पैगाम
18 जून 1740 ई. को बुंदेलखंड, छत्तरपुर के किले में राजा हृदय शाह और महाराजा जगतराज को अपनी सौतेली बहन मस्तानी कुंवर द्वारा हरकारे कबूतर के हाथों भेजा गया रुक्का मिलता है। जगतराज तुरंत खोलकर पढ़ने लग जाता है।
“प्रिय भाईसा, बुंदेलखंड नरेश, महाराजा जगतराज जी
सदर प्रणाम।
देवी विद्यावासिनी की कृपा से मैं कुशल मंगल हूँ। स्वामी बाजी राव जी के परलोक सिधारने का शोकमयी समाचार तो आपको प्राप्त हो ही गया होगा। उनकी मौत के बाद मैं बहुत अकेली हो गई हूँ। मेरा भविष्य क्या होगा, यह मैं स्वयं नहीं जानती। मुझे अपना आने वाला जीवन अंधकारमय नज़र आता है। मैं तो सन्यास लेकर कहीं जंगलों में चली जाती और शेष जीवन प्रभु भक्ति में लीन रहती। पर क्या करूँ ? पुत्रमोह मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं देता। मैं अपने पुत्र शमसेर बहादुर की परवरिश पर अपना अगला जीवन खर्च करने के लिए तत्पर हूँ। इस पेशवा परिवार में मेरे साथ जो ज्यादतियाँ हुई हैं, जो पक्षपात हुआ है और मेरे हकों पर जो डाके डालकर मुझे तंग-परेशान किया गया है और मानसिक पीड़ायें दी गई हैं, उन्हें मैं ही जानती हूँ। दो बार मुझे विष देकर मारने के यत्न भी हो चुके हैं। मैं नहीं चाहती कि मेरी तरह मेरे पुत्र को भी उनका सामना करना पड़े और वह मानसिक तनाव में से मेरी तरह गुज़रे। अब पुत्र के अधिकारों के लिए संघर्ष करना मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। जब तक मेरे शरीर में रक्त की अंतिम बूँद रहेगी, मैं मराठों के साथ इस मामले में भिड़ती और टकराती रहूँगी।
मैं जवान थी। खूबसूरत थी। किसी राजा, निजाम या नवाब की रखैल या रानी बन सकती थी। लेकिन मेरा सौभाग्य था कि पेशवा बाजी राव जैसे योद्धा की मुहब्बत मुझे नसीब हुई। मैंने भी उनकी सेवा उन्हें पति परमेश्वर मानकर तन, मन और धन से की है। दुख-सुख, गरीबी-अमीरी, बीमारी-तंदरुस्ती में हर समय उनका साथ दिया है। उन्होंने भी मुझ अँधे होकर प्रेम किया है। मुझे कभी शिकायत का अवसर नहीं दिया और मेरी खातिर परिवार और कौम के साथ सदा हठ करते रहे, लड़ते और भिड़ते रहे। अब वह इस दुनिया में नहीं रहे हैं। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।
खैर, अब तक तो मैंने मराठों का ध्यान बुंदेलखंड की ओर नहीं होने दिया। स्वामी मेरे साथ थे। मैं प्यार-मनुहार के साथ उनसे हर बात मनवा लेती थी। पर भविष्य में आपके लिए कुछ अधिक कर पाने में असमर्थ होऊँगी। काकाजू की वसीयत के अनुसार पन्ना की हीरों वाली खानों, नरबदा की जागीर, झांसी, सागर और कलपी आदि जो मेरे स्वामी पेशवा बाजी राव को मिली हैं, अब उन पर श्रीमंत पेशवा के बड़े साहिबजादे नाना साहिब का अधिकार होगा। नाना साहिब ने बाजी राव का उत्तराधिकारी बनकर पद संभाल लिया है। नाना साहिब, चिमाजी अप्पा की सरपरस्ती के अधीन पला-बढ़ा है और उसके इशारों पर ही नाचता है। चिमाजी अप्पा मुझे पसंद नहीं करता था और मेरे पर शुरू से ही मैली आँख रखता था। दीर (देवर) चिमाजी अप्पा के हृदय के अंदर क्रोध, घृणा और बदले की भावना ज़हरीले साँप की भाँति कुंडली मारे बैठी है। हो सकता है, मुझे नीचा दिखाने के लिए वह नये पेशवा को उकसा कर बुंदेलखंड पर कब्ज़ा करने की कोशिश करे। इससे पहले कि स्थिति आपके नियंत्रण में न रहे, आप निज़ामों के साथ मिल जाओ और मराठों को चैथ तथा सरदेशमुखी देना बंद कर दो। फिर जो होगा, देखा जाएगा।
वैसे भी मराठों की शक्ति स्वामी बाजी राव के कारण ही थी। उन्होंने अपने समूचे जीवनकाल में इकतालीस छोटी-बड़ी जंगें लड़ी थीं और वह एकबार भी नहीं हारे थे। उनके जैसा मजबूत स्तंभ गिरने के बाद मराठा साम्राज्य की छतें खोखली हो गई हैं। जो कभी भी गिर सकती हैं। मुझे मराठों के राज का सूर्य शीघ्र अस्त होता दिखाई दे रहा है। गुप्तचरों के कबूतरों के माध्यम से भेजे इस थोड़े से संदेश को ही बहुत समझना और तुरंत इस पर अमल करना।
जय !
प्रेम सहित
मस्तानी कुंवर
मस्तानी महल, पाबल, पूणा।
पत्र पढ़ते ही महाराजा जगतराज और हृदय शाह निज़ामों के साथ मिल जाते हैं और मराठों को भविष्य में आर्थिक सहायता देने से इन्कार कर देते हैं।

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