सोलह कला और सोलह शिंगार
नाना साहिब के विवाह के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। बाजी राव और मस्तानी कभी कभार कोथरूड़ से ससवाद भी आने लग जाते हैं। रफ्ता रफ्ता मस्तानी बाजी राव के परिवार में फिर से घुलने मिलने लग जाती है। दोनों ननदें और नाना साहिब की पत्नी गोपिका बाई के साथ मस्तानी की बहुत बनने लग जाती है। तीनों ही सहेलियों की भाँति सारा दिन घर और बागों में खेलतीं, हँसी-मजाक करतीं, झूले झूलतीं रहती हैं। इसके अलावा महिलाओं वाले काम जैसे सिलाई, कढ़ाई, खाना पकाना और अन्य घरेलू कामों में भी मस्तानी उनका हाथ बंटाती रहती है। फुर्सत के समय सभी लड़कियों को एकत्र करके मस्तानी गीत गाकर सुनाती है या नृत्य करके उनका मनोरंजन भी कर देती है।
एक दिन गोपिका बाई मस्तानी को नृत्य करते देखकर पूछ लेती है, “ताई साहिबा(बड़ी बहन), आप हर काम जानते हो। जैसे मेंहदी लगाना, शर्बत और शराब बनाना, पगड़ी बांधना, खाना पकाना, सिलाई, कढ़ाई, शस्त्र चलाना, घुड़सवारी और तैराकी वैगरह। आप यूँ सोलह कला सम्पूर्ण कैसे बन गए ?“
मस्तानी आ रही खांसी को रोककर बोलती है, “नहीं, छुटकी बहिन, यह सारे काम तो सब स्त्रियों को आने चाहिएं और बहुत सी स्त्रियाँ जानती भी हैं। इसको सोलह कला सम्पूर्ण नहीं कहते। दरअसल कोई भी इन्सान सोलह कला सम्पूर्ण नहीं हो सकता। क्योंकि यदि सोलह कला सम्पूर्ण हो गया, वह तो भगवान बन जाता है। भगवान राम भी सोलह कला सम्पूर्ण नहीं थे। उनमें भी केवल चैदह कलायें थीं और वह अंश अवतार माने जाते हैं। आखि़री के दो अर्थात पंद्रहवीं और सोलहवीं कला स्वरूपावासतिष्ट भाव सम्पूर्ण ज्ञान और असली रूप छिपाकर भेष बदलना, बहिरूप होना हुआ करती हैं। ये दो भगवान राम ने मातलोक में अवतार धारण करते समय छोड़ दी थीं ताकि रावण को शिवजी द्वारा दिया वरदान कि भगवान उसको मारेगा, पूरा हो सके। भगवान विष्णु ने राम बनकर इन्सानी जामा धारण किया और दो कलायें जानबूझ कर त्यागकर रखी थीं, रावण को मारने के लिए। हाँ, भगवान कृष्ण सोलह कलाओं में सम्पूर्ण थे। वह जीव और ब्रह्म दोनों रूपों में विचरते थे। वह दार्शनिक भी थे, छलिया भी, कपटी, राजनीतिज्ञ, प्रेमी, संगीतकार, योद्धा, चोर, धार्मिक, तपस्वी आदि सब कलायें उनके अंदर थीं। एक आदमी में इतने गुण होना संभव नहीं हैं।“
“वाहिनी साहिबा, ये कलायें क्या होती हैं ?“ भिहू बाई प्रश्न करती है।
“वणसा (ननद), कलायें आध्यात्मिक और रूपक स्तर पर होती हैं। इन्सान के प्रगट होने वाले गुणों को कलायें कहा जाता है। वह कहा करते हैं न कि ‘बारह कला सूरज और सोलह कला चन्द्रमा’। इसका तात्पर्य है कि सूरज की बारह और चन्द्रमा की सोलह कलायें होती हैं। सूरज की बारह कलाओं के नाम हैं - तपनी, तपानी, धरूमा, मारछी, ज्वालिनी, रूची, सूक्ष्मना, भोगदा, विश्वा, बोधनी, धारणी और क्षमा। इस तरह इन कलाओं के दौरान सूरज का प्रताप और प्रकोप बढ़ता घटता रहता है। इसी प्रकार चन्द्रमा के सोलह दिनों में आकर परिवर्तन को सोलह कलाओं का नाम दिया गया है। प्रकाश पक्ष से चन्द्रमा हर रोज़ पन्द्रह दिनों तक थोड़ा थोड़ा बढ़ता रहता है और नित्य नई कला चाँद की हमें देखने को मिलती है। चन्द्रमा सोलहवें दिन जाकर पूरा हो जाता है। उस सम्पूर्ण चन्द्रमा वाले दिन पूर्णमासी होती है। पूर्णमासी के बाद चन्द्रमा फिर नित्य एक एक दजऱ्ा अमावस तक घटता चला जाता है। चन्द्रमा की सोलह कलायें अमृता, मानदा, पुष्पा, पुष्टी, तुष्टी, धृति, शाषनी, राशनी (रति), चंद्रिका, कांति, ज्योतस्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णता और पूर्णामृता हैं। ब्रह्मवैवरत पुराण में ईश्वर के अवतारों के सोलह गुण दजऱ् हैं। वे सोलह कलायें अर्थात सोलह शक्तियाँ हैं - अनन्य माया, प्राणायाम माया, मनोमाया, विज्ञान्य माया, आनन्दय माया, आतिशयानी माया, विपर्यानविमी, संकरामनी, प्रभावी, कुंठीनी, विकासनी, मर्यादनी, सनहालायदीनी, अलादीनी, प्रीपूर्णन्य, स्वरूप अवस्थी।“
अनु बाई अपनी बेसमझी का प्रकटीकरण करती है, “क्यों भटका रहे हो। सरल सा करके बताओ, इनका क्या अर्थ होता है ?“
मस्तानी अपनी ओढ़नी का पल्ला संभाल कर विद्वता झाड़ने लग पड़ती है, “ज्ञान, ध्यान, शुभ कर्म, हठ, संयम, धर्म, दान। वि़द्या, भजन, सुप्रेम, जत, अध्यात्म, सतनाम। दया, नेम और चतुरता, बुध सुध यह जान। सरल भाषा में ज्ञान हासिल करना, ध्यान लगाने के लिए समाधि अवस्था में जाना, शुभ और नेक कर्म करना, आवश्यकता पड़ने पर डट कर खड़े होना अर्थात हठ करना और अपनी जि़द प्रकट करना, मितव्यय और संयम को कायम रखकर जीवन में संतुलन पैदा करना, धर्म के मार्ग पर चलना, दान और पुण्य के कार्य करना, आवश्यक विद्या प्राप्त करना, प्रभु का सिमरन अर्थात तप करना, जीव जन्तुओं से प्रेम करना, जत कायम रखना और पराई स्त्री या पुरुष के साथ संबंध न बनाना, अध्यात्म भावना को जीवित रखना और सच पर पहरा देना। ब्रह्मवैवरत पुराण में दिए कलाओं के क्रम के अनुसार इनमें से पहले पाँच गुण तो मनुष्य में होते हैं और अगले तीन अभ्यास से ग्रहण किए जा सकते हैं। परंतु नौवें गुण प्रभावी को प्राप्त करने वाला मनुष्य ब्रह्म में लीन हो जाता है। समस्त सोलह गुण सम्पूर्ण व्यक्ति फिर इन्सान नहीं रता। बल्कि ईश्वर का अवतार बन जाता है। हमारे शास्त्र बताते हैं कि ब्रह्मा ने इन्सान का शरीर पृथ्वी, आकाश, हवा, आग और पानी - इन पाँच तत्वों से बनाया है और ये पाँच तत्व भगवान शब्द में हैं। जैसे भगवान का ‘भ’ भूमि का सूचक है, ‘ग’ गगन का, ‘व’ वायु का, ‘आ’ यानी अग्नि का और ‘न’ नीर का। सब इन्सान भगवान ने पाँच तत्वों से बनाये हैं। जिस मनुष्य में जितनी अधिक कलायें हों, उसको उतना उŸाम और सर्वोŸाम माना जाता है।“
“हूँ... वाह ! शस्त्र और शास्त्र विद्या तो आपने फिर पहले ही सीख ली थी। आपको यह कहाँ पता था कि आपको पंडितों की बहू बनना है ?“ राधा बाई मंद मंद मुस्कराती है।
“नहीं माता श्री, इतना तो हर चेतन व्यक्ति को धर्म के बारे में ज्ञान होना ही चाहिए। स्व रक्षा के लिए शस्त्र विद्या भी प्रत्येक प्राणी को सीखनी चाहिए।“
गोपिका बाई फिर मस्तानी का ध्यान आकर्षित करने के लिए छेड़ती है, “मस्तानी ताई, शस्त्र विद्या तो चलो स्व रक्षा के लिए आपने सीखी। पर आपने नृत्यकला और गायन क्यों सीखा ? इसकी क्या आवश्यकता थी ? यह तो नर्तकों के काम होते हैं।“
धैर्यवान मस्तानी बड़े प्रेमपूर्वक समझाती है, “नहीं, विदेशी लोगों की कथा के अनुसार एकबार पुरुष और नारी का एक सुंदर सरोवर में मिलन हुआ। दोनों एक दूसरे के करीब आने के लिए तैरते हुए आगे बढ़ने लगे। दोनों ने अनुभव किया कि पानी में हाथ पैर मारने से कुछ मधुर सुर उपज रहे हैं। उन्हें प्रेम तरंगे छिड़ती महसूस हुईं। इसके साथ उन्हें एक आंतरिक प्रेरणा मिली, उनके अंदर एक दूसरे में समा जाने के भाव उत्पन्न हुए। दोनों आपस में घुलमिल गए और उन्होंने जल स्वरों का पूर्ण आनंद प्राप्त किया। इस प्रकार नृत्य परम्परा की नींव पड़ी। औरत मर्द का संभोग करना भी तो एक नृत्य ही है।... हवा के साथ दरख़्तों के पŸाों टहनियों का हिलना भी एक नृत्य ही है। हमारा सांस लेना भी हमारे धड़कते दिल का नृत्य है। बादशाह अकबर कहा करता था कि आदमी का दिल बहलाने के सब काम औरत को आने चाहिएँ। यदि औरत सज संवर कर रहे और पति का नृत्य, गायन के साथ चिŸा लगाये रखे तो उसका मर्द कभी किसी दूसरी औरत की ओर आकर्षित नहीं होता है।“
गोपिका बाई अपने और नाना साहिब के ताज़ा अनमने और डावांडोल संबंधों के बारे में सोचती हुई बोलती है, “अच्छा ? यह बात है तो आप मुझे सोलह शिंगार करना और नृत्य गायन अवश्य सिखाओ।“
“क्यों ? क्या नाना साहिब को तुम्हारा नाट्यशाला जाना अच्छा नहीं लगता ?“ मस्तानी गोपिका बाई की दुखती रंग पर हाथ रख देती है।
गोपिका बाई गंभीर और उदास हो जाती है। मस्तानी उसके बिना कुछ कहे ही सब कुछ गोपिका के चेहरे पर से पढ़ लेती है, “ठीक है, मैं तुम्हें पहनने, सजने की ढंग, रूप सज्जा, वेशभूषा का सलीका, नृत्य और गायन कला सिखाऊँगी। स्त्री को सदा संतनी ही नहीं बने रहना चाहिए और काम भावनाओं में ग्रस्त होकर अपने नायक पति के पास खुद चली जाना चाहिए। उसको क्रीड़ा के लिए उकसाना चाहिए। गोपिका जब तुम इन कलाओं में निपुण हो गई, देखना तेरे नवरे (पति) की क्या मजाल है कि वह कंचनियों, नायिकाओं, गणिकाओं और अभिनेत्रियों के पास चला जाए।“
“सच ?“ गोपिका बाई की आँखों में एकदम चमक उभर आती है।
“पढ़े लिखे को फारसी क्या और हाथ कंगन को आरसी क्या ! खुद ही अनुभव करके देख लेना। यदि मेरा कहा गलत हुआ तो मुझे मस्तानी न कहना। गोपिका बहिन, मैं तुझे सोलह शिंगार करने सिखाऊँगी। देख, सोलह शिंगार रूप को सजाने के लिए किए जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं। पहली प्रकार के शिंगार प्राकृतिक होते हैं जिनके साथ प्रभु ने हर स्त्री को स्वयं शिंगारित किया है। जैसे कहा करते हैं न कि ‘त्रै काले, दो उजले, पतले पंज प्रकार। चार पुष्ट, दो कठन हैं, ये सोलह शिंगार।’ सिर के केश, आँखों की पलकें और स्तनों के चूचक, इन्हें त्रैकाल कहा जाता है। दो उजले नाखून और दंत। पाँच पतले का अर्थ है - होंठ, नाक, गर्दन, कमर और उंगलियाँ। चार पुष्ट से भाव है - दो बांहांे की भुजाएँ और दो टांगों की जांघें। दो कठन योनि के दोनों अधर है या योनि और नितम्ब। पर कुछ ग्रंथों में दो कठन छाती पर स्तनों की स्थिति को माना गया है। इसके बिना शेष सोलह शिंगार बनावटी होते हैं, जो हर स्त्री अपने प्रिय पुरुष को भरमाने के लिए कर सकती है। इनसे दूसरी किस्म के शिंगारों के साथ शरीर के सोलह अंगों को सुंदर बनाने का यत्न किया जाता है। अर्थात शरीर पर वटना मलना, स्वच्छ जल में स्नान करना, सुंदर वस्त्र धारण करना, मांग में सिंदूर भरना, बालों को संवारना, माथे पर बिंदी लगाना, मुँह पर तिल का निशान बनाना, शरीर पर सुगंधित पदार्थ लगाना, पान खाना, गले में हार पहनना, महावर रचाना और केशों में फूल टांकना। ये पुरुष को रिझाने के लिए स्त्री के लिए करने आवश्यक समझे जाते हैं। ये शिंगार शरीर की शोभा बढ़ाते हैं। रसिक प्रिया में लिखा है, ‘प्रथम सकल सुचि मजन अमलवास। जावक सुदेस केस पाश को सुधारबो। अमगरास भूषण विविध मुखवास रंग। कजल कलित लोल लोचन निहारबो। बोलन हसन मृदलोचन चितौन चार। पल पल पतिव्रत प्रीति प्रतिपारबो। केशोदास सविलास करहो कुवरि राधे। इह विधि सोरहि शिंगारन सिंगारबो।“
“आपको क्या लगता है कि यदि मैं भी ये सोलह शिंगार करूँ तो यह (नाना साहिब) बाहर मुँह मारने से हट जाएँगे ?“ गोपिका बाई शंका निवृति के लिए पूछती है।
“लो, और नहीं तो क्या ? उसका तो बाप भी हट जाएगा।“ मस्तानी गोपिका बाई की जांघ पर हाथ रखकर उसको आँख मारती हुई हँस पड़ती है।
“यह बात है तो मुझे अभी से नृत्य सिखाना प्रारंभ कर दो ताकि मैं भी आपकी तरह अपने नवरे (पति) को अपनी उंगलियों पर नचा सकूँ और वह ज़ोरू का गुलाम बनकर रह जाए।“
मस्तानी बड़े प्रेमपूर्वक समझाती है, “इतना सरल काम नहीं है यह। नृत्य के लिए अभ्यास की अत्यंत आवश्यकता है और जीवन को समर्पित करना पड़ता है। मेरे उस्तादों ने छडि़याँ मार मारकर मुझे सिखाया था और घंटों मैं पताशों पर नाचा करती थी। जब तक सारे पताशे चूर चूर नहीं हो जाते थे, मैं हटती नहीं थी। यूँ ही तो नहीं लोग मेरी मोरों जैसी चाल देखकर कहते हैं कि मस्तानी पताशे चूरा करती जाती है।“
“मुझे भी फिर चाल से पताशे चूरा करना सिखाओ ताई साहिबा।“
“हाँ हाँ! पताशे क्या, मैं तो ठरक पीसना भी सिखा दूँगी। मैं तुझे ठोकपीट कर हर कला में निपुण बना दूँगी। संस्कृत में रचे ऋषि वात्सयान और कोका पंडित के कोक शास्त्र का ज्ञान भी तुझे दूँगी। काम सुख एक अद्भुत आनंद का अनुभव है, जिसमें शरीर की पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (त्वचा, कान, आँख, जीभ और नाक) एकसुर हो जाती हैं। संभोग तन और मन की तृप्ति का सबसे बड़ा साधन है। संभोग सुख को दुगना करने की विधि भी तुझे सिखाऊँगी। कैसे नाखूनों से नोच-खरोंच प्रेम करते समय की जाती है। दाँतों से हल्के हल्के काटना(Love bites)... अश्लील वार्तालाप( Lusty conversation)... कामुक सिसकियाँ(Moaning & Groaning)...हस्तमैथुन(Masturbation)... हवशमयी होकर चाटना और नोंचना(Snoging, Licking, Kissing, Biting)...मौखिक काम (Oral Sex ), विलाशी स्पर्श(Tender Touch)... बाहों और टांगों में जकड़ना... आदि के सारे गुर तुझे दूँगी। औरत और मर्द भगवान द्वारा बनाई गई वो श्रेष्ठ कला रचना है जो जब आलिंगनबद्ध होकर एक दूसरे में समा जाते हैं तो यह मूर्ति सम्पूर्ण होती है। स्त्री और पुरुष की देहों की बनावट और काम अंगों की रचना प्रभु ने की ही इसीलिए हैं। इसलिए लज्जा और संकोच त्याग कर संभोग का मदहोश होकर जी भरकर आनंद लेना चाहिए। नाना साहिब के ऊपर लेटकर कभी क्रीड़ा की है ?“
“नहीं। कभी नहीं। मुझे तो बहुत अधिक लज्जा आती है। मैं तो चेहरे पर ओढ़नी लेकर आँखें मींचकर पड़ी रहती हूँ।“
“बस, यही तो तू गलती कर जाती है। पागल लड़की, जब नाचने लग पड़े, फिर घूँघट कैसा। अपितु निसंगता से साथ दे अपने पति के संभोग में।“
“ऊँ...! मैं नहीं, मुझे तो लज्जा आती है।“
“जिसने की शरम, उसके फूटे करम।“
उस दिन से गोपिका, मस्तानी से नृत्य और गायकी की शिक्षा लेने लग जाती है और इस प्रकार उनके मध्य बहुत अधिक निकटता और सखीपना उत्पन्न हो जाता है। उनके बीच गुरू और शिष्या का रिश्ता बन जाता है।
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