Tuesday, 3 November 2015
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अनुक्रम
अध्याय 1: बुंदेलखंड का किलाअध्याय 2: बिल्लौरी आँखें
अध्याय 3: मुजरा
अध्याय 4: काम और मुहब्बत
अध्याय 5: प्रस्ताव
अध्याय 6: कूच, पड़ाव और काम
अध्याय 7: अतीत का साया
अध्याय 8: सुहाग सेज
अध्याय 9: गृह प्रवेश
अध्याय 10: फैसला
अध्याय 11: सोलह कला और सोलह शिंगार
अध्याय 12: अंगूठी
अध्याय 13: झड़प
अध्याय 14: हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुल्क
अध्याय 15: शाही कल्लोल
अध्याय 16: संग्राम
अध्याय 17: कचेहरी
अध्याय 18: शनिवार वाड़ा
अध्याय 19: प्रेम पौधा
अध्याय 20: जंगनामा
अध्याय 21: कशमकश
अध्याय 22: छत्रपति का दरबार
अध्याय 23: तिल तिल मौत
अध्याय 24: अशुभ समाचार
अध्याय 25: पैगाम
अध्याय 26: दफ़न राज़
अंतिका
अध्याय-1
बुंदेलखंड का किला
विशेष नोट: इस उपन्यास की मांग के अनुसार मैंने ऐतिहासिक घटनाओं की देसी तारीखों (संवत सन) का उल्लेख करने की अपेक्षा अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी ईसवी का प्रयोग किया है। कुछ स्थानों पर मेरे पात्र भी वही प्रयोग करते हैं। इसको तकनीकी दोष न माना जाए। ऐसा मैंने देसी तारीखें उपलब्ध न होने के कारण और ऐतिहासिक ब्योरों के काल को सही दर्शाने के लिए किया है। जिसको आवश्यकता हो, वह स्वयं इन तारीखों से देसी तारीखों का अनुमान लगा सकता है। - उपन्यासकार।
बुंदेलखंड मध्य भारत में कमल के फूलों से लबालब भरी और कोसों दूर तक फैली बेलाताल झील के किनारे स्थिति राजपूतों का रियासती गढ़ है, जैतपुर (वर्तमान समय में ज़िला लक्ष्शीसराय, बिहार) ऋषि जयंत के नाम पर बसे जैतपुर के ऐन बीच पहाड़ी पर बना शाही किला दूर से ही नज़र आ जाता है। यह किला बुंदेल राजपूतों की आन, आबरू, बहादुरी, शक्ति और बलिदान का गवाह है। इस ऐतिहासिक किले ने बहुत सारा इतिहास अपनी कोख में संभालकर रखा हुआ है।
अध्याय-2
बिल्लौरी आँखें
जंग जीतने के उपरांत पेशवा बाजी राव, महाराजा छत्रशाल की सेना के साथ जैतपुर के किले में प्रवेश करता है। महाराज छत्रसाल आरती उतारने के पश्चात बाजी राव का केसर, चंदन और चावलों के साथ विजय तिलक लगाकर स्वागत करता है, “पेशवा जी, विजय मुबारक हो।...मैं किस मुँह से आपका धन्यवाद करूँ। मेरे पास तो आपका आभार प्रकट करने के लिए भी शब्द नहीं हैं।... यदि आप सही समय पर न पहुँचते तो हम सब मारे जाते या कै़द कर लिए जाते। मैं आपका यह अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा।“
अध्याय-3
मुजरा
संध्या समय पेशवा बाजी राव और उसके सरदारों के लिए महाराजा छत्रसाल द्वारा भोजन की विशेष दावत दी जाती है। भोजन के पूर्व मनोरंजन के लिए नृत्य-गान होता है। शराब और अनेक प्रकार के शर्बत वितरित किए जाते हैं। दारू पीता हुआ बाजी राव काफ़ी मदहोश हो जाता है। महाराजा छत्रसाल बाजी राव की खूब खातिरदारी करता है। पेशवा बाजी राव के लिए विशेष रूप से विभिन्न प्रकार के पकवान बनवाये जाते हैं।
अध्याय-4
काम और मुहब्बत
बारिश हो, आँधी हो, बाजी राव सदैव शुरू से ही तड़के जल्दी उठकर बिना नागा कसरत और युद्ध अभ्यास करने का अभ्यस्त रहा है। लेकिन मुजरे से अगली सवेर उसका कुछ भी करने को मन नहीं करता। न उसको भूख लगती है और न ही प्यास। स्नान करने के बाद तैयार होते हुए उससे तो अपने गले में मराठों के प्रतीक चिह्न वाली मोतियों की मालायें भी ठीक से सब की सब पहनी नहीं जातीं। यहाँ तक कि बाजी राव को पूरे वस्त्र पहनने की भी होश नहीं रहती। वह केवल कमर पर लांगड़वाली लुंगी बांधकर मुँह फाड़े एकटक देखता हुआ मस्तानी के बारे में सोचता गुमसुम, चुप्पा बनकर स्थिर बैठा रहता है। मस्तानी के ख़यालों में खोये हुए को न अपने आसपास की होश होती है और न ही वह किसी के साथ कोई बातचीत करता है।
अध्याय-5
प्रस्ताव
तीसरे दिन दोपहर को महाराजा छत्रसाल से बाजी राव के लिए बुलावा आ जाता है। संयोगवश उस दिन गणेश चतुर्थी होती है। महराजा छत्रसाल ने अपने दरबार में एक विशेष समारोह का आयोजन कर रखा होता है। पेशवा बाजी राव के खादिम, उसके सिर पर शाही कलगी जड़ा सुनहरी और सफ़ेद फेटा (मराठों की पेशवाई पगड़ी) सजा देते हैं। हीरे-मातियों की मालायें और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहनकर बाजी राव अपने सरदारों और अहलकारों के साथ महाराजा छत्रसाल के दरबार में चला जाता है।
अध्याय-6
कूच, पड़ाव और काम
बुंदेलखंड से कूच करके सबसे आगे बाजी राव अपने घोड़े पर जा रहा होता है और उसके पीछे हाथी पर पालकी में मस्तानी जा रही होती है। मस्तानी को जब भी अवसर मिलता है, वह पर्दा हटाकर बाजी राव को देखती हुई अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने लग जाती है। मस्तानी की अल्हड़ अवस्था से ही यह इच्छा रही थी कि उसका जीवनसाथी कोई महान योद्धा हो। पर बाजी राव जैसे चोटी के सूरमे के जीवन में प्रवेश करने के बारे में तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। बाजी राव को देखकर मस्तानी की भूख उतर जाती है। पालकी में सवार मस्तानी के रोम रोम में शरारती गुदगुदी होने लगती है। वह पर्दे की जाली में से बाजी राव को टकटकी लगाकर निहारती हुई मुस्कारने लग पड़ती है।
अध्याय-7
अतीत का साया
बाजी राव की तरफ से पूणे के अपने महल में लश्कर के पहुँचने का पैगाम भेज दिया जाता है। इस संदेश में बाजी राव की ओर से गोलमोल ढंग से मस्तानी की मौजूदगी को लेकर इशारा तो किया जाता है, पर खुलकर मस्तानी के साथ हुए उसके विवाह के संदर्भ में कोई खुलासा या वर्णन नहीं किया जाता।
अध्याय-8
सुहाग सेज
अगली सुबह बाजी राव नदी में स्नान करके मस्तानी के साथ करीब के मंदिर में जाता है और पूजा करने के पश्चात वहीं मस्तानी की मांग में सिंदूर भर देता है। उसके उपरांत बाजी राव मस्तानी को अपने तम्बू में लौट जाने के लिए कहकर लश्कर का निरीक्षण करने चला जाता है।
अध्याय-9
गृह प्रवेश
ज्योतिषियों द्वारा घोषित की गई शुभ घड़ी में बाजी राव अपने लश्कर सहित पूणे में प्रवेश होकर ससवाद अपने गृह स्थान में पहुँच जाता है। महल के प्रांगण में बाजी राव के घोड़े, पीछे हाथी पर आ रही मस्तानी की पालकी का उतारा होता है। बेहद कीमती हीरे, जवाहरात, गहने और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहने जब मस्तानी पालकी में से बाहर निकलती है तो ऐसा लगता है मानो अँधेरे में किसी ने लाखों करोड़ों चहुंमुखी दीये जला दिए हों। एकबार तो सारे पूना के मराठा साँस रोककर मस्तानी के हुस्न को एकटक देखते रह जाते हैं।
अध्याय-10
फैसला
बाजी राव और मस्तानी को यह विवाहित जीवन की खुशियाँ अधिक देर नसीब नहीं होतीं। बाजी राव के बेटे नाना साहिब की पूर्व में तय की गई शादी निकट आ जाती है।
विवाह की तैयारियों में समस्त परिवार का व्यवहार मस्तानी के साथ यकायक बदल जाता है। काशी बाई का व्यवहार तो पहले दिन से ही मस्तानी के प्रति ईष्र्यालू और झगड़ालू ही रहा होता है। काशी बाई अपने पुत्र नाना साहिब को भड़का कर बाजी राव के साथ लड़वा देती है।
अध्याय-11
सोलह कला और सोलह शिंगार
नाना साहिब के विवाह के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। बाजी राव और मस्तानी कभी कभार कोथरूड़ से ससवाद भी आने लग जाते हैं। रफ्ता रफ्ता मस्तानी बाजी राव के परिवार में फिर से घुलने मिलने लग जाती है। दोनों ननदें और नाना साहिब की पत्नी गोपिका बाई के साथ मस्तानी की बहुत बनने लग जाती है। तीनों ही सहेलियों की भाँति सारा दिन घर और बागों में खेलतीं, हँसी-मजाक करतीं, झूले झूलतीं रहती हैं। इसके अलावा महिलाओं वाले काम जैसे सिलाई, कढ़ाई, खाना पकाना और अन्य घरेलू कामों में भी मस्तानी उनका हाथ बंटाती रहती है। फुर्सत के समय सभी लड़कियों को एकत्र करके मस्तानी गीत गाकर सुनाती है या नृत्य करके उनका मनोरंजन भी कर देती है।
Monday, 2 November 2015
अध्याय-12
अंगूठी
मस्तानी आए दिन नये वस्त्र, नये गहने पहने होती है। हर बार जब वह ससवाद आती तो सिर से पैरों तक का हार-शिंगार और वस्त्र उसके सदैव बदले हुए होते हैं। यदि कुछ नहीं बदलता तो मस्तानी के बायें हाथ की तर्जनी में पहनी हीरे की अंगूठी कभी नहीं बदलती। हर बार वही अंगूठी देखकर एक दिन मस्तानी की ननद भिहू बाई पूछ लेती है, “वाहिनी साहिबा (भाभी), आपके बाकी तो सब जेवर नित्य बदले हुए होते हैं परंतु आप कभी यह अंगूठी नहीं उतारते।“
अध्याय-13
झड़प
मस्तानी को बाजी राव के जीवन में आए दो वर्ष का समय बीत चुका होता है। 1730 ई. के मध्य में बाजी राव अहमदाबाद की जंग में उलझा होने के कारण मुगलों के साथ भिड़ने के लिए चला जाता है और पीछे मस्तानी अकेली रह जाती है। दिन रात वह बाजी राव की यादों में खोई रहती है।
अध्याय-14
हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुलक
हैदराबाद के इर्द गिर्द वाले क्षेत्र में गोलकुंडा (Shephered’s Hill) पर 624 ई. से 1075 ई. तक चालुक्या वंशियों ने राज किया था। 1158 ईसवी के बाद कल्याण के चालुक्या का साम्राज्य टूटकर बिखर गया। उनके एक भाग में से वारंगल के काकतिया शासक हुए थे। दूसरे भाग में से द्वारसमुंदर के होएसल, तीसरे देवगिरी के यादव। फिर 1190 ई. से 1310 ई0 तक काकतिया वंश, वारांगल (वर्तमान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से 148 किलोमीटर उŸार-पूर्व की ओर) से सिंहासन पर बैठकर राज करते रहे। काकतिया को अपना राज्य कायम रखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था।
अध्याय-15
शाही कल्लोल
मस्तानी और बाजी राव का प्रेम नीलगगन की उड़ानें भरने लग जाता है।... छोटी-बड़ी जंगें होती रहती हैं। मस्तानी बाजी राव के साथ साधारण सैनिकों की तरह युद्ध में शामिल होती रहती है। देखते ही देखते, मस्तानी मराठा इतिहास के पृष्ठों पर बादल की भाँति छा जाती है। बाजी राव और मस्तानी का इश्क किसी के मुँह से नगमा बनकर गूंजता है और किसी के अधरों पर चुगली बनकर नाचता है। किंतु दिन आनंदपूर्वक व्यतीत होते रहते हैं।
अध्याय-16
संग्राम
चिमाजी अप्पा अपने मन-मस्तिष्क में मस्तानी के विरुद्ध एक गुप्त जंग का बिगुल बजा देता है और मस्तानी को तंग करने के लिए राजनीतिक चालंे चलनी प्रारंभ कर देता है। सर्वप्रथम वह मस्तानी के विरुद्ध पाँचवे छत्रपति महाराजा शाह के पास जाकर उनके कान भरने का प्रयत्न करता है, “देखो महाराज, हमारे योद्धे को क्या हो गया है ? बस एक मामूली सी नर्तकी ने उसको अपनी उंगलियों के इशारों पर नचा रखा है। यदि हमने अवसर को न संभाला तो हमारा मराठों का भविष्य बहुत धुंधला हो जाएगा।“
अध्याय-17
कचेहरी
काशी बाई के पास चंद दिन रहकर उसको शारीरिक संबंधों से संतुष्ट करने के बाद बाजी राव मस्तानी के पास चला जाता है। मस्तानी के साथ कुछ रातें व्यतीत करने के पश्चात वह काशी के पास अपनी उपस्थिति दजऱ् करवाने आ जाता। इस प्रकार, कुछ अरसे बाद बाजी राव ससवाद में आकर काशी को शांत करके पुनः मस्तानी के पास रहने के लिए कोथरूड़ चला जाता। बाजी राव के जीवन के दिन और रातें काशी और मस्तानी के बीच बंटने लग जाती हैं। वह किश्ती की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे सफ़र करता हुआ अपने परिवार और मस्तानी के साथ अपना रिश्ता निभाते हुत अपने जीवन में संतुलन बनाये रखने का यत्न करता रहता है।
अध्याय-18
शनिवार वाड़ा
बाजी राव और मस्तानी का प्रेम कोथरूड़ बाग (पूणे का एक इलाका) के एकांतमयी वातावरण में पलने लग पड़ता है। बाजी राव दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासी मंे डूबा रहने लगता है। दिन भर मस्तानी, बाजी राव के साथ घुड़सवारी और युद्ध अभ्यास करती रहती है। कभी कभी तो बाजी राव के संग शनिवार वाड़ा में शिकार खेलने भी चली जाती है। संध्या समय वह बाजी राव के बराबर बैठकर मदिरापान करती, नृत्य दिखलाती और अपनी सुरीली आवाज़ में गीत-ग़ज़लें भी सुनाती है। मस्तानी बड़ी निपुणता से अनेक साज बजाना जानती है। शाइरी करने के शौक के कारण मस्तानी ने पढ़ना-लिखना भी सीखा हुआ है। वह अनेक भाषाओं का ज्ञान रखती है। रात्रि में नृत्य करते हुए मस्तानी को बाजी राव अपनी बाहों में उठाकर उसके होंठों से अपने होंठ जब जोड़ लेता है तो यूँ लगता है मानो कृष्ण बंसरी बजा रहे हों। मस्तानी भी बाजी राव के साथ इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाती है जैसे चंदन के वृक्ष से नाग लिपटा होता है।
Sunday, 1 November 2015
अध्याय-19
प्रेम पौधा
मुगल बादशाह को जब सरबुलंद खान द्वारा 1730 ई. में बाजी राव के साथ चैथ और सरदेशमुखी को लेकर की गई संधि के बारे में पता चला तो उसको यह फैसला पसंद नहीं आया। बादशाह ने सरबुलंद खान को पद से हटाकर जोधपुर के अजीत सिंह के पुत्र अभय सिंह को जिम्मेदारी सौंप दी। परंतु अभय सिंह को भी बाजी राव के साथ समझौता करना पड़ा, क्योंकि वह अकेला बहुत सारे खुदमुख्तारों के साथ नहीं निपट सकता था। ये समझौते मराठा सेनापति तिंबर्क दाबड़े को स्वीकार नहीं थे। वह गुजरात के सब मामलों को वसूलने का अपना हक़ समझता था। वह पहले से ही पेशवा के साथ खार खाता था। उसका कारण यह था कि छत्रपति के बाद दूसरा बड़ा पद पेशवा का होने के कारण वह बाजी राव के साथ उसकी योग्यता के कारण घृणा करता था। दूसरी ओर पेशवा पुराने लोगों की अपेक्षा होलकर, शिंदे और पवार जैसे नौजवानों को पदों पर आसीन करके प्रसन्न होता था।
Saturday, 31 October 2015
अध्याय-20
जंगनामा
1735 ई. तक मराठों ने समस्त गुजरात और मालवा क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया। परंतु कुछ स्थानों पर मुगल ओहदेदारों और जमींदारों ने मराठों का शासन स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। मुगल बादशाह मुहम्मद शाह भी चैथ और सरदेशमुख की सनद मराठों के हवाले करने से कतराता था। बाजी राव ने बादशाह को मिलने के अनेक संदेशे भेजे। पर कोई सफलता प्राप्त न हो सकी। मराठों ने अपनी शक्ति दिखाने के लिए मुगलों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले राजपूताने (राजस्थान) में लूटमार शुरू कर दी।
Friday, 30 October 2015
अध्याय-21
कशमकश
बाजी राव का मस्तानी को लेकर कई दिनों से अपने परिवार के साथ बहुत विवाद, बहस और झगड़ा हो रहा होता है। मस्तानी की हीरे मोती जड़ी, सोने और चांदी के गोटे वाली पट, जरी की साडि़यों पर आ रहे खर्च और महाराजा छत्रसाल के देहांत के उपरांत बुंदेलखंड से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता बंद हो जाने के कारण काफ़ी तनाव उत्पन्न हो जाता है।
बाजी राव ने सफाई देते हुए बहुत कहा है कि हुक्के, इत्रों और फुव्वारों पर भी तो खर्च आता है ? शान बढ़ाने के लिए कई बार इस प्रकार धन खर्च करना ही पड़ता है। लेकिन आज तो बात कुछ अधिक ही बढ़ गई और मामला छत्रपति शाहू के दरबार तक पहुँच जाता है। शाहू ने बाजी राव को बुलाया है। बाजी राव इसी कारण दिन भर परेशान रहा है।
रात का पिछला पहर है। बाजी राव सोच-विचार के चक्रव्यूह में उलझा हुआ है। लगभग सारी रात ही उसने बेचैनी में बिताई है। मानसिक परेशानियों में मस्तानी भी उसकी बांह का सिरहाना बनाये उसके संग लेटी हुई आने वाले कल की चिंता में करवटें बदल रही है।
लेटी हुई मस्तानी तिरछी नज़र से बाजी राव की ओर देखती है, “क्या बात है स्वामी, आज नींद नहीं आ रही ?“
“नहीं। तुम भी कहाँ सोई हो।“ बाजी राव आँखें मूंद लेता है।
“ऐसे नाजुक समय में नींद भी कैसे आ सकती है ? मेरा तो उसी समय माथा ठनक गया था जब सतारा से कासिद महाराज शाहू जी के तलब करने का पैगाम लेकर आया था। पता नहीं कल दरबार में क्या होगा ?“
“कुछ नहीं होता। तुम चिंता मत करो। मैं सबको देख लूँगा।“ मस्तानी को ढाढ़स देते बाजी राव का मन खुद डोल रहा होता है।
मस्तानी बाजी राव का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख लेती है, “यह देखो। मेरा तो कलेजा कांपे जा रहा है। देखना, कहीं वही बात न कर देना ? अगर आपने मुझे छोड़ दिया तो न मैं इधर कही रहूँगी और न उधर की।... मैं तो माऊ जाकर साध्वी बन जाऊँगी।“
“तुम्हारा परिवार माऊ-माऊ बहुत करता है। क्या है माऊ में खासियत ?“
“माऊ हमारा धार्मिक केन्द्र है। तमासा दरिया वाले इस नगर माऊ का पहला नाम माऊ नाथ भजन था। माऊ का मतलब पड़ाव या छावनी होता है। शेर शाह सूरी, बादशाह अकबर और आलमगीर औरंजजेब इस नगर को सफ़र के दौरान ठहराव के तौर पर इस्तेमाल किया करते थे। औरंगजेब की बहन जहांआरा ने यहाँ मुहल्ला केरियां में एक मस्जिद भी बनाई थी, जिसके साथ अनेक सरायें भी बनी हैं। कहते हैं, बहुत पहले एक नट हुआ करता था -माऊ नट भजन। वह बड़ा शरारती और ज़ालिम था। स्थानीय पंडितों को बहुत तंग किया करता था। पंडितों ने हाकिम से उसकी शिकायत करके उसको वहाँ से निकालने के लिए कहा। नट ने हाकिम से विनती करके एक शर्त रख दी कि यदि पंडित कुश्ती करके उसको हरा देंगे तो वह नगर छोड़कर चला जाएगा। नहीं तो पंडितों को नगर छोड़ना पड़ेगा। कुश्तियाँ हुईं। न माऊ जीत सका और न ही उसकी हार हुई। मामला वहीं का वहीं रह गया। आखि़र माऊ ने कहा कि वह नगर छोड़कर चला जाएगा यदि नगर का नाम उसके नाम पर रख दिया जाए। पंडित मान गए और माऊ वहाँ से चला गया। उस दिन से उस नगर का नाम माऊ नट भजन पड़ गया। समय के साथ साथ धीरे धीरे बिगड़ता हुआ यह नाम सिर्फ़ माऊ ही रह गया है। हिमांयू को हराने वाला बादशाह शेर शाह सूरी यहीं माऊ में ही कोल्हूवावण(मधुवन) प्रसिद्ध सूफी फकीर संत सैयद अहमद वडवा को मिलने भी आया करता था। शेर शाह सूरी की बेटी स्थायी तौर पर यहीं रहती रही थी। इलाहाबाद को जाते हुए अकबर यहीं पर ठहरा करता था। मुगलों की सेना के साथ आए तुर्की, अफ़गानी और ईरानी जुलाहे यहीं माऊ में ही बस गए। इस कारण यहाँ के लोग भोजपुरी, फारसी, पश्तो और ईरानी बोलियाँ बोलते हैं। जुलाहों ने अपना पुश्तैनी व्यवसाय अपना कर माऊ को वस्त्र बनाने के लिए प्रसिद्ध कर दिया। आपने जो लुंगी पहन रखी है, मालूम है, कितना जंचती है। आपके परिवार वालों ने मुझे निकाल दिया तो मैं माऊ मंे जाकर संतनी बन जाऊँगी।... अच्छा बताओ यदि मैं सन्यास लेकर माऊ चली गई तो क्या वहाँ मुझे मिलने आओगे ?“
बाजी राव करवट बदलकर मस्तानी की ओर अपने शरीर को मोड़ता है और मस्तानी को कसकर बांहों में भींच कर अपनी छाती से लगा लेता है, “यह क्या अनाप शनाप बोले जा रही है ? तुझे छोड़ने के लिए तो मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता। कौन जन्मा है, मुझे तुझसे छीनने वाला ? खुंडी कुल्हाड़ी से टुकड़े न करके रख दूँगा। मैं तो स्वयं नहीं तेरे बिना रह सकता। मस्तानी जान, मर जाऊँगा तुझसे दूर होकर।“
मस्तानी, बाजी राव के मुँह पर हाथ रख देती है, “हाय हाय! अल्लाह ! राम-राम !! कहो। मरें आपके दुश्मन।“
मस्तानी बाजी राव के ऊपर लेट जाती है, “आपको एक कहानी सुनाती हूँ।... चैहदवीं सदी में क्षत्रिय राजपूत राजकुमार हरदेव सिंह को बोरदी दासी के साथ प्रेम संबंध स्थापित करने के कारण जाति से निकालकर देश निकाला दे दिया गया था। फिर वह जंगलों में जाकर अपनी प्रेमिका के संग बस गया और गुप्त रूप में उसने अपनी सेना तैयार की थी। समय बीतता गया और उसके पिता का स्थान अन्य राजा ने ले लिया। नए राजा का पुत्र हरदेव सिंह की जवान पुत्री पर मोहित हो गया। राजकुमार ने हरदेव सिंह से उसकी पुत्री का हाथ मांगा। हरदेव सिंह ने शर्त रख दी कि वह शादी करने के लिए तैयार है, यदि राजकुमार का राजा पिता अपने मंत्रियों और सिपहसालारों के साथ आकर उसके हाथों का बना भोजन करे। राजा अपने पुत्र की खुशी के लिए यह शर्त मान गया। हरदेव सिंह ने खाने में नशीले पदार्थ डालकर सबको खिलाये और शराब तथा अफीम का सेवन सभी को करवाकर मदहोश कर दिया। उसके पश्चात हरदेव सिंह के सैनिकों ने राजा और उसके साथियों को मार दिया और इस प्रकार लहू की बूंदें लेकर हरदेव सिंह ने अपना हक वापस प्राप्त किया था। हरदेव सिंह ने हकों के लिए बूंद लो का नारा लगाकर अपना नया वंश ‘बुंदेल’ चलाया था। अब यूँ लगता है जैसे फिर एक बुंदेल के हकों पर उसके प्रेम संबंधों के कारण डाके मारे जाने की तैयारियाँ की जा रही हों।“
बाजी राव वेग मंे आकर मस्तानी की गालों और अधरों को चूमने और च्यूंटने लग जाता है, “तुझे भरोसा नहीं मेरे पर ? ... हैं...? ऊँ... बोल... तो... विश्वास नहीं अपने प्यार पर ?... हूँ ?... हैं ?“
“विश्वास है, इसीलिए तो अब आपके पास लेटी हूँ।“
मस्तानी, बाजी राव को प्रत्युŸार में संक्षिप्त से चुंबन देकर उसके अधरों में से अपने अधर नजाकत के साथ छुड़ा लेती है। बाजी राव उसकी बेरुखी का बुरा नहीं मनाता और मस्तानी को निर्वस्त्र करता हुआ गरमाने के लिए यत्न जारी रखता है। बाजी राव के शारीरिक मिलाप के निमंत्रण को उŸार दिए बिना ही मस्तानी उसकी छाती से चिपटकर खामोश हो जाती है।
बाजी राव मस्तानी की रुचि न होने के बावजूद उसको भोगता है और शांत होकर पड़ जाता है। शेष बची रात बाजी राव और मस्तानी करवटंे बदलते हुए बेचैनी और मानसिक कशमकश मंे बिताते हैं।
पौ फटती है तो बाजी राव स्नान करके घोड़े तैयार करने का आदेश देता है। मस्तानी पूजा पाठ करके बाजी राव के सिर पर लाल पेटा बांध कर उसको विदा करती है। अनमने से मन के साथ मस्तानी से अलविदा लेकर बाजी राव छत्रपति शाहू के दरबार में उपस्थित होने के लिए यात्रा आरंभ कर देता है।
Thursday, 29 October 2015
अध्याय-22
छत्रपति का दरबार
चित्र
(छत्रपति महाराज शिवाजी का दरबार)
दोपहर के बाद जब बाजी राव महाराजा शाहू जी के दरबार में उपस्थित होता है तो वहाँ छत्रपति के मंत्री और अधिकारियों के अलावा छोटा भाई चिमाजी अप्पा, माता राधा बाई, धर्मगुरू महाराज श्री ब्रह्ममहिंदरा स्वामी और उनके भट्ट खानदान का बुजुर्ग मोरे सेठ आदि ही पहीं, कई अन्य मराठे सरदार महाधजी पंत, महोडबा पूरनधारे, सूबा राव जेबे भी उपस्थित होते हैं।
मुस्लिम शासकों के प्रभाव के कारण भारत में प्रशासनिक पदों के नाम अरबी, फारसी में प्रचलित थे। राज भाषा भी फारसी ही थी। छत्रपति शिवाजी ने अपने शासनकाल के दौरान अपनी राजभाषा मराठी घोषित करके राज कार्यों के लिए ‘राजविहार कोश’ की रचना करवाई थी। जिसका संपादन रघूनाथ पंत हनुमंते की निगरानी अधीन अनेक विद्वानों ने सम्पूर्ण किया था। इस ‘राज विहार’ कोश के अनुसार आठ विशेष पद बनाये गए थे। जिन्हंें अष्ट प्रधान कहा जाता है। इनकी सूची क्रमवार पदानुसार इस प्रकार है -
पेशवा - मुख्यमंत्री (प्रधान मंत्री -च्तपउम डपदपेजमत)
मजूमदार -आमतिया (राज मंत्री - ब्ंइपदमज डपदपेजमत)
सुरनिस - सचिव(विŸा मंत्री - थ्पदंदबम डपदपेजमत)
बाकेनवीस -सचिव(गृह मंत्री - प्दजमतदंस ।ििंपते डपदपेजमत)
सरनौबत -सेनापति ( ब्वउउंदकमत)
दबीर - सामंत (विदेश मंत्री - थ्वतमपहद डपदपेजमत)
न्यायधीश - जज(स्ंू डपदपेजमत वत ैमदपवत श्रनकहम)
पंडित राव( धार्मिक मंत्री - त्मसपहपवने डपदपेजमत)
छत्रपति शिवाजी द्वारा तैयार करवाये राजविहार कोश के अनुसार छत्रपति के दरबार में अष्ट प्रधानों के बैठने के लिए विशेष आसन आरक्षित रखे गए थे। दरबार में बुलाये जाने का उद्देश्य जानते हुए भी बाजी राव अनजान बनने का ढोंग करता है, “छत्रपति की जय हो ! आदेश कीजिए महाराज... खादिम को यूँ अचानक कैसे याद किया गया है ?“
छत्रपति, बाजी राव को बैठने का इशारा करता है। बाजी राव छत्रपति शाह के सबसे निकट दायीं ओर पेशवा आसन पर विराजमान हो जाता है।
महाराज शाहू बाजी राव की ओर देखता हुआ बड़ी नम्रता के साथ कहना प्रारंभ करता है, “देखो बाजी राव, तुम तो जानते ही हो कि हम तुम्हें कितना प्यार और सत्कार करते हैं। तुम एक बढि़या योद्धा ही नहीं, मराठों का मान भी हो। हमने तुम्हें पेशवाई यूँ ही नहीं दी थी। तुम्हारे गुणों और योग्यता को देखा था। साहित्यिक भाषा में जिसको आदर्श पुरुष कहते हैं। हमारे विशाल मराठा साम्राज्य का महानायक और हीरा हो तुम, हीरा। हम नहीं चाहते कि हमारे इस नायाब हीरे की चमक कभी धुंधली पड़े।“
बाजी राव खांसकर गला साफ़ करता है, “क्या बाजी राव ने अपनी पेशवाई कर्तव्य निभाते हुए आज तक आपको कोई शिकायत का अवसर दिया है, महाराज स्वामी ?“
“नहीं, हमें तो नहीं। पर तुम्हारे परिवार और मराठा सरदारों को तुमसे शिकायत है। तुम चूंकि हमारे प्रिय हो इसलिए हम उसको दूर करने के इच्छुक हैं। तुम्हारे ऊपर दोष लगा है कि तुम मस्तानी के साथ अय्यासी में इतने मग्न रहते हो कि तुम्हें जग और ईश्वर की भी कोई सुध नहीं रहती है। मुझे पता चला है कि तुम हर समय मदिरापान ही करते रहते हो। मस्तानी भी रोकने की बजाय तुम्हें नशा करने के लिए उत्साहित करती है। यह आदत हमारे मराठा सल्तनत और तुम्हारी सेहत के लिए बहुत हानिकारक है, शेर-ए-मराठा। हम इस समस्या को लेकर काफी चिंतित हैं।“ महाराज शाहू रौब के साथ बोलते हैं।
बाजी राव गर्दन झुकाये सोचता हुआ उŸार देता है, “महाराज, मैं क्या करूँ ? किधर जाऊँ ? यह सारा शोर-शराबा व्यर्थ का है। बात शराब की नहीं है। शराब तो पहले मैं कौन सा कम पीता था, जब मस्तानी नहीं थी? लोगों की आँखों में तो मस्तानी चुभती है। मस्तानी ने मुझे कभी शराब पीने के लिए नहीं कहा। वह तो बल्कि मुझे रोका करती है। महाराज स्वामी, आपने भी पाँच विवाह करवाये हैं। सभी हुक्मरान एक से अधिक स्त्रियाँ रखते हैं। फिर मस्तानी के साथ रिश्ता जोड़कर मैंने कौन सा गुनाह कर लिया है ? मस्तानी के साथ समय गुज़ारना मुझे अच्छा लगता है। वह मेरी रूह जैसी है। मेरे परिवार को बस यही बात चुभती है। मेरे परिवार वाले हर समय किसी न किसी मुद्दे को लेकर मेरी जान सूली पर टांगे रखते हैं। मैंने अपनी सारी उम्र युद्ध लड़ते हुए अपने परिवार और मराठा राज का गर्व से सिर ऊँचा उठाने में लगा दी है। जब समूचा मराठा राष्ट्र सिरहाने के नीचे बांह रखकर सुख की नींद सो रहा होता था तो मैं युद्धभूमि में नंगी तलवार चलाकर मराठा राज की सीमाओं को बढ़ा रहा होता था। मैं भी इन्सान था। क्या मुझे अपने फुर्सत के समय में मनोरंजन करने का अधिकार नहीं है ?“
धर्मगुरू ब्रह्ममहिंदरा टोकता है, “वह तुम्हारी बात ठीक है। खूब दिल को बहला। पर बच्चा ! हर काम की कोई सीमा होती है। अब भी देख तेरी जबान थुथला रही है और तेरे से उचित ढंग से बैठा भी नहीं जा रहा। तुम अब भी नशे से धुŸा हो। हम तुम्हारे हित चिंतक हैं, शत्रु नहीं। हम समस्याओं का असली कारण बूझ रहे हैं। यदि हमने अब कोई कठोर कदम न उठाया तो तुम अपने आप को शराब पीकर खत्म कर लोगे।“
बाजी राव कुछ नहीं बोलता और खामोशी के साथ सबकी ओर देखता रहता है।
महाराज शाहू चुप के वातावरण को बदलते हैं, “पेशवा बाजी राव... हम आदेश देते हैं कि तुम्हारा परिवार और समूह मराठा राष्ट्र तुम्हारे और मस्तानी के संबंधों को स्वीकार करेगा। कोई भी किसी तरह की आपŸिा नहीं करेगा। पर एक शर्त है कि तुम्हें शराब छोड़नी पड़ेगी। तुम वचन दो और हमें शराब छोड़कर दिखाओ। हम तुम्हें सबसे दूर एकांत में पतास(65 ज्ञउ ंूंल तिवउ उवकमतद च्नदम ) जाने का आदेश देते हैं। पतास जाकर तुम अकेले कुछ समय व्यतीत कर और नशों से मुक्त हो। जब तक तुम मदिरा नहीं छोड़ोगे, तुम मस्तानी से नहीं मिल सकते। यही हम सब का फैसला है।“
बाजी राव रुआंसा हो जाता है और उसके मुँह से उदासीन, थकी सी आवाज़ निकलती है, “ठीक है, यदि यही आपका निर्णय है तो... मैं आपŸिा करने वाला कौन होता हूँ ? मैंने क्या पहले आपका आदेश मानने से इन्कार किया है जो अब हुक्म-उदूली करूँगा। लेकिन मेरी भी एक शर्त है कि मस्तानी के मामले पर उसके बाद कोई बखेड़ा नहीं होना चाहिए। मस्तानी मेरे दिल की धड़कन है।“
गुरू ब्रह्ममहिंदरा अपना अगला दांव खेलता है, “ऐसे नहीं बाजी राव, तुम्हें सौगंध खानी पड़ेगी कि जब तक हम नहीं कहते, तुम मस्तानी को नहीं मिलोगे। गंगा जल प्रस्तुत किया जाए।“
“ठीक है गुरूवर !“ गंगा जल हथेली में लेकर बाजी राव कसम खा लेता है और सबसे आज्ञा लेकर गुस्से में घोड़े पर सवार होकर पूणे से चालीसेक मील की दूरी पर बसे नगर पतास की ओर निकल जाता है।
Wednesday, 28 October 2015
अध्याय-23
तिल तिल मौत
बाजी राव को पतास आए एक महीना बीत चुका होता है। इस एक महीने के दौरान बाजी राव शराब को मुँह तक नहीं लगाता। बेशक उसका शरीर और रूह, दोनों बुरी तरह शराब की मांग करते हैं। परंतु बाजी राव अपनी प्रतिज्ञा पर डटा रहता है। उसने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया होता है कि मस्तानी का साथ पाने के लिए वह मरता मर जाएगा, पर शराब की ओर देखेगा तक नहीं। पीने की बात तो दूर की रही।
बाजी राव, परिवार, मस्तानी और छत्रपति सब से एक किस्म से अपने संबंध तोड़ कर एकांत में समय व्यतीत कर रहा होता है। बाजी राव जब से पतास आया है, तब से वह बीमार ही रहा है। उसे न तो नहाने धोने की होश है, न ही उसने कभी समय से ठीकप्रकार भोजन किया है। बस, दिन रात बिस्तर पर पड़ा रहता है। उसके हट्टे-कट्टे शरीर में दुर्बलता भी बहुत आ गई है।
उधर बाजी राव की अनुपस्थिति में अप्पा की सिपहसालारी के अधीन मराठों की कुछेक दुश्मनों से झड़पें होती हैं जिनमें मराठों को सफलता तो क्या मिलनी थी, अपितु हार का मुँह देखना पड़ा और काफ़ी हानि भी हुई।
इस प्रकार बाजी राव को पतास में आए हुए दो माह बीत जाते हैं। चिमाजी अप्पा अपने बड़े भाई पेशवा बाजी राव से आकर मिलता है। स्वास्थ्य खराब रहने के कारण बाजी राव अब तक बहुत बुरी हालत में होता है और चिमाजी अप्पा को गले लगाते समय उसके हाथ कांप रहे होते हैं। बाजी राव स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होने में भी असमर्थ होता है। बाजी राव को चक्कर आने लगते हैं। वह चक्कर खाकर बिस्तर पर ही गिर पड़ता है। चिमाजी अप्पा अपने हाथों का सहारा देकर बाजी राव को बिठाता है, “यह क्या भाऊ ? क्या हालत बना ली है अपनी ?“
“तेरे सामने ही है...।“ बाजी राव के मुख से हकलाती हुई बड़ी कठिनाई से आवाज़ निकलती है।
“वही तो देख रहा हूँ। न आवाज़ में शेरों वाली गर्जन, न घोड़े जैसी चाल और न ही हाथयों को पीछे छोड़ने वाली देह। आप अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखते ?“
“खुद अपना ख़याल भी कभी कोई रख सका है, अप्पा मेरे भाई ? मस्तानी मेरा ख़याल रखती थी। उसको तुम सबने मुझसे दूर कर दिया है।... भगवान जाने, तुम किस जन्म का वैर ले रहे हो मेरे से ? तुम्हें तो पता है, मैं मस्तानी के बिना नहीं रह सकता। मर जाऊँगा। मुझे मारकर ही सब सांस लोगे।“ इतना कहते ही बाजी राव को खदसा लग जाता है और फिर उसके शरीर में एकदम कंपन होने लगता है। सभी अंग पैर तेज़ तेज़ कांपने लग जाते हैं और थरथराता हुआ बाजी राव मूर्छित हो जाता है।
“भाऊ!...भाऊ!!...भाऊ !!!“ चिमाजी अप्पा घबराकर बाजी राव को लिटा देता है और वैद को बुलाता है, “वैद जी ?... पहरेदार ... शीघ्र, वैद जी को बुलाओ...।“
वैद आकर मूर्छित पड़े बाजी राव की नाड़ी टटोलकर उसके मुँह में काढ़ा डालता है। उसके बाद बाजी राव के हाथों पैरों की कुछ नाडि़यों को विशेष ढंग से दबाता है। सेवक को बाजी राव की हथेलियों और पांव के तलुओं पर तेल की मालिश करने को कहता है।
“शीघ्र ही, होश आ जाएगा।“ कहकर वैद चिमाजी अप्पा को आरामगाह में से बाहर आने का संकेत करता है।
एकांत में जाकर वैद इधर उधर देखता है और अप्पा को सम्बोधित होकर बताता है, “अप्पा स्वामी, श्रीमंत सरकार बहुत लम्बे समय से अधिक शराब का सेवन करते रहे हैं। पेशवा जी के रक्त में शराब बुरी तरह मिलकर घर कर चुकी है। उनकी देह इस नशे की आदी हो चुकी है। नशा किसी भी प्रकार का हो, उसको धीरे धीरे त्यागा जाता है। पहले उसकी मात्रा को कम किया जाता है, फिर धीरे धीरे तिलांजलि दी जाती है। एकदम मदिरा को छोड़ने से हानि होती है, जो आप देख ही रहे हैं। इस प्रकार अचानक शराब छोड़ने के कारण मौत भी हो सकती है। लेकिन मैं काढ़ों में पेशवा जी को मदिरा मिलाकर पिलाता रहूँगा ताकि इनके शरीर को अधिक नुकसान न हो।“
“अच्छा तो यह सब शराब छोड़ने का परिणाम है।“
“शराब छोड़ने का नहीं, अचानक एकदम छोड़ने का नतीजा है। लम्बा अरसा शराब पीते रहने के कारण उनकी स्मरणशक्ति कमज़ोर हो गई है और वह अक्सर बात करते करते भूल जाते हैं। उनके बाल भी झड़ने लग पड़े हैं। कई बार तो उनकी आँखों के आगे अँधेरा भी आ जाता है। ये कोई बहुत अच्छे लक्षण नहीं हैं। यदि उनका सही इलाज और पूरा खयाल नहीं रखा गया तो वह अधिक समय जिंदा नहीं रह सकेंगे। वैसे ये हद से ज्यादा शराब पीने के कारण अधरंग होने के आसार हैं। पूरे धड़ के एक हिस्से में लकवा भी मार सकता है। बहुत गंभीर अवस्था मंे पहुँच गए हैं श्रीमंत सरकार। शराब की लत और जवानी की हवस एकदम से छोड़ दी जाए तो व्यक्ति मरने के किनारे पहुँच जाता है। आपने तो दोनों लतें इकट्ठी ही छुड़वा दी हैं। बहुत बुरी बात है। इसके परिणाम भयानक निकल सकते हैं। अब तो चैबीस घंटे इनकी निगरानी रखने की आवश्यकता है, अप्पा स्वामी।“
वैद की ताकीद सुनकर अप्पा संजीदा हो जाता है, “शुक्रिया वैद जी, मैं भाऊ की देखरेख का प्रबंध करता हूँ।“
अप्पा अंदर जाकर बाजी राव के सिरहाने बैठ जाता है। कुछ समय बाद बाजी राव की चेतना लौटती है और वह थोड़ी-सी आँखें खोलकर अप्पा की ओर देखता है, “अभी तक यहीं हो अप्पा ?“
अप्पा अपने आसन से उठकर बाजी राव के बिस्तर पर जा बैठता है और बाजी राव का हाथ पकड़ लेता है, “भाऊ, मुझसे आपकी यह हालत देखी नहीं जाती।“
“मैंने तुमसे कहा था न कि मैं मस्तानी के बिना नहीं रह सकता। अब तो देख लो मैंने शराब भी छोड़ दी है। अब तो उसको मेरे पास भेज दो ? पत्नी से बढि़या पति की दूसरा कोई देखरेख नहीं कर सकता। अप्पा, कृपा करक मेरी पत्नी को मेरे पास भेज दो। मुझे मेरी अद्र्धांगिनी की सख्त ज़रूरत है।“ बाजी राव गिड़गिड़ाने लग जाता है।
“चिंता न करो भाऊ। मैं करता हूँ कुछ। आप थोड़े स्वस्थ हो कर खरागौन (ज्ञंसूं ज्ञींतमहंवदए ज्ींदमए डंींतंेीजतंए प्दकपंण् 145 ज्ञउ दृक्पेजंदबम तिवउ ज्ञंसूं जव च्नदम) आ जाओ। आपकी पत्नी को मैं वहीं लेकर आता हूँ। मैं वचन देता हूँ।“
अप्पा की बात सुनकर बाजी राव की आँखों में चमक आ जाती है और वह उठकर बैठने का यत्न करता है। अप्पा उसको कंधों से पकड़कर वापस लिटा देता है, “नहीं, अब आप सो जाओ। आपको आराम की सख्त ज़रूरत है। मैं भी चलता हूँ। चैथ एकत्र करने जाना है।“
चिमाजी अप्पा पूणे अपने घर मंे जाकर सबको बाजी राव की बिगड़ती हालत से परिचित करवाता है और बाजी राव के बड़े पुत्र नाना साहिब के संग परामर्श करता है, “नाना, समझ में नहीं आता कि क्या करूँ ? मैं तो वचन भी दे आया हूँ और मस्तानी को भी भाऊ के पास नहीं भेज सकता। भाऊ की हालत बहुत खराब है। निगरानी और सेवा-टहल के लिए कोई घर का व्यक्ति ही चाहिए।“
“अप्पा चाचा, मुझे खुलकर विस्तार से बताओ कि क्या वार्तालाप हुआ था आपका बाबा के साथ ?“
“भाऊ ने एक ही रट पकड़ रखी थी। मस्तानी... मस्तानी... मस्तानी। बार बार कह रहा था कि मुझे पत्नी की ज़रूरत है। मेरी पत्नी को मेरे पास भेज दो।“
ओट मंे खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही राधा बाई भी बाहर निकलकर आ जाती है, “पत्नी कहता है तो काशी को भेज देते हैं। वह भी तो पत्नी ही है। बल्कि पहली और असली पत्नी। हो सकता है अप्पा तुझे सुनने में भ्रम हुआ हो।“
“नहीं आई। मैं कोई मूर्ख हूँ ? भाऊ, मस्तानी को ही याद कर रह था। उस पगले को मस्तानी का भुस पड़ा हुआ है। काशी वाहिनी साहिबा के विषय में तो उसने पूछा तक नहीं।“ अप्पा अपनी बात स्पष्ट करता है।
राधा बाई अपने चेहरे पर शैतानी मुस्कान लाती है, “यह तो हम ही जानते हैं। तू ऐसा कर काशी को बाजी राव के पास भेज दे और साथ में छोटे लल्ले(पुत्र) जनार्धन को भी। बाजी राव का चिŸा बहला रहेगा। उसने पत्नी कहा है। यही क्या कम है, मस्तानी या काशी बाई ? तू कह देना, भ्रम हो गया था। इस प्रकार कुछ दिन मामला टला रहेगा। और हाँ, मस्तानी पर पहरा और कड़ा कर दो। जब काशी के बाजी राव के पास जाने का पता चलेगा तो हो सकता है, वह कलमुँही भी उसके पास जाने की कोशिश करे।“
“लो, ऐसे कैसे भाग जाएगी ? टखने न तोड़ दूँगा। एकबार भाग गई थी मेरी कैद में से। अब नहीं इस जंगली कबूतरी को उड़ने दूँगा मैं। पहरा तो मस्तानी के महल का मैंने पहले ही सख्त किया हुआ है। भनवारा महल मंे परिंदा भी पर नहीं मार सकता। वैसे इस तरकीब के बारे में तो माता श्री मैंने सोचा ही नहीं था। हम काशी वाहिनी साहिबा को ही भेजते हैं।“ चिमाजी अप्पा और नाना साहिब राधा बाई की योजना से सहमत हो जाते हैं।
राधा बाई, बहू काशी बाई और पोत्र जनार्धन को तैयार करके खारगौन बाजी राव के पास भेज देती है। बाजी राव पालकी देखकर एकबार तो प्रसन्न हो जाता है और बिस्तर पर से उठकर बैठ जाता है। जब पालकी में से वह काशी बाई को गोदी मंे जनार्धन को उठाये उतरते देखता है तो फिर से बिस्तर पर धड़ाम से गिर पड़ता है काशी बाई करीब जाकर बाजी राव को उठाती है लेकिन वह मूर्छित हुआ पड़ा होता है। वैद तुरंत आकर बाजी राव को उपचार करना आरंभ कर देता हैं। बाजी राव बेहोशी की हालत में बड़बड़ा रहा होता है, “मस्तानी...मस्तानी...मस्तानी।“
मस्तानी का नाम सुनते ही काशी बाई के तन बदन में आग लग जाती है। वह ब्राह्मणों को बुलाती है, “पंडित जी, मुझे लगता है, मेरी सौतन मस्तानी ने मेरे पति पर काला जादू किया हुआ है। बुरे समय को टालने के लिए मैं हवन करवाना चाहती हूँ।“
पंडित अग्नि जलाकर महामृत्युंजै का जाप प्रारंभ कर देते हैं। काशी बाई दो दिन बाजी राव के सिरहाने अपने पुत्र को लेकर दिन रात बैठी रहती है। कभी कभार बीच बीच में बाजी राव को होश आता है और कभी वह पुनः मूर्छित हो जाता है।
अचानक बाजी राव की तबीयत इतनी अधिक बिगड़ जाती है कि वह कराहते हुए ऐडि़याँ रगड़ने लग पड़ता है। वैद, बाजी राव को काढ़ा पिलाने का यत्न करता है। परंतु बाजी राव पिचकारी मार कर बाहर निकाल देता है। अंत में उसकी आँखें खुली रह जाती है और पलकें भी झपकना बंद हो जाती हैं। वैद नब्ज़ टटोलकर देखता है। बाजी राव के दिल की धड़कन रुक चुकी होती है। वैद आँखों पर हाथ रखकर बाजी राव की पलकें बंद कर देता है और उसकी मृत्यु की घोषणा कर देता है।
काशी बाई, बाजी राव को अडोल और गहरी निद्रा में सोया देखती है। चिर निद्रा ! वह नींद जिसमें से पेशवा कभी नहीं जागेगा। काशी बाई अपनी चूडि़याँ तोड़कर विलाप प्रारंभ कर देती है।
संभाजी द्वारा आक्रमण करने के कारण मानाजी ने बाजी राव से समर्थन मांगा था। बाजी राव ने अपना स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण अपने बेटे नाना साहिब को मानाजी की सहायता के लिए भेज दिया था। नाना साहिब और मानाजी की फौजों ने संभाजी को रणभूमि मंें से भगा दिया था। उसके पश्चात नाना साहिब और चिमाजी अप्पा रेवपाड़ा पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की योजनाएँ बना ही रहे होते हैं कि उन्हंे सरदा के किनारे 28 अपै्रल 1740 ई. को बाजी राव की मृत्यु की सूचना मिलती है। सूचना मिलते ही सारा परिवार खारगौन पहुँच जाता है और शाही सम्मान के साथ बाजी राव की लाश को रावरखेड़ी ले जाया जाता है।
Monday, 26 October 2015
अध्याय-24
अशुभ समाचार
गोपिका बाई आकर मस्तानी को बाजी राव की मौत के बारे में भनवारा महल में बताती है। इस अशुभ समाचार को सुनते ही मस्तान की धाहें निकल जाती है, वह बुक्का फाड़कर रोते हुए बाहर की ओर जाने लगती है और दरवाज़े में से कुछ सोचकर वापस लौट आती है।
“गोपिका, मैंने तुझे नृत्य और संगीत सिखाया है। तू मुझे गुरू मानती है न ?“
“हाँ, मस्तानी ताई साहिबा। इसमें कोई शक है आपको ?“
“नहीं शक तो नहीं है। तुझे मेरे पर एक अहसान करना होगा। चाहे इसको तुम मेरी गुरू दक्षिणा समझ...।“
“आपके लिए तो जान भी हाजि़र है। आदेश करो।“
“मुझे अपने वस्त्र उतार कर दे और मेरे कपड़े तुम पहनकर महल की छत पर टहलती रहना ताकि देखने वाले को मेरा भ्रम होता रहे। मैं अपने स्वामी के अन्तिम दर्शन करना चाहती हूँ। जीते जी तो इन्होंने मिलने नहीं दिया। अब मुझे मरे का मुँह भी नहीं देखने देंगे। मैं हाथ जोड़कर तुझसे प्रार्थना करती हूँ। देख, मैं तेरे पैर पड़ती हूँ मुझे इन्कार न करना।“ मस्तानी गोपिका के पैर पकड़ लेती है।
गेपिका एकदम पैर को पीछे सरका कर मस्तानी की बाहें पकड़ लेती है, “नहीं ताई साहिबा। यह आप क्या कहते हैं ? लो, शीघ्रता से उतारो अपने कपड़े, आपको विलम्ब न हो जाए।“
दोनों आपस में वस्त्र बदल लेती हैं। मस्तानी, गोपिका के वस्त्र पहने पूजा वाली थाली लेकर भनवारा महल में से बाहर निकल जाती है। तबेले में से घोड़ा चोरी करके मस्तानी खारगौन की ओर सीधी दौड़ लगा देती है।
मस्तानी के खरगौन पहुँचने से पहले ही बाजी राव की मृतक देह को नरबदा नदी के किनारे अग्नि दिखाई जा चुकी होती है। मस्तानी घोड़े पर से उतरते ही बाजी राव की चिता में कूदने लगती है। चिमाजी अप्पा और नाना साहिब मस्तानी का आगे बढ़कर रोक लेते हैं। अंतिम संस्कार की रस्में समाप्त होने के बाद मस्तानी को पाबल के महल में ले जाकर छोड़ दिया जाता है।
Sunday, 25 October 2015
Saturday, 24 October 2015
अध्याय-26
दफ़न राज़
By Tarsem Rahi
|
Friday, 23 October 2015
अंतिका
इस घटना के पश्चात सदा के लिए मराठों के इतिहास मंे यह बताया जाता है कि मस्तानी ने बाजी राव के वियोग में ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी। कुछ इतिहासकार मस्तानी द्वारा बाजी राव के साथ चिता में जलकर सति होना भी बताते हैं, जो कि गलत है। मृत्यु के समय मस्तानी की आयु 25-30 वर्ष थी। पाबल मंे बाद में बनाई गई मस्तानी की समाधि आज भी मौजूद है। मस्तानी समाधि की देखभाल, मस्तानी के वंशज, एन.एस. इनामदार द्वारा की जाती है। 1734 ई. में कोबरूड़ में मस्तानी के लिए बनाया गया निवास स्थान अब भी जर्जर स्थिति में मौजूद है। पाबल में मस्तानी को बाजी राव द्वारा दिए मस्तानी महल को अब केलकर अजायब घर में परिवर्तित कर दिया गया है। मस्तानी के छह वर्षीय पुत्र शमशेर बहादुर को पेशवा के परिवार द्वारा पाला गया था और बड़ा होने पर बुंदेलखंड से बाजी राव को मिली जागीर उसे दी गई थी। अहमद शाह अब्दाली की फौजों के साथ पानीपत की तीसरी लड़ाई में 14-1-1761 ई. को चिमाजी अप्पा के बेटे सदाशिव राव भाऊ और नाना साहिब के बेटे विश्वास राव भाऊ सहित लड़ते हुए शमशेर बहादुर 27 वर्ष की युवा अवस्था में वीरगति को प्राप्त हो गया था। शमशेर बहादुर की औलाद को मराठों के विरोध के कारण आज भी बाजी राव का वंशज नहीं बल्कि मस्तानी का वंशज कहा जाता है। शमशेर बहादुर का बेटा अली बहादुर, बुंदेलखंड वाली बाजी राव की जागीर पर राज करता रहा था और बांदा, उत्तर प्रदेश रियासत की उसने नींव रखी थी। बाजी राव की मौत से एक वर्ष बाद चिमाजी अप्पा भी युद्ध में मारा गया था और मराठों का उत्थान, पतन की ओर मुड़ गया था।
पेशवा बालाजी बलाल बाजी राव उर्फ़ नाना साहिब, तीसरी ऐंगलो-मराठा जंग (1817-1818) के मध्य ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ खड़की की जंग में अंग्रेजों से हार गया था और मराठा साम्राज्य ब्रितानवी शासन में मिला लिया गया था। बालाजी बाजी राव ने अपनी राजगद्दी सर जाॅन मैलकम, ईस्ट इंडिया कंपनी के सुपुर्द करके शेष जीवन कानपुर (उत्तर प्रदेश) के करीब बिठूर में जलावतनी में बिताया और अंग्रेज सरकार से उसको गुज़ारे के लिए पेंशन मिलती रही थी।
बाद में पेशवाओं ने शनिवार वाड़े को और अधिक सुंदर बनाया। नाना साहिब के बेटे पेशवा स्वाई माधव राव द्वारा बनाया कलम के फलनुमा सोलह पत्तीयों वाला हज़ार करंजी फुव्वारा इस वाड़े की शान है। इस फुव्वारे में से पानी की हज़ार धारें एक समय में निकलती हैं। उस समय सैकड़ों नर्तकियाँ एक समय में उसके आसपास नृत्य किया करती हंै। 1758 ई. तक हज़ार से अधिक लोग शनिवार वाड़े मंें निवास करते थे। 27 फरवरी 1828 ई. को अचानक लगी भयानक आग से इस वाड़े की कई ऐतिहासिक वस्तुएँ नष्ट हो गई थीं।
उल्लेखनीय है कि मराठांे ने बाजी राव और मस्तानी की प्रेम गाथा लिखने नहीं दी थी। इसलिए यह अब तक किसी भी भारतीय भाषा में उपलब्ध नहीं है। अंग्रेजों ने इस बारे में थोड़ा-बहुत लिखा है। उनका खंडन करने के लिए मराठी में प्रताप गंगवाने द्वारा लिखित ‘श्रीमंत बाजी राव मस्तानी’ धारावाहिक बनाया गया था। लेकिन उसमें भी सही और सम्पूर्ण रूप में इस कहानी को प्रस्तुत नहीं किया गया था। मराठा इतिहास में बाजी राव के शौर्यगीत तो बहुत गाये जाते हंै, पर मस्तानी के बारे मंे कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता है। यहाँ तक कि कट्टर मराठों द्वारा मस्तानी के स्मृति स्थल और समाधि को अनेक बार नष्ट करने के प्रयत्न भी हुए हैं। मस्तानी की सम्पूर्ण जीवन गाथा को बयान करती किसी भी भारतीय भाषा में लिखी गई यह प्रथम कथा रचना है।
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