Saturday, 31 October 2015

अध्याय-20

जंगनामा

1735 ई. तक मराठों ने समस्त गुजरात और मालवा क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया। परंतु कुछ स्थानों पर मुगल ओहदेदारों और जमींदारों ने मराठों का शासन स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। मुगल बादशाह मुहम्मद शाह भी चैथ और सरदेशमुख की सनद मराठों के हवाले करने से कतराता था। बाजी राव ने बादशाह को मिलने के अनेक संदेशे भेजे। पर कोई सफलता प्राप्त न हो सकी। मराठों ने अपनी शक्ति दिखाने के लिए मुगलों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले राजपूताने (राजस्थान) में लूटमार शुरू कर दी।


मुगलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मीर बख्शी खान और वजीर कमर-उद-दीन की कमान के अधीन दो फौजी टुकडि़याँ मराठों को कुचलने के लिए भेज दीं। लेकिन मराठों के सरदारों ने उन्हें पराजित करके उल्टे पांव लौटा दिया। पिलाजी यादव ने वज़ीर खान की सेना के दांत खट्टे किए और राणोजी शिंदे तथा मलहार राव होलकर ने मीर बख्शी के दल के साथ लोहा लेकर उनके घुटने टिकवा दिए।

सिद्धी अब्दुल रहिमान अपनी दावेदारी के लिए बाजी राव से सहायता लेने आया और बाजी राव ने उसको अपना समर्थन दिया। इसके एवज में सिद्धी के पुराने इलाके जैसे कि रायगढ़, रीवास और चैल आदि संधि के अनुसार 1736 ई. में मराठों के हवाले कर दिए गए। उसके उपरांत दूसरे सिद्धियों ने भी अपने अधिकार क्षेत्र मराठों को सौंप दिए। सिद्धियों के पास केवल जिंज़र, अनजानवल और गोवालकोट आदि छोटे इलाके ही रह गए थे। सिद्धी सत भी हाथी वाले मसले को लेकर हुई जंग में चिमाजी अप्पा के हाथों मारा जा चुका था।

पेशवा ने मुगल बादशाह को सबक सिखाने के उद्देश्य से दिल्ली की ओर दिसंबर 1737 ई. में अपने भारी लश्कर के साथ कूच कर दिया। दो दलों में विभाजित इस सेना की एक टुकड़ी की कमान बाजी राव ने संभाली। दूसरी के सिपहसालार पिलाजी यादव और मलहार राव होलकर बने। आगरा के गवर्नर और उदय के नवाब सआदत खान की भारी सेना ने दिल्ली के बाहर ही होलकर की टुकड़ी को तबाह कर दिया। मलहार राव होलकर जैसे तैसे अपनी जान बचाकर बाजी राव की टुकड़ी के साथ जा मिला। सआदत खान को बाजी राव के लश्कर के बारे में ज्ञान न होने के कारण उसने सोचा कि अब मराठों से उसको कोई ख़तरा नहीं होगा। उसने मराठों को नष्ट करने की खुशख़बरी दिल्ली के बादशाह को भेज दी। विजय की ख़बर सुनते ही अन्य कई मुगल जरनैल दिल्ली छोड़कर सआदत खान के साथ जश्न मनाने चले गए।

बाजी राव को जब अपने गुप्तचरों द्वारा इसकी ख़बर मिली तो उसके कदम तेज़ी से दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। 28 मार्च 1737 ई. को दस दिनों की यात्रा केवल 48 घंटे में पूरी करके बाजी राव अपनी सेना के साथ दिल्ली की सरहदों के अंदर पहुँच गया। दिल्ली में प्रवेश करते ही बाजी राव की फौज ने दिल्ली में दहशत पैदा करने के लिए लूटमार प्रारंभ कर दी। मुगल बादशाह लाल किले के अंदर ही छिपा रहा और बाहर आकर बाजी राव के साथ लड़ने का साहस न कर सका। बाजी राव ने पूरी दिल्ली में कोहराम मचा दिया। 8000 की सेना लेकर मीर हुसैन कोका ने बाजी राव का राह रोकने का यत्न किया, पर बाजी राव ने उसकी एक न चलने दी। मीर हुसैन बुरी तरह घायल हो गया।

बाजी राव दो-तीन महीने निरंतर लूटमार करता रहा और उसने मुगलों के नाक में दम किए रखा। दिल्ली को बुरी तरह भयभीत करने के बाद बहुत सारा माल-असबाब और धन दौलत लूटकर बाजी राव 31 मार्च 1737 ई. को दक्षिण को लौट गया।

दिल्ली को अच्छी तरह हिलाकर पूणे जाते हुए केन्द्रीय भारत में बाजी राव अपने मराठा योद्धाओं के लिए रास्ते में अनेक छावनियाँ स्थापित करता गया। दया बहादुर के बाद जयपुर का राजा सवाईं जय सिंह मालवे का सूबेदार बना। यह स्वयं एक कट्टर हिंदू होने के कारण मराठों की सहायता करना चाहता था। मालवा में हर वर्ष शिंदे, होलकर और पवार चैथ और सरदेशमुखी वसूल किया करते थे। परंतु उन्हंे बादशह की ओर से कोई सहायता प्रदान नहीं की गई। 1737 ई. में बाजी राव ने मालवा की सनद प्राप्त करने के लिए उŸार की ओर कूच किया। उसने सवाई जय सिंह के माध्यम से प्रयत्न किए। बादशाह ने बाजी राव को पैगाम भेजा कि वह मालवा की आमदनी में से 13 लाख देने के लिए तैयार है और सनद बाजी राव को दे दी जाएगी। बादशाह ने यह भी कहा कि यदि मराठा राजपूत राजाओं से कर वसूल करेंगे तो दिल्ली दरबार की ओर से उसमें कोई दख़लअंदाजी नहीं की जाएगी। बादशाह ने अपने अधिकारियों के हाथ उपरोक्त शर्तों की सूची और सनदें भी भेजी थीं। लेकिन अपने अधिकारियांे को बादशाह ने यह भी हिदायत दी हुई थी कि यदि मराठा शर्तों को न माने तो सनदंे उनके हवाले न की जाएँ।

यह बात बाजी राव को पता चली तो गुस्से में आकर उसने अपनी मांगे बढ़ा दीं। बाजी राव ने बादशाह से मांग की कि पूरे मालवा की जागीर, धान, मांडु, रसीन और चंबल नदी के दक्खिन का सारा राज, 800 बंगाल के गांवों में चैथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार, 50 लाख रुपये, इलाहाबाद, मथुरा, गया, दक्खिन के 6 प्रांतों की सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दिया जाए।

बादशाह ने अन्तिम मांग को छोड़कर शेष सभी स्वीकार कर ली थीं। पर इसके साथ ही उसने मराठों की अकड़ भग्न करने के लिए अपनी सेना भी भेज दी। बाजी राव को पहले ही सूचना मिल गई कि वज़ीर खंडो राव और कमर-उद-दीन खां फौज लेकर मथुरा की ओर आ रहे हैं। यह ख़बर प्राप्त करते ही वह तेज़ी से उर की ओर बढ़ा। उधर दुआब मंे कर वसूल कर रहे मलहार राव होलकर को अयोद्धया के नवाब सआदत खां ने भगा दिया।

बाजी राव उर से मराठों को एकत्रित करता हुआ दिल्ली पहुँच गया। बाजी राव का इरादा तो शांतिपूर्वक वार्ता करना था। परंतु मुगलों ने मराठों पर धावा बोल दिया। खूब घमासान लड़ाई हुई और मराठे जीत गए।

दूसरी ओर मथुरा की ओर जाते हुए सआदत खां, बंगस और खंडो राव इस युद्ध की सूचना मिलते ही तेज़ी के साथ दिल्ली की ओर मुड़ गए। बाजी राव उनके साथ रास्ते में ही निपटना चाहता था। इसलिए वह दुआब पहुँच गया। बाजी राव ने अपने भाई चिमाजी अप्पा को यह संदेश भेज दिया कि वह निज़ाम-उल-मुल्क को नर्बदा पार करके उर की ओर न आने दे। परंतु बाजी राव अपने मंसूबे में सफल न हो और उसको दक्खिन की ओर लौटना पड़ा। फिर भी बाजी राव को बादशाह की ओर से 13 लाख रुपये वार्षिक की राशि प्राप्त करने की स्वीकृति मिल गई थी।

बाजी राव के आक्रमण से घबराकर बादशाह ने मराठों को नथ डालने के लिए निज़ाम को दिल्ली बुलाकर मालवा और गुजरात उसके बेटे गाज़ी-उद-दीन के अधीन कर दिए। बादशाह ने गाज़ी से वचन लिया कि वह उन क्षेत्रों में से मराठों को भगा देगा। मुगल बादशाह दिल्ली में बाजी राव द्वारा मचाये गए कोहराम का बदला लेने के लिए तड़प रहा था। उसके द्वारा निज़ाम-उल-मुल्क के साथ दुबारा दोस्ताना संबंध स्थापित करने का उद्देश्य ही मराठों को धूल चटाने का था। बादशाह ने निज़ाम को मुगल फौज का मुख्य सेनापति बना दिया।

निज़ाम-उल-मुल्क मराठों पर चढ़ाई करने चल पड़ा तो राह में और भी अनेक मुगल समर्थक दल उनके साथ जुड़ते चले गए। जब मुगल सेना भोपाल पहुँची तो उनकी संख्या एक लाख के करीब थी। परंतु मुगलों की यह सारी कोशिश व्यर्थ गई क्यांेकि बाजी राव और अप्पा स्वामी पहले ही तैयारी करके मुगलों के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने शाही मुगल फौज को घेरकर उसकी रसद बंद कर दी। निज़ाम को हाथ खड़े करके मराठों के साथ समझौता करना पड़ा।

निज़ाम-उल-मुल्क ने कई राजपूत और बंुदेल राजाओं को अपने अधीन करके अपना रुख मराठों की ओर मोड़ लिया। उसके साथ उसका तोपखाना सिरौंज भी था।

निज़ाम-उल-मुल्क के मंसूबों की भनक पड़ते ही बाजी राव उर में पहुँच गया। मराठा फौज को देखकर भयभीत हुआ निज़ाम भोपाल में पीछे हटने लग पड़ा। मराठे उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गए। निज़ाम-उल-मुल्क भोपाल के किले में छिप गया। मराठों ने किले को घेरकर उसकी रसद बंद कर दी। विवश होकर निज़ाम-उल-मुल्क ने भोपाल और इस्लाम गढ़ के किले मराठों को सौंप दिए और स्वयं तोपखाने की आड़ में वहाँ से खिसकने लगा। मराठों ने निज़ाम को दबोच लिया। जिसके फलस्वरूप हार मानकर निज़ाम-उल-मुल्क ने बाजी राव के आगे हाथ खड़े कर दिए। संधि की शर्तों के अलावा निज़ाम-उल-मुल्क ने वायदा किया कि वह बादशाह से मराठों को मालवा प्रांत की सनद, निरमाण और चंबल नदियों के मध्य का सारा राज और फौज के खर्च के लिए 50 लाख रुपये दिलवायेगा। (इस अवसर पर 7 जनवरी 1738 ई. को दोरा (सराई) में हुई संधि को इतिहास ‘भोपाल संधि’ के तौर पर जाना जाता है।) मुगलों ने समस्त मालवा, नर्बदा और चंबल के मध्य के क्षेत्र मेें मराठों का राज स्वीकार करके 50 लाख जंगी हर्जाना भरकर मराठों से अपनी जान छुड़ाई।

बाजी राव को मुसलमानों के अतिरिक्त पुर्तगेजि़यों के साथ भी युद्ध करने पड़े। पंद्रहवीं सदी के आरंभ में आए पुर्तगेजि़यों ने तेज़ी के साथ पश्मिमी किनारे से अपना राज्य स्थापित कर लिया था। यह भी मुसलमानों की तरह सफल होने के लिए जनता पर अमानवीय अत्याचार करने से नहीं हिचकते थे। जब बाजी राव को उनके अत्याचारों का पता चला तो उसने सिद्धियों से फुर्सत पाते ही अपने भाई चिमाजी अप्पा को कोकण में लश्कर सहित भेज दिया।

चिमाजी अप्पा ने सालसती दीप, थाना, बेलपुर, बेसवी आदि स्थानों को कब्ज़े में करने के उपरांत शंकराजी केशव और खंडोजी मानकर को कोकण की रक्षा का उरदायित्व सौंप दिया। स्वयं चिमाजी अप्पा पूणे वापिस लौट गया। चिमाजी के लौटते ही पुर्तगेजि़यों ने पुनः सिर उठाने शुरू कर दिए और लोगों को सताने लग पड़े। बाजी राव ने रामचंद्र हरि पटवर्धन को माही और केलवे जीतने के लिए भेज दिया। यह मंतव्य सफल न हो सका। फिर बाजी राव ने 1738 ई. में शिंदे और होलकर को कोकण भेजा। तब तक पुर्तगेजि़यों को जनरल लिस्बन से सहायता प्राप्त हो गई थी। लेकिन फिर भी पुर्तगेजि़यों को भारी नुकसान मराठों ने पहुँचाया और उनका गोवा का गवर्नर मारा गया।

इधर बसाई से पुर्तगेज़ा का दमन करने के लिए चिमाजी भी कोकण में पहुँच गया। शेष स्थानों पर कब्ज़ा करते हुए फरवरी 1739 ई. को अप्पा ने बसाई को चारों ओर से घेर लिया। तीन महीने की कोशिशों के बाद मराठों ने बसाई पर विजय प्राप्त की।

जिस समय बाजी राव भोपाल में निज़ाम को घेरे खड़ा था, उसी समय नागपुर के भौंसले ने इलाहाबाद में घुसकर दहशत फैला दी थी। तभी रघुजी ने पूर्व में आक्रमण करके कटक को लूट लिया। भौंसले और रघुजी ने मराठों के साथ उक्त दोनों मुहिमों में सफलता पाई थी।

बाजी राव को यह अच्छा न लगा और उसने भौंसले को काबू मंे करने के लिए आवाजी काबड़े को भेजा। असल में इस कार्य को पूरा करने के लिए बाजी राव स्वयं जाना चाहता था, पर ऐन वक्त ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला करके लूटपाट शुरू कर दी थी। बाजी राव हिंदू मुसलमानों को एकत्र करके नादिर शाह के साथ टक्कर लेने की तैयारी कर ही रहा था कि उसको नादिर शाह के ईरान लौट जाने का समाचार मिला।

बाजी राव को मराठा साम्राज्य की सीमाओं को फैलाने और मराठियों की धाक जमाने के लिए उम्र भर कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन कभी भी वह बड़ी से बड़ी मुसीबत देखकर घबराया नहीं था। हर युद्ध मंे सबसे आगे कूदकर उसने सदैव अपनी बहादुरी का प्रमाण दिया था। इसलिए सभी मराठे बाजी राव को श्रेष्ठ ‘रणपुरुष’ मानते थे।

एक तरफ मराठों ने सिद्धियों के साथ जिंज़रा में जंग छेड़ रखी थी और दूसरी ओर पश्चिमी घाट पर पुर्तगेजि़यों और अंग्रेजों को भी वह सबक सिखा रहे थे जो कि मराठा राज के लिए नित्य नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे थे। पुर्तगेज़ी व्यापार के बहाने भारत में प्रवेश करके अपना अधिकार जमाने लग पड़े थे। बाजी राव ने कोकण के मनाजी अंगारे के लिए खतरा पैदा कर रहे पुर्तगेजि़यों को अपने नियंत्रण में कर लिया था। इसके शुक्राने के तौर पर पेशवा अंगारे ने 7000 रुपये की सलाना रकम देना स्वीकार कर लिया।

बाजी राव, पुर्तगेजि़यों से सालसती टापू के मसले को लेकर काफ़ी नाराज़ था। बम्बई (अब मुम्बई) के इस हिस्से में मराठा कारखाना लगाना चाहते थे जिसमें पुर्तगेज़ी विघ्न डाल रहे थे। इस मसले से निपटने के लिए बाजी राव के भाई चिमाजी अप्पा ने मार्च 1738 ई. में पुर्तगेजि़यों पर बम्बई के निकट हमला कर दिया। चिमाजी अप्पा ने थाने, परसिक, बेलपुर, धारवी, अरनाला और वर्सोवा आदि इलाकों पर फरवरी 1739 ई. तक पुनः कब्ज़ा करके मई 1739 ई. को इस मुहिम का बेसन(वसाई) को जीतकर अंत कर दिया।

बाजी राव ने दुबारा दिल्ली को घेरने के बारे में सोचकर निज़ाम-उल-मुल्क के क्षेत्र में से गुज़रने की सहायता मांगी तो निज़ाम-उल-मुल्क के पुत्र नासिर जंग ने भोपाल संधि को भुलाकर कोरा जवाब दे दिया। निज़ाम-उल-मुल्क ने संधि की शर्तों को पूरा न किया तो बाजी राव को गुस्सा आ गया और उसने निज़ाम-उल-मुल्क पर हमला करने की तैयारी कर ली। औरंगाबाद में नासिर जंग को घेर लिया। नासिर जंग की फौज बाजी राव की सेना से दो-तीन गुणा अधिक थी। दोनों पक्षों में काफी समय तक डटकर मुकाबला हुआ। आखिर मराठों को हावी होता देखकर नासिर जंग झुक गया। बाजी राव ने उसको 28 फरवरी 1740 ई0 को औरंगाबाद में बंदी बना लिया। बाजी राव से अपनी जान की सलामती के लिए नासिर जंग ने हांडिया, खरगौन, बरगौन जि़ले और नर्बदा के दक्षिणी इलाके बाजी राव के हवाले कर दिए। उसने बाजी राव के साथ दुबारा 1740 ई. में संधि कर ली। संधि के अनुसार दोनों दलों ने अमन, शांति कायम रखने तथा प्रजा को कोई कष्ट न देने का वायदा किया।(दुर्भाग्य से यह बाजी राव का अन्तिम युद्ध था)।

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