Sunday, 1 November 2015

अध्याय-19

प्रेम पौधा
मुगल बादशाह को जब सरबुलंद खान द्वारा 1730 ई. में बाजी राव के साथ चैथ और सरदेशमुखी को लेकर की गई संधि के बारे में पता चला तो उसको यह फैसला पसंद नहीं आया। बादशाह ने सरबुलंद खान को पद से हटाकर जोधपुर के अजीत सिंह के पुत्र अभय सिंह को जिम्मेदारी सौंप दी। परंतु अभय सिंह को भी बाजी राव के साथ समझौता करना पड़ा, क्योंकि वह अकेला बहुत सारे खुदमुख्तारों के साथ नहीं निपट सकता था। ये समझौते मराठा सेनापति तिंबर्क दाबड़े को स्वीकार नहीं थे। वह गुजरात के सब मामलों को वसूलने का अपना हक़ समझता था। वह पहले से ही पेशवा के साथ खार खाता था। उसका कारण यह था कि छत्रपति के बाद दूसरा बड़ा पद पेशवा का होने के कारण वह बाजी राव के साथ उसकी योग्यता के कारण घृणा करता था। दूसरी ओर पेशवा पुराने लोगों की अपेक्षा होलकर, शिंदे और पवार जैसे नौजवानों को पदों पर आसीन करके प्रसन्न होता था।

शिंदे, पवार, गायकवाड़ और होलकर घरानों का उभार भी बाजी राव की कृपा से हुआ था। शिंदे, सतारा जि़ला के कोरेगांव ताल्लुक के कंनेरखेड गांव के वासी थे। इनके पुरखों को इनाम के तौर पर इस गांव की जागीर मिली थी। बाजी राव के पिता बालाजी विश्वनाथ की सेना में राणो जी शिंदे नाम का कारीगर था। उसकी ईमानदारी को देखकर बाजी राव ने उसको अपना निजी सेवक और अंगरक्षक बना दिया था। उरी हिंदुस्तान के युद्धों में लड़ने के पश्चात इसको बाजी राव ने एक बड़ा फौजी दल देकर उसका मुखिया बना दिया था।
होलकर घराने के लोग नीरा नदी क तट पर बसे जंजोरी नगर के निकट पड़ते होल गांव के रहने वाले थे। इस घराने का संस्थापक मलहार राव होलकर था, वह भेड़ें चराकर अपना गुज़ारा किया करता था। बाद में यह किलेदार बन गया। किलेदारी करते हुए इसने युद्ध विद्या सीखी और बाजी राव के साथ अनेक युद्धों में अपने जौहर दिखाये। उसकी बहादुरी को देखते हुए बाजी राव ने उसको पाँच हज़ार सैनिकों का सेनापति बना दिया था।

पवार राजपूतों का वंश बहुत पुराना है। इनकी महिमा धार प्रदेश से ही अधिक हुई। राजा विक्रमादित्य और राजा भोज, धार में बसते रहे थे। विक्रमादित्य ने तो उज्जैन से बदलकर अपने राजधानी धार को बना लिया था। असल राजपूत और मराठा पवार वंश का संस्थापक उदाजी राव पवार को माना जाता है। 1729 ई. में बाजी राव द्वारा उसको धार की जागीर छत्रपति से प्रदान करवाई  थी।

गायकवाड़ घराने का आगाज़ भी लगभग शिंदे और होलकर घरानों के साथ ही हुआ था। झिंगोजी राव गायकवाड़ के पुत्र पिलाजी राव गायकवाड़ ने गुजरात में अपनी धाक जमा के 1721 ई. मंे अपना राज स्थापित किया और वड़दोरा (ठंतवकं) को अपना राजधानी बनाया। 1726 ई. में उसने सोनागाड के जि़ले का निर्माण करवाया। इसको पेशवा बाजी राव की ओर से ‘सीना खास खेल’ का खिताब बख्शा गया था। (14 मई 1732 ई. को उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र धमाजी राव गायकवाड़ ने राज संभाला था)।

छत्रपति द्वारा मराठा सरदारों खंडो राव और दाभड़े को यह विश्वास दिलाया गया था कि यदि वे गुजरात जीत लेंगे तो वहाँ की जागीर उन्हें ईनाम के तौर पर दी जाएगी। खंडो राव ने तभी से ही गुजरात में कर वसूलना प्रारंभ कर दिया। सिद्धी हुसैनी ने उस के साथ दो बार युद्ध किया लेकिन वह हार गया। छत्रपति ने इस पर प्रसन्न होकर खंडो राव को सेनापति बना दिया। इसी खंडो राव का साथी दमाजी गायकवाड़ (पिलाजी राव गायकवाड़ का पुत्र) था। वह बड़ा महान योद्धा था। इसलिए छत्रपति ने गायकवाड़ को ‘शमसेर बहादुर’ की उपाधि से नवाजा था। बहुत सारे युद्धों में भी ये सब बाजी राव के संग चला जाया करते थे। गुजरात मामला सुलझाने की अपेक्षा दिन-प्रतिदिन भड़कता ही गया। संसारपति तिंबर्क दाभड़े ने पेशवा बाजी (द्वितीय) (बाजी राव का पुत्र नाना साहिब) पर दाभड़े परिवार और छत्रपति शाहू के मध्य हुए अहदनामी का उल्लंघन करने का दोष मढ़ दिया। संसारपति ने बाजी राव के साथ सख्ती से सीधे ही निपटने के लिए धार की जंग छेड़ ली।

अपै्रल 1731 ई. को धोबाई में हुई इस लड़ाई में तिंबर्क दाभड़े और संभाजी का पुत्र पिलाजी गायकवाड़ मारे गए। इस जंग में बागी हुए उदाजी पवार और चिमनाजी दामोदर को बाजी राव ने बंदी बनाकर युद्ध जीत लिया।

युद्ध से लौटकर आने के उपरांत 2 अपै्रल 1731 ई. को देवकी नंदन का लिखा बाजी राव को एक ख़त मिलता है। उस में बारांदरी और गीत गोबिंद के तैयार हो जाने की सूचना दी गई होती है।

शनिवार वाड़े का निर्माण आरंभ होने से दो वर्ष बाद शनिवार वाड़ा( वाड़े की किलेबंदी और दीवारें, फव्वारे, बाग और ऊँचे बुर्ज़ का काम बाद में बाजी राव के पुत्र नाना साहिब ने 1746 ई. में पूरा करवाया था।) तैयार हो जाता है। शेरू (ब्लचतमेे ज्तमम) के तनों की शहतीरें, छतों के नीचे सहारे के लिए डाली जाती हैं। भवनों की दीवारों पर जयपुर के मोराजी पत्थरवत भोजराजा और चित्रकार रागो द्वारा रामायण और महाभारत के चित्र बनाये जाते हैं।

22 जनवरी, 1732 ई. शनिवार वाले दिन को हिंदू रीति के अनुसार पूजा और हवन करवाकर बाजी राव और उसके समूचे परिवार द्वारा ससवाद छोड़कर शनिवार वाड़े में गृह-प्रवेश किया जाता है। इस शुभ दिन पंद्रह रुपये पचास पैसे का दान बाजी राव मस्तानी के हाथों करवाता है। वाड़ा तैयार करने वाले कारीगरों, कुम्मवत खत्री, मोराजी पत्थरवत भोजराजा, शिवराम कृष्णा, देवाजी, कोंडाजी सूत्र आदि को बाजी राव द्वारा नायक (छंपा उमंदे डंेजमत) का खिताब और भारी ईनाम देकर नवाज़ा जाता है। वाड़े पर कुल लागत 16,100.10 रुपये आ चुकी होती है।

बेशक पेशवा का समस्त परिवार शनिवार के दिन वाड़े में एकत्र होता है, परंतु सभी सदस्य मस्तानी से अपनी एक सीमित दूरी बनाकर रखते हैं। यहाँ तक कि मस्तानी के प्रयोग के लिए कुआँ भी पृथक होता है। रहने के लिए महल भी अलग और वाड़े से बाहर जाने के लिए दरवाज़ा और मंदिर भी अलहदा ही होते हैं। मस्तानी के राह में से निकलने पर भी भट्ट परिवार कन्नी कतराता है। बाजी राव को महज दिखावा करने के लिए ही वे मस्तानी के साथ न चाहते हुए भी तालमेल रखते हैं। वरना मस्तानी का उल्लेख सुनना भी उनको अच्छा नहीं लगता। विशेषकर काशी के मन में से न कभी मस्तानी के लिए नफ़रत गई थी और न ही जा सकती है। मस्तानी को अपने साथ होते पक्षपाती व्यवहार और अस्वीकारे जाने का दुख तो होता है, पर वह अपने मन की भड़ास किसी के सामने नहीं निकालती। सब कुछ अपने अंदर ही समाहित करके बाजी राव के प्रेम में मस्त हुई रहती है।

पेशवा का सारा खजाना वाड़े के निर्माण पर ही खर्च हो चुका होता है। महीना पहले 20 दिसम्बर 1731 ई. को महाराजा छत्रसाल की मृत्यु हो जाने के कारण बाजी राव को बुंदेलखंड से भी आर्थिक सहायता आनी बंद हो जाती है। मस्तानी के भाई शहजादा जगतराज का भेजा पत्र बाजी राव को मिलता है जिसमें उसने लिखा होता है कि महाराजा छत्रसाल की मौत के बाद वह राज को संभालने और सभी साठ भाई-बहनों को उनका हक, हिस्से और जागीरें बांटने में व्यस्त है। जैसे ही वह अपने घरेलू मामलों को निपटा लेगा तो फुर्सत पाकर वह पूणे आएगा और पेशवा को अपने स्वर्गीय पिता की वसीयत के अनुसार बनने वाला तीसरा हिस्सा सौंप देगा।

बाजी राव अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए नये क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए निकल पड़ता है। हर मुहिम में मस्तानी दिन रात बाजी राव के संग संग रहती है। जब कभी युद्ध से फुर्सत मिलती है तो वह शनिवार वाड़े में जाकर आराम करते हैं। पेशवा के शेष सभी परिवार के अलावा अन्य जान-पहचान वाले और सगे-संबंधी भी ससवाद छोड़कर शनिवार वाड़ा में आकर रहने लग पड़ते हैं।

मौसम बदलते रहते हैं। पतझर...सावन...बसंत...बहार...।

वर्ष 1732 ई. में काशी की कोख से बाजी राव को एक पुत्र रामचंद्र की प्राप्ति होती है। लेकिन वह बीमार होकर कुछ महीने बाद ही ईश्वर को प्यारा हो जाता है। उससे अगले वर्ष 1733 ई. में मस्तानी का मामा अनवर खान पूणे में आकर मस्तानी की अम्मी के निधन की ख़बर सुनाता है। मस्तानी कुछ दिन माँ का शोक मनाने के बाद अपने जीवन में पुनः व्यस्त हो जाती है।

इसी वर्ष काशी बाई का एक और गर्भ गिर जाता है। उन दिनों में ही बहुत सारे मराठा सैनिक भी जंग में मारे जाते हैं। पेशवा का परिवार इन सभी मौतों का दोष मस्तानी के सिर मढ़ कर उसको अशुभ मानने लग जाता है।

सिद्धियों के साथ नित्य होती छोटी-मोटी झड़पों को बाजी राव एकबार भयंकर रूप में युद्ध करके समाप्त कर देने पर तुल जाता है। 1733 ई. में सिद्धी नवाब रसूल याकूत की मृत्यु हो जाती है तो उसके पद की दावेदारी को लेकर उसके भाइयों और पुत्रों के बीच झगड़ा उत्पन्न हो जाता है।

बाजी राव ने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए जिंज़र को समुद्र की ओर से घेरा डाल लिया। जिंज़र का किला बहुत खस्ता हालत में था और ऐन वक्त पर सेखोजी की अचानक मौत हो गई। सेखोजी के भाई संभाजी के साथ तालमेल न बनने के कारण बाजी राव वापस लौट आया।

बाजी राव के साथ पाँच वर्ष लगातार दिन रात रहने के बावजूद मस्तानी गर्भवती नहीं होती, जबकि काशी को बाजी राव कभी कभार मिलने पर ही गर्भवती करके चला जाता है। यह अलग बात है कि उसके गर्भ में बीच में ही व्यवधान पड़ जाता है। मस्तानी को बांझ कहकर ताने-उलाहने कसे जाने लगते हैं। मस्तानी अपने और बाजी राव के प्रेम पौधे को फल लगा देखने के लिए तत्पर हो जाती है। वह सब तरफ से ध्यान हटाकर शराब छोड़ देती है और संतान प्राप्ति के यत्न प्रारंभ कर देती है।

एक दिन एकदम मस्तानी की तबीयत खराब हो जाती है। बाजी राव उपचारक को बुलाता है। दासियाँ मस्तानी की कलाई पर धागा बांधकर वैद को पकड़ा देती हैं। वैद धाना कानों से लगाकर मस्तानी की नब्ज़ सुन लेता है और मुस्कराता है, “चिंता करने की कोई बात नहीं श्रीमंत सरकार। मुबारक हो। पेशवा परिवार का चश्म चिराग आ रहा है।“

खुशख़बरी सुनकर बाजी राव उपचारक का धन्यवाद करता है और अपने गले में से उतारकर एक कीमती माला वैद को बतौर ईनाम दे देता है। मस्तानी के पास जाकर खुशी में पागल हुआ बाजी राव मस्तानी के चैड़े मस्तक को चूमते हुए कहता है, “मुझे तेरे जैसा सुंदर-सुशील और मेरे जैसा जांबाज मराठा शेर पुत्र चाहिए।“

“हाय अल्ला ! मुझे तो यकीन ही नहीं आता कि मैं माँ बनने वाली हूँ।“ मस्तानी बिस्तर पर पड़ी छुईमुई की तरह सिकुड़ जाती है।

“नित्य जो सागर मंथन करते थे, उसके परिणाम स्वरूप हीरा, मोती, लाल, माणक तो बाहर निकलना ही था। चलो, बधाई हो। एक का नींव पत्थर रखा गया है। ऐसे ही हम मेहनत करके एक विशाल लश्कर पैदा कर लेंगे।“ बाजी राव मूंछों को मरोड़ा देता है।

मस्तानी नखरा करती है, “न बाबा। जान से मारना है मुझे गरीबन को ? यदि फौज बनानी है तो आप बच्चा पैदा करके दिखाओ ?“

“अगर यह संभव होता तो तेरी खातिर हम यह भी कर देते मेरी प्रिय।“ बाजी राव मंद मंद हँसता है।

बाजी राव गरीबों को दान करके अपने परिवार को मस्तानी के गर्भवती होने का शुभ समाचार सुना देता है। काशी बाई को जब मस्तानी के गर्भवती होने के बारे में सूचना मिलती है तो वह तड़प उठती है। वह बहाने से अपनी सास राधा बाई को भड़का कर मस्तानी को बाजी राव से जुदा कर देती है। मस्तानी को जनेपे के लिए शनिवार पेठ के सरदार रसटाका के वाड़े मंे भेजकर खास दाइयाँ और दासियाँ उसकी सेवा में लगा दी जाती हैं। भट्ट पेशवा परिवार की सभी स्त्रियों को गर्भावस्था में वहीं ठहराया जाता है, क्यांेकि वहाँ सभी प्रकार की सुविधायें धरती की सतह पर ही उपलब्ध हैं। चैबारों पर चढ़ने उतरने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

काशी बाई को बाजी राव के साथ समय व्यतीत करने का खुला समय मिल जाता है। दिन रात बाजी राव काशी के पास रहता है। कुछ ही दिनों में काशी भी गर्भवती हो जाती है। मस्तानी और काशी बाई दोनों सौतनें रसटाका वाड़े में एकसाथ हो जाती हैं।

मार्च 1734 ई. में मस्तानी पुत्र को जन्म देती है। चितपवन ब्राह्मणों की रीति के अनुसार बच्चे के जन्म से छह दिन बाद पूजन और बारहवें दिन नामकरण की रस्म होती है। मस्तानी के पुत्र के लिए विशेष पूजा नहीं की जाती और बिना कोई रस्म किए बाजी राव मस्तानी की कृष्ण भक्ति को मुख्य रखकर अपने और मस्तानी के पुत्र का नाम कृष्ण रख देता है। लेकिन बाजी राव के परिवार वाले कृष्ण नाम के साथ सिनहा उपनाम जोड़ देते हैं। मस्तानी का पुत्र कृष्ण सिनहा के नाम से जाना जाने लगता है। न बाजी राव और न ही मस्तानी को उस समय यह ज्ञान होता है कि पुरातन परंपरा के अनुसार बच्चे के नाम के साथ सिनहा जोड़ने का अर्थ बच्चे को अधिकारों से वंचित रखना होता है। सिनहा शब्द का प्रयोग पेशवा के खानदान में अवैध संतान के लिए किए जाने की प्रथा होती है।

कृष्ण सिनहा के जन्म से कुछ माह बाद 18 अगस्त 1734 ई. को उसी वर्ष काशी बाई के रघुनाथ राव नाम का दूसरा पुत्र पैदा होता है। रघुनाथ राव के लिए सभी रस्में बाजी राव के विरोध के बावजूद निभाई जाती हैं। परंतु मस्तानी उनका बुरा नहीं मनाती। मस्तानी के मन को दुख अवश्य होता है, पर वह अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति किसी के सम्मुख नहीं करती।

बाहरी और घरेलू युद्धों से जूझता हुआ बाजी राव अपनी जीवन यात्रा तय किए जाता है। मस्तानी पेशवा के पारिवारिक सदस्यों के षड्यंत्रों से निपटती हुई बाजी राव के साथ हर मैदान में परछाई की तरह साथ रहती है। कृष्ण सिनहा और रघुनाथ राव बड़े होने लगते हैं। काशी बाई के एक अन्य पुत्र जनार्धन (जनोबा दादा) पैदा होता है।

रघुनाथ राव के बड़े होते ही मुंडन करवाकर ब्राह्मणी प्रथा का प्रतीक जनेऊ पहनने की रस्म की तैयारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। बाजी राव जब कृष्ण सिनहा के भी जनेऊ डालने की बात करता है तो एकबार फिर समस्या उठ खड़ी होती है। काशी बाई बवाल खड़ा कर देती है, “लो, जनेऊ नहीं तो और कुछ ? कल की भूतनी और श्मसान का आधा। आज जनेऊ की रस्म में शरीक करो, कल को पेशवाई पर अधिकार मांगेंगे। मुझसे और मेरे पुत्रों से सारे अधिकार छीनकर मस्तानी पर ही सब कुछ लुटा दो।“

“पर कृष्ण सिनहा मेरा बेटा है और हिंदू रीति के अनुसार उसको भी जनेऊ धारण करना चाहिए।“

बाजी राव के तर्क को चिमाजी अप्पा काटता है, “पर वह मुसलमानी का भी पुत्र है। वह क्या जाने जनेऊ का क्या महत्व होता है ? हमारी हिंदू मर्यादाओं का पालन उससे कहाँ हो पाएगा ?“

बाजी राव समस्त परिवार से बहुत माथा पच्ची करता है, पर बाजी राव की कोई एक नहीं चलने देता। मस्तानी के धैर्य का प्याला टूट जाता है। मस्तानी भी खीझकर समस्त पेशवा परिवार को खरी खोटी सुनाती है, “चाट लो अपने ब्राह्मणवाद को। मेरे पुत्र का नाम भी हिंदू नहीं रहेगा। छत्रपति द्वारा जंग में अकेले वीरता दिखाने वाले को ‘शमसेर बहादुर’ की उपाधि दी जाती है। मेरा पुत्र भी अब अकेला ही अपनी जंग लड़ेगा और आज से मैं अपने पुत्र का ब्राह्मणी नाम भी बदल कर राजपूतों और मुसलमानों वाला नाम शमशेर बहादुर रखती हूँ। जैसे आप चलोगे, मैं भी वैसे ही चलूँगी।“

कृष्ण सिनहा प्राणामी धर्म स्वीकार करके कृष्ण सिनहा से शमसेर बहादुर बन जाता है और हिंदू तथा इस्लाम धर्म का पालन करने लग जाता है। बाजी राव पाबल(। अपससंहम सपमे वद जीम समजि ;दवतजीद्ध इंदा व िजीम टमस त्पअमतण् च्ंइंस पे 39ण्34 ज्ञउ ंित तिवउ जीम कपेजतपबजष्े उंपद बपजल व िच्नदम ) वाले महल की मरम्मत करवाकर उसको मस्तानी महल का नाम दे देता है और मस्तानी के नाम कर देता है।

एक नये बने अन्य वाड़े रावरखेड़ी, पाबल में बाजी राव मस्तानी के प्रेम में लीन रहकर मनमर्जी का विलासमयी जीवन व्यतीत करने लग जाता है। वह राजनीतिक कामों और शासन प्रबंध तथा अन्य मामलों जैसे जंगों-युद्धों की तरफ ध्यान देना बहुत कम कर देता है। दिन रात मस्तानी बाजी राव के साथ शराब पीती और उसका चि बहलाने के लिए मुजरे करती रहती है। बाजी राव हाथों में जाम पकड़कर मस्तानी के परोसे पान को मुँह में चबाता हुआ अफ़ीम के नशे में हुक्के की गुड़गुड़ में सारे संसार को बिसार देता है। मस्तानी महल में बाजी राव और मस्तानी के प्रेम का पौधा फलता फूलता रहता है।...

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