अशुभ समाचार
गोपिका बाई आकर मस्तानी को बाजी राव की मौत के बारे में भनवारा महल में बताती है। इस अशुभ समाचार को सुनते ही मस्तान की धाहें निकल जाती है, वह बुक्का फाड़कर रोते हुए बाहर की ओर जाने लगती है और दरवाज़े में से कुछ सोचकर वापस लौट आती है।
“गोपिका, मैंने तुझे नृत्य और संगीत सिखाया है। तू मुझे गुरू मानती है न ?“
“हाँ, मस्तानी ताई साहिबा। इसमें कोई शक है आपको ?“
“नहीं शक तो नहीं है। तुझे मेरे पर एक अहसान करना होगा। चाहे इसको तुम मेरी गुरू दक्षिणा समझ...।“
“आपके लिए तो जान भी हाजि़र है। आदेश करो।“
“मुझे अपने वस्त्र उतार कर दे और मेरे कपड़े तुम पहनकर महल की छत पर टहलती रहना ताकि देखने वाले को मेरा भ्रम होता रहे। मैं अपने स्वामी के अन्तिम दर्शन करना चाहती हूँ। जीते जी तो इन्होंने मिलने नहीं दिया। अब मुझे मरे का मुँह भी नहीं देखने देंगे। मैं हाथ जोड़कर तुझसे प्रार्थना करती हूँ। देख, मैं तेरे पैर पड़ती हूँ मुझे इन्कार न करना।“ मस्तानी गोपिका के पैर पकड़ लेती है।
गेपिका एकदम पैर को पीछे सरका कर मस्तानी की बाहें पकड़ लेती है, “नहीं ताई साहिबा। यह आप क्या कहते हैं ? लो, शीघ्रता से उतारो अपने कपड़े, आपको विलम्ब न हो जाए।“
दोनों आपस में वस्त्र बदल लेती हैं। मस्तानी, गोपिका के वस्त्र पहने पूजा वाली थाली लेकर भनवारा महल में से बाहर निकल जाती है। तबेले में से घोड़ा चोरी करके मस्तानी खारगौन की ओर सीधी दौड़ लगा देती है।
मस्तानी के खरगौन पहुँचने से पहले ही बाजी राव की मृतक देह को नरबदा नदी के किनारे अग्नि दिखाई जा चुकी होती है। मस्तानी घोड़े पर से उतरते ही बाजी राव की चिता में कूदने लगती है। चिमाजी अप्पा और नाना साहिब मस्तानी का आगे बढ़कर रोक लेते हैं। अंतिम संस्कार की रस्में समाप्त होने के बाद मस्तानी को पाबल के महल में ले जाकर छोड़ दिया जाता है।
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