तक चालुक्या वंशियों ने राज किया था। 1158 ईसवी के बाद कल्याण के चालुक्या का साम्राज्य टूटकर बिखर गया। उनके एक भाग में से वारंगल के काकतिया शासक हुए थे। दूसरे भाग में से द्वारसमुंदर के होएसल, तीसरे देवगिरी के यादव। फिर 1190 ई. से 1310 ई0 तक काकतिया वंश, वारांगल (वर्तमान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से 148 किलोमीटर उŸार-पूर्व की ओर) से सिंहासन पर बैठकर राज करते रहे। काकतिया को अपना राज्य कायम रखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था।


प्रोलराज दातिया के समय काकतियों की प्रसिद्धि बहुत बढ़ी। प्रोलराज दातिया के पोते गणपति ने साम्राज्य का कांची तक विस्तार किया। गणपति की पुत्री रुद्रमा ने अपनी विलक्षण शासननीति से उल्लेखनीय इतिहास रचा। प्रताप रुद्रदेव (प्रथम), दातिया और काकतिया राजाओं की दिल्ली के सुल्तानों के साथ ठनाठनी होती रही थी। हमला करने के लिए अल्ला-उद-दीन खिलजी द्वारा भेजी सेना को प्रताप रुद्रदेव (प्रथम) के हाथों 1303 ई. में पराजित होकर वापस लौटना पड़ा था। चार वर्ष बाद यादवों की पराजय से उत्साहित होकर मुसलमान हुक्मरान फिर काकतिया नरेश पर हमला बोलने आ गए। दिल्ली का सुल्तान वारंगल से धन-दौलत लूटना और कर के रूप में निरंतर आमदनी चाहता था। सुल्तान ने अपने सेनापति मलिक काफूर को फौज देकर प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) को अपने अधीन करने के लिए भेजा। प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) ने वारंगल के किले में से डटकर मुकाबला किया। सफल घेरा डालकर मलिक काफूर ने 1310 ई. में काकतिया नरेश को संधि के लिए विवश कर दिया। संधि में काकतिया नरेश ने मलिक काफूर को 100 हाथी, 7000 घोड़े, असंख्या हीरे-जवाहरात, रत्न और ढाले हुए सिक्के दिए। इसके अतिरिक्त राजा ने दिल्ली के सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया।

1310 ई. से 1321 ई. तक खिलजी वंश ने गोलकुंडा और वारंगल पर शासन किया। गोलकुंडा की कोयला खानों में से इसी समय अल्लाउद्दीन खिलजी कोहेनूर हीरा लूटकर दिल्ली ले गया। अल्लाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के पश्चात अराजकता फैल गई और प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) दातिया ने कर देना बंद करके अपने राज्य की सीमाओं को फैलाना प्रारंभ कर दिया। तुगलक वंश के गियासउद्दीन ने अपने पुत्र मुहम्मद जौना को सेना देकर वारंगल पर कब्ज़ा करने भेज दिया। हिंदू राजाओं ने बहादुरी के साथ मुकाबला किया और उसको डराकर भगा दिया। करीब चार महीने बाद भारी लश्कर के साथ फिर आक्रमण हुआ तो युद्ध में काकतिया नरेश को अपने परिवार और सरदारों सहित आत्मसमर्पण करना पड़ा।

1325 ई. में वारंगल पर इस प्रकार तुगलक वंश का नियंत्रण हो गया और जौना ने वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर रख दिया। 1347 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के सिपहसालार अल्लाउद्दीन बाहम शाह ने बगावत कर दी और अपनी बाहम शाही सल्तनत दक्खिनी पठार में कायम करके गुलबर्ग (वर्तमान हैदराबाद से 200 किलोमीटर पश्चिम में) को अपनी राजधानी बना लिया। गोलकुंडा के शासक सुल्तान कौली कुतब शाह ने बाहमनी सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह करके कुतब शाही राज 1518 ई. में स्थापित किया। 1687 ई. (21 सितम्बर) में गोलकुंडा सल्तनत मुगल बादशाह औरंगजेब के अधीन आ गई। कब्ज़े वाले इलाके को उसने डेकन (दक्खिन) सूबे का नाम दे दिया और अपनी राजधानी गोलकुंडा से औरंगाबाद (हैदराबाद से 550 किलोमीटर उŸार-पश्चिम की ओर) में परिवर्तित कर ली।

1713 ई. में फर्खशियार मुगल बादशाह ने आसिफ़ जाह (प्रथम) को डेकन(दक्खिन) का राज्य प्रतिनिधि यानी निजाम-उल-मुल्क बना दिया। 1724 ई. में आसिफ़ जाह ने मुबारिज खान को पराजित करके दक्खिनी सूबे को अपने अधिकार में ले लिया और आसिफ़ जाह वंश का प्रारंभ किया। दक्खिन को उसने हैदराबाद दक्खिन कहना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार, पुनः आसिफ़ जाह निज़ाम यान हैदराबादी निज़ामों का शासन चल पड़ा।

हैदराबाद में बैठा निज़ाम-उल-मुल्क कमर-उद-दीन (20 अगस्त 1671 - 1 जून 1748), आसिफ़ जाह(प्रथम) दक्खिनी भारत का दिल्ली के बादशाह द्वारा स्थापित किए राज का प्रतिनिधि बनकर अपने पैर जमाने लग पड़ा था। तुर्क आसिफ़ जाह समरकंद (वर्तमान में उजबेकिस्तान) से था। उसका दादा ख्वाजा आबिद, बुखारा रियासत के समरकंद के अधीन पड़ने वाले नगर अलीआबाद का था। लेकिन उसका पिता सहाबुद्दीन खान, आलम शेख और सूफी मत का होने के कारण अधिकांश समय सुहरावर्द, खुरासान (वर्तमान में कुद्रीस्तान) में ही रहा। उसकी ननिहाल सैयद मीर हमदान, समरकंद वाले के खानदान में से थे। (प्रसिद्ध सूफी संत शेख शहाबुद्दीन सुहराववर्दी भी इन्हीं के वंश में ही हुआ है)।

ख्वाज़ा आबिद, काज़ी और शेख-उल-इस्लाम था। वह मक्का में हज करने जाते समय 1655 ई. में शाहजहाँ के शासनकाल के समय हिंदुस्तान में आया था। बादशाह ने दरबार में आमंत्रित करके भारी सम्मान, खिल्लत और उच्च पदों की पेशकश की थी। जिसे उसने हज से लौटकर 1657 ई. मंे औरंगजेब की सेवा में उपस्थिति होकर स्वीकार किया। उस समय औरंगजेब दक्खिन में अपने पिता शाहजहाँ द्वारा बनवाये मयूर राज के सिंहासन (The Peacock Throne : Mayurasana, Thakt-e-Tavus was a famous jeweled throne that was the seat of the Mughal emperors of India. It was commissioned in the early 17th century by Emperor Shah Jahan and was located in the Red Fort of Delhi. The original throne was subsequently captured and taken as a war trophy in 1739 by the Persian king Nader Shah, and has been lost ever since. A 2000 report by The Tribune, estimated the value of the Peacock Throne at $810 million USD Rs. 4.5 billion) पर विराजमान होने के लिए हाथ-पांव मार रहा था।  ख्वाजा आबिद ने धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के अतिरिक्त शस्त्र विद्या भी सीखी हुई थी। औरंगजेब ने उसको अपनी फौज में भर्ती करके ‘इक खाना’ की उपाधि प्रदान की थी। उसके पास फौज में उच्च पद, 3000 पैदल सिपाही और 500 घुड़सवार थे। कुछ छोटे मोटे युद्धों के बाद औरंगजेब ने उसको पहले अजमेर का सूबेदार और फिर मुल्तान का सरपरस्त बना कर ‘खिलचे खाना’ की उपाधि दी थी।

30 जनवरी 1687 ई. को गोलकुंडा के कुतबशाही शासक के साथ हुए युद्ध में ख्वाजा आबिद की अपनी ही तोप का गोला फंस जाने से मृत्यु हो गई थी। उसके पाँच पुत्र थे। जिनमें से सबसे बड़ा शहाबुद्दीन खान उर्फ़ गाज़ी-उद-दीन खान, शाह जहां के महा मंत्री सदाउद्ौला खान की पुत्री साफिया खानुम से ब्याहा हुआ था और बादशाह के दरबार में उच्च अधिकारी था। गाज़ी-उद-दीन खान के पैदा होने वाला पुत्र कमर-उद-दीन, निज़ाम-उल-मुल्क और आसिफ़ जाह वंश का संस्थापक बना था।

निज़ाम-उल-मुल्क कमर-उद-दीन ने बड़ी चतुरता के साथ अपने क्षेत्र में बादशाह की पकड़ ढीली करके अपनी पकड़ मज़बूत की और धीरे धीर विद्रोही तेवर अपना लिया। शासन के नशे में निज़ाम-उल-मुल्क ने चीकलथान में 1721 ई. में हुई दिल्ली दरबार और मराठों की संधि को भी तोड़ दिया। संधि की शर्तों के अनुसार दक्खिन के छह सूबों की चैथ और सरदेशमुखी वसूलने का हक मराठों को था। निज़ाम-उल-मुल्क मराठों द्वारा चैथ उगाहने के हक का विरोध करने लग पड़ा।

निज़ाम-उल-मुल्क आहिस्ता आहिस्ता अपनी शक्ति बढ़ाता गया और 1722 ई. में उसने बादशाह मुहम्मद शाह के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खुलेआम ऊपर उठा लिया। उसके उपरांत निज़ाम ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की घोषणा कर दी। औरंगाबाद से बदलकर हैदराबाद को उसने अपनी राजधानी बना लिया। सन 1724 ई. तक निज़ाम-उल-मुल्क दक्खिन में गुजरात और मालवा पर कब्ज़ा करने के पश्चात स्वतंत्र होकर शासन करने लग पड़ा था। उसने अहमदाबाद का राज्यपाल अपने मामा हमीद खां को बना दिया। सरबुलंद खान उस समय काबुल में था। उसने अपने स्थान पर सुजामत खान को अपना उराधिकारी नियुक्त कर दिया। हमीद खान डर कर अपना अधिकार छोड़ने को तैयार हो गया था। परंतु उन्हीं दिनों खंडो राव दाभाड़े के सहयोगी पिलाजी गायकवाड़ की तरह कंठाजी कदमबांडे भी गुजरात से कर वसूल किया करता था। हमीद खान ने कंठाजी की मदद से सुजामत खान को मरवा दिया। सुजामत खान का भाई रुस्तम अली सूरत का फौजदार था। उसने पिलाजी गायकवाड़ के साथ मिलकर हमीद खान पर हमला कर दिया। हमीद खान के पक्ष में मराठों को देखकर गायकवाड़ भी उनके साथ जा मिला और रुस्तम अली मारा गया। उसके बाद कदमबांडे और गायकवाड़ में चैथ वसूली को लेकर झगड़े होने लगे। तब हमीद खान ने उनकी लड़ाई समाप्त करने के लिए इलाकों का बंटवारा कर दिया कि मही नदी के पश्चिम की तरफ से कदमबांडे और पूर्वी दिशा से दाभाड़े चैथ वसूल किया करेगा।

निज़ाम-उल-मुल्क की धोखाधड़ी से तैश में आकर बादशाह ने अपने सिपहसालार मुबरेज खान को एक सेना की टुकड़ी देकर निज़ाम-उल-मुल्क को सबक सिखाने के लिए भेजा। लेकिन मुबरेज खान को उस के साथ निपटने के लिए मराठों की आवश्यकता पड़ गई। दिल्ली के बादशाह ने मराठों की शर्तें मान कर उनसे सहायता की पुकार की। छत्रपति शाहू ने बाजी राव को इस कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी। बाजी राव 1724 ई. को अपना लश्कर लेकर शाही फौज की सहायता के लिए शकरखेड़ा के मैदान में पहुँच गया।

लेकिन युद्ध में से निज़ाम-उल-मुल्क बचकर निकल गया और उसने मराठों की शक्ति को चूर करने के लिए मराठों के बीच फूट डालने की योजनाएँ बनानी प्रारंभ कर दीं।

1726 ई. में बाजी राव कर्नाटक गया हुआ था। उस समय निज़ाम-उल-मुल्क ने मराठा प्रतिनिधि श्रीपदराव को बरार की जागीर देकर अपनी ओर कर लिया। दरअसल, श्रीपदराव बाजी राव से ईष्र्या करता था। उसके उपरांत निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति शाहू को प्रसन्न करने के लिए पूणे में मराठा राज स्थापित कर दिया। इसके बाद निज़ाम ने श्रीपदराव के माध्यम से शाहू के साथ संधि कर ली जिसके अनुसार शाहू ने हैदराबाद की चैथ और सरदेशमुखी को छोड़ना था और चैथ के बदले निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति को एक सुनिश्चित वार्षिक रकम देनी थी। सरदेशमुखी के एवज में इंदापुर के निकट की जागीर भी निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति शाहू को देने का वायदा किया।

जब बाजी राव कर्नाटक से लौटकर आया तो उसको यह संधि उचित प्रतीत न हुई और इस मामले को लेकर बाजी राव और श्रीपदराव के बीच झगड़ा हो गया।

निज़ाम ने कोहलापुर के संभाजी (द्वितीय) को भड़काकर छत्रपति की गद्दी के लिए दावेदार बना दिया और चंद्रसेन यादव, उदाजी चवन, राव रंभा निभबालकर जैसे मराठा योद्धे छत्रपति शाहू से भिड़ा दिए। निज़ाम-उल-मुल्क ने चाल चलकर छत्रपति को संदेश भेजा कि कोहलापुर में केवल शाहू के व्यक्ति ही नहीं अपितु संभाजी के कारिंदे भी चैथ वसूलते हैं। इसलिए पहले निर्णय कर लिया जाए कि कौन छत्रपति है और चैथ वसूलने का अधिकारी। जब तक यह निर्णय नहीं होता, वह किसी को अपने इलाके में चैथ एकत्र करने की अनुमति नहीं देगा।

निज़ाम-उल-मुल्क का संदेश सुनकर छत्रपति शाहू क्रोध में आ गया। उसने बाजी राव को निज़ाम पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। बाजी राव ने जालना प्रांत से बहुत सारा धन उगाहा और फिर फुर्ती के साथ जाकर औरंगाबाद से बुराहनपुर पर धावा बोलने की अफ़वाह फैला दी। जब कि वास्तव में बाजी राव उस समय खानदेश की ओर गया हुआ था। गुजरात से मराठा निडर होकर वसूली किए जा रहे थे।

बुराहनपुर पर मराठों के हमले का समाचार सुनकर निज़ाम-उल-मुल्क अपनी फौज के साथ बुराहनपुर पहुँच गया। वहाँ पहुँकर निज़ाम को पता चला कि असल में बाजी राव उसके क्षेत्र गुजरात में लूटमार करने चला गया था। निज़ाम-उल-मुल्क को दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन निज़ाम बाजी राव के दांत खट्टे करने के लिए मचलने लग पड़ा।

1727 ई. में पेशवा बाजी राव दक्खिन से चैथ उगाहने के लिए गया हुआ था तो निज़ाम-उल-मुल्क ने अवसर का लाभ उठाने के उद्देश्य से पूणे पर हमला कर दिया। निज़ाम-उल-मुल्क के दबाव और संभाजी की राजगद्दी हथियाने की नीयत के कारण सतारा के लिए भी ख़तरा पैदा हो गया था और छत्रपति शाहू को ससवाद के निकट पुरानधर के किले में शरण लेनी पड़ी थी।

जब चैथ एकत्र करके बाजी राव को निज़ाम-उल-मुल्क द्वारा पूणे पर किए हमले की जानकारी मिली तो वह तुरंत पूणे की ओर लौट आया। निज़ाम-उल-मुल्क पहले ही वहाँ अपनी विशाल सेना लिए बैठा पेशवा बाजी राव की प्रतीक्षा कर रहा था।

बाजी राव बहुत दूरंदेशी, चतुर और शत्रु से सदैव एक कदम आगे चलने वाला योद्धा था। उसने भारी फौज के साथ उलझकर अपना नुकसान करवाना उचित नहीं समझा। बाजी राव ने विशेष युद्धनीति तैयार की और जलणा, खानदेश और बुरहानपुर जैसे जो निज़ाम-उल-मुल्क के अधीन थे, इलाकों में लूटमार करनी प्रारंभ कर दी। चारों ओर मुगलों में हाहाकार मच गई। बाजी राव का उकसाया हुआ निज़ाम-उल-मुल्क अपनी आधी सेना पूणा में छोड़कर बाकी दस्ते के साथ बाजी राव की ओर चल दिया। बाजी राव अपनी चाल में सफल हो गया और निज़ाम की शक्ति दो हिस्सों में विभाजित हो गई। रास्ते के मध्य में पालखेड़ (औरंगाबाद के निकट) के मैदान में पेशवा ने निज़ाम-उल-मुल्क को उसकी सेना सहित घेरे में ले लिया। निज़ाम के लिए स्थिति उस समय और अधिक चिंताजनक हो गई जब बाजी राव ने उसको मिलने वाली बाहरी मदद रोकर रसद भी बंद कर दी। भोजन और पानी तक भी बाजी राव ने निज़ाम-उल-मुल्क की फौज तक कई दिन न पहुँचने दिया। निज़ाम-उल-मुल्क को विवश होकर घुटने टेकने पड़े और पेशवा के साथ 6 मार्च 1728 ई. में मूंगीशेव गांव में संधि करनी पड़ी थी। संधि की शर्तों के अनुसार निज़ाम-उल-मुल्क ने मराठों के चैथ उगाहने का हक मंजूर कर लिया और छत्रपति के तौर पर शाहू जी को स्वीकार कर लिया। निज़ाम ने संभाजी (द्वितीय) के साथ भविष्य में कोई सम्पर्क न रखने का वचन भी दिया।

अक्तूबर 1728 ई. को बाजी राव ने अपने लश्कर सहित मालवा पर चढ़ाई कर दी। इस युद्ध में बाजी राव का भाई चिमाजी अप्पा, तानोजी शिंदे, मल्हार राव होलकर और ओदाजी पवार आदि योद्धा भी डटकर लड़े। मराठों ने मुगलों को करारी पराजय देते हुए मौत के घाट उतार दिया और बहुत सारे मुगलों को बंदी बना लिया। इस प्रकार बहुत ही कम समय में मराठों ने मालवा पर अपना कब्ज़ा कर लिया।

उससे कुछ अरसे बाद मुगलों ने अपनी हार का बदला लेने और मराठों से मालवा छीनने के लिए अंबर के सवाई जैय सिंह और मुहम्मद खान बंगस को अपना प्रतिनिधि बनाकर मराठों से उन्हें भिड़वा दिया। परंतु मराठों के हाथों इन दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

मुगल बादशाह के राजपाल मुहम्मद खान बंगस ने 1727 ई. में मराठों और बुंदेलों के साथ अनेक झड़पें कीं। लेकिन उसको कोई विशेष सफलता नहीं मिली। इसी वर्ष मुहम्मद खान बंगस ने बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल को निशाना बनाकर उस पर हल्ला बोल दिया। महाराजा छत्रसाल ने छत्रपति शाहू से मदद मांगी। लेकिन छत्रपति, मराठा फौज के कहीं दूसरी तरफ के युद्ध में लगी होने के कारण समय पर अपनी सहायता न भेज सका। बुंदेलों ने जैतपुर के किले से बहादुरी के साथ कई दिनों तक मुकाबला किया, परंतु अंत में महाराजा छत्रसाल को विवश होकर हार स्वीकार करनी पड़ी और बंगस द्वारा बंदी बनाये जाने के बाद संधि करनी पड़ी।

1729 ई. में मुहम्मद खान के दमन से आज़ाद होने के लिए बुंदेलखंड नरेश महाराजा छत्रसाल ने बगावत कर दी। मुहम्मद खान बंगस ने फिर जैतपुर के किले को फरवरी 1730 ई. में अपनी सेना सहित आ घेरा। महाराजा छत्रसाल ने मराठों से युद्ध में सहायता मांगी। उस समय बाजी राव बुंदेलखंड के करीब की गराह, मालवा में ही था। छत्रपति का आदेश सुनते ही वह महाराजा छत्रसाल की सहायता के लिए जैतपुर की ओर चल पड़ा। मुगलों के जरनैल बंगस को बाजी राव ने जैतपुर में आकर शिकस्त दी और उसकी सहायता के लिए आ रहे उसके पुत्र को भी बंदी बनाकर क़त्ल कर दिया। मुहम्मद खान बंगस ने महाराजा छत्रसाल को भविष्य में कोई नुकसान न पहुँचाने का वायदा करते हुए दिल्ली जाने के लिए राह छोड़ने की विनती की और अपनी जान बचाई। पेशवा बाजी राव के सहयोग से खुश होकर महाराजा छत्रसाल ने बाजी राव को अपनी पुत्री मस्तानी का रिश्ता करने के साथ साथ अपने दो पुत्रों जगतराम और हृदय शाह के बराबर अपनी जागीर में से तीसरा हिस्सा अर्थात सागर, बांदा और झांसी की जागीरंे प्रदान कीं। बाजी राव ने बुंदेलखंड की अपनी जागीर का सरपरस्त गोबिंद पंत बुंदेल को बना दिया।

उस समय गुजरात की राजसी व्यवस्था डगमगा रही थी। बहुत सारे हाकिम स्वतंत्र होकर अपनी मनमर्जी कर रहे थे। इनमें से कई मराठे अथवा मराठों के समर्थक ही थे। जिनमें पिलाजी गायकवाड़ और कंठाजी कदमबांडे प्रमुख थे। इन दोनों का संसारपति खंडो राव दाभाड़े के साथ गठबंधन था जो कि गुजरात में काफी दबदबा रखता था। मराठा सेनापति खंडो राव दाभाड़े को छत्रपति शाहू जी ने गुजरात की चैधराहट बख़्शी थी। 27 सितंबर 1729 ई. को खंडो राव के निधन के पश्चात उसके पुत्र तिंबरकर दाभाड़े ने सेनापति बनकर अपने पिता वाला कार्य संभाला। इनके अलावा गुजरात में हामिद खान भी सक्रिय पदाधिकारी था जिसको निज़ाम-उल-मुल्क की छत्रछाया और समर्थन प्राप्त था।

मुगल बादशाह ने सरबुलंद खान को जब जुलाई 1724 ई. में गुजरात का प्रबंध अपने अधीन करने के लिए भेजा था तो उसने लड़ाई की अपेक्षा कंठाजी कदमबांडे के साथ संधिनामा करके उसको माही दरिया से उर के इलाके की चैथ वसूलने का अधिकार दे दिया था। बाजी राव ने गुजरात की चैथ एकत्र करने की सरबुलंद खान से ओदेजी पवार के माध्यम से स्वीकृति मांगी तो सरबुलंद खान ने इन्कार कर दिया। बाजी राव ने गुस्से में आकर अपने भाई चिमाजी अप्पा को गुजरात के पेटलड और ढोकलां शहरों में लूटमार करने के लिए भेज दिया। सरबुलंद खान एक ही समय में बांडे और पेशवा की फौज से निपटने में असमर्थ था। इसलिए अपनी परेशानियों को कम करने के लिए उसने न चाहते हुए भी बाजी राव के साथ 1730 ई. में संधि करके पेशवा को गुजरात की चैथ और सरदेशमुखी के हक दे दिए। परंतु सूरत का समुद्री तट इस संधि में शामिल नहीं किया।

1730 ई. में दक्खिनी सूबे की सरदेशमुखी और निज़ामों से चैथ वसूलने के लिए छत्रपति महाराजा शाहू ने बाजी राव को मुहिम पर जाने का आदेश दिया तो मस्तानी भी संग जाने की हठ करने लगी। क्योंकि वह बाजी राव के अनुपस्थिति में पीछे अकेली नहीं रहना चाहती थी।

बाजी राव ने मस्तानी से पीछा छुड़ाना चाहा, “मैं तो चैथ वसूलने जा रहा हूँ। तुम वहाँ जाकर क्या करोगी?“

“मैं निज़ामों का खूबसूरत शहर हैदराबाद देखना चाहती हूँ।“
“पर वहाँ जंग भी हो सकती है। मैं सैर-सपाटे के लिए नहीं, फौजी कार्रवाई करने जा रहा हूँ।“

“मैं क्या जंग से डरती हूँ ? देखा नहीं था बुंदेलखंड में मुझे लड़ते हुए ? अब तो जीना मरना तुम्हारे साथ ही है। इसलिए मैं हर जंग मंे आपके साथ ही जाया करूँगी।“

मस्तानी ने नखरा दिखाया तो बाजी राव उसको संग ले जाने के लिए सहमत हो गया।

मस्तानी खुश हो गई, “हाय मेरे मराठा ! मस्तानी को तुम्हारी इन्हीं अदाओं ने ही तो मार रखा है।“

वैसे भी बाजी राव को निज़ाम आसिफ जाह के साथ जंग लड़ने का कोई खास अंदेशा नहीं होता। आसिफ़ जाह वृद्ध होने के कारण बिना कोई देरी किए मराठों के साथ संधि करने के लिए तैयार हो गया। बाजी राव, निज़ाम को मिलने लाठोर के निकट रोहे-रामेश्वर में मिलता है। निज़ाम, बाजी राव को दक्खिनी सूबों की सरदेशमुखी और चैथ देना कबूल कर लेता है और एक आलीशान दावत देता है।

मुगलों से पहले कुतब वंश ने दक्खिनी सूब पर एक सदी राज किया था। पाँचवे कुतब सुल्तान मुहम्मद कौली कुतल शाह द्वारा हैदराबाद में बनवाये चारमिनार और मक्का मस्जिद दिखाने के बाद घोड़ों पर बैठकर पूने की ओर रवाना होते हुए बाजी राव मस्तानी से पूछता है, “हाँ मेरी रानी ! कैसा लगा हैदराबाद ?“

“बहुत ही खूबसूरत है यह शहर।“

“इस शहर का भी बहुत दिलचस्प इतिहास है। जानती हो, कैसे बसा है यह हैदराबाद ?“

“नहीं, तुम ही बताओ। मुझे क्या पता ?“ मस्तानी कंधे उचका देती है।

“मुहम्मद कौली कुतब शाह ने इस हैदराबाद शहर की नींव 1591 ई. में रखी थी। इसका पहला नाम उसने भागनगर रखा था। गोलकुंडा के हुक्मरान सुल्तान इब्राहिम कौली कुतब शाह का पुत्र, मुहम्मद कौली कुतब शाह भागमती नाम की हिंदू नर्तकी को बहुत प्रेम करता था। उसको भागमती का नृत्य देखे बिना चैन नहीं आता था। वह प्रतिदिन भागमती के गांव चिचलम, मूसी नदी पार करके उसका नृत्य देखने जाया करता था। भागमती से मुहम्मद कुतब शाह का ध्यान हटाने के लिए उसके पिता सुल्तान इब्राहिम ने मुहम्मद कुतब शाह को अनेक भारतीय, अरबी और अन्य देशों से मंगवाकर खूबसूरत स्त्रियाँ पेश कीं। पर कुतब शाह के मन को कोई नहीं भाई। तुर्क कुतब शाह और हिंदू कंचनी भागमती के संबंधों को लेकर विरोध उत्पन्न हो गया और कुतब शाह को भागमती के साथ मिलने पर उसके पिता ने पाबंदी लगा दी।“

“फिर तो अपनी वाली कहानी ही थी उन बेचारों की भी।“ मस्तानी हँसने का ढोंग करती हुई गंभीर हो जाती है।

बाजी राव बराबर वाले घोड़े पर जा रही मस्तानी का हाथ पकड़ लेता है, “एक दिन बहुत बरसात हो रही थी और नदी में बाढ़ आई हुई थी। घरों के घर बाढ़ के पानी में तबाह हो गए। मुहम्मद कुतब शाह को भागमती की चिंता सताने लगी। वह भागमती से मिलने के लिए तड़प उठा। इस भयानक तूफानी हालत में भी कुतब शाह अपनी प्रेमिका भागमती से मिलने घोड़े पर चला गया। लोग उसको बहुत रोकते रहे। पर वह न माना और भागमती से मिलने के लिए घोड़े सहित नदी में कूद पड़ा। उसका घोड़ा नदी के पानी में ही कहीं डूब गया। परंतु जैसे तैसे मुहम्मद कुतब शाह सही सलामत दूसरे किनारे पर पहुँच गया और उसने भागमती को खोज लिया। सारा चिचलम गांव बाढ़ की मार से तबाह हो गया था। कुतब शाह के पिता सुल्तान इब्राहिम ने अपने पुत्र की भागमती से मिलने की जिद को देखकर मूसी नदी पर पत्थरों का मजबूत पुल बना दिया जिसे पुराना पुल कहते हैं। गांव फिर से आबाद हो गया। मुहम्मद कुतब शाह उसी पुल से होकर अपनी प्रेमिका भागमती से नित्य मिलने जाता। दिन व्यतीत होते गए। फिर...।“ बाजी राव सांस लेने के लिए चुप हो गया।
मस्तानी बहुत उत्सुक हो गई, “फिर क्या हुआ ?“

बाजी राव अपनी बात को आगे बढ़ाता है, “फिर प्लेग की बीमारी फैल गई। इस महामारी से भागमती के गांव के सभी लोग मरने लग पड़े। मुहम्मद कुतब शाह भागमती को गोलकुंडा अपने पास ले गया और बाद में कुतब शाह ने भागमती के नाम पर मूसी नदी के तट पर भागनगर नाम का नया शहर बसा दिया। पिता के बाद राजगद्दी पर बैठने के बाद मुहम्मद कुतब शाह ने भागमती का धर्म परिवर्तन करवाकर उसके साथ विवाह करवा लिया और उसका नाम हैदर महल रख दिया। कुतब शाह ने अपने एक पुत्र का नाम हैदर शाह (शेर बहादुर) रखा। हैदर शाह ने भागमती नगर का विस्तार करके इसको बागों, उपवनों से सजा दिया। इस शहर का नाम लोग भागनगर से बागनगर अर्थात बागों का नगर प्रचारित करने लग पड़े। मुहम्मद कुतब शाह ने इसलिए इसका नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया था यानी हैदर के लिए आबाद किया गया शहर ताकि उसकी पत्नी के नाम से यह शहर जुड़ा रहे।“

“क्या मेरे नाम पर आप भी कभी किसी जगह का नाम रखोगे ?“ अकस्मात मस्तानी प्रश्न कर देती है।

“हाँ, तेरे लिए हम भी कुछ ऐसा बनाएँगे जिसको दुनिया देखती रह जाएगी। पर समय आने पर ही तुम्हें बताएँगे मेरी जान।“ बाजी राव मुस्कराकर मस्तानी की ओर देखता है और वह अपनी मंजि़ल की ओर बढ़ने लग जाते हैं।

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