गृह प्रवेश
ज्योतिषियों द्वारा घोषित की गई शुभ घड़ी में बाजी राव अपने लश्कर सहित पूणे में प्रवेश होकर ससवाद अपने गृह स्थान में पहुँच जाता है। महल के प्रांगण में बाजी राव के घोड़े, पीछे हाथी पर आ रही मस्तानी की पालकी का उतारा होता है। बेहद कीमती हीरे, जवाहरात, गहने और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहने जब मस्तानी पालकी में से बाहर निकलती है तो ऐसा लगता है मानो अँधेरे में किसी ने लाखों करोड़ों चहुंमुखी दीये जला दिए हों। एकबार तो सारे पूना के मराठा साँस रोककर मस्तानी के हुस्न को एकटक देखते रह जाते हैं।
बाजी राव घोड़े से उतरकर अपनी माता राधा बाई के चरण स्पर्श करता है। राधा बाई पूजा वाली थाली में से तिलक लगाकर बाजी राव का स्वागत करती है। फिर वह मस्तानी की ओर पग बढ़ाती है। मस्तानी भी अपनी सास राधा बाई के चरणों को हाथ लगाकर माथा टेकती है।
मस्तानी की सुंदरता देखकर एकबार तो राधा बाई भी पलकें झपकना भूल जाती है। वह मन ही मन सोचती है कि चलो, खूबसूरत और जवान है। मराठा चितपवन शाहूकार ब्राह्मणी न सही, बुंदेलन राजपूतनी ही सही। सबसे बड़ी बात कि खाली पड़े खजाने भर देगी। युद्धों में अधिक व्यय हो जाने के कारण कई सालों से चढ़े कर्जे उतर जाएँगे। राधा बाई बिना हिचकिचाहट के मस्तानी को स्वीकार कर लेती है और उसकी नज़र उतार कर मस्तानी का गृह प्रवेश करवाती है।
बाकी पारिवारिक सदस्यों की नज़रों में मस्तानी का सत्कार पैदा करने के लिए बाजी राव, महाराजा छत्रसाल की ओर से भेजे गए उपहार और दहेज के सामान की प्रदर्शनी लगा देता है। सबके लिए दहेज में कुछ न कुछ अवश्य होता है। स्त्रियों के लिए रेशम और पश्मीने के वस्त्र, लहगें, साडि़याँ। ऊन के शाॅल, तुलसी मालायें, चूडि़याँ, पुखराज, नीलम, माणक जड़े टिक्के, हार और अन्य बहुत से गहनें। पुरुषों के लिए नगों वाले हुक्के, पगडि़याँ, कलगियाँ, मालायें, कंबल, चोले, सोने के कड़े, खंजर, कृपाणें और निजी प्रयोग की अन्य बहुत सारी वस्तुएँ। नित्यप्रति घरेलू प्रयोग की अनेक वस्तुएँ, संद और औजार मस्तानी अपने साथ बुंदेलखंड से लेकर आती है।
दहेज के सामान के साथ ही बाजी राव का भाई चिमाजी अप्पा, भाभियाँ, बहनें आदि सब बहल जाते हैं। यदि कोई नाराज रहता है तो वह केवल बाजी राव की पत्नी काशी बाई और उसका पुत्र नाना साहिब ही होते हैं। बाजी राव समझ रहा होता है कि काशी बाई का रोष उचित है। वह अकेला काशी बाई को जाकर मिलता है, “काशी, मुझे नहीं पता कि यह ठीक है या गलत। पर जि़न्दगी में इन्सान को बहुत सारी बातों का निर्णय भाग्य पर छोड़ना पड़ता है। ऐसे ही यह भी कोई संजोगों का खेल था जो हमारा मस्तानी के साथ मेल हुआ है। वह इस परिवार में नई है और मराठा रीति-रस्मों से अनजान है। मेर अनुरोध है कि तुम उसको अपनी छोटी बहन समझकर प्रेम से रखो। तुम तो जानती ही हो, मैं एक हुक्मरान हूँ। हुक्मरानों को सियासी कारणों से एक से अधिक रिश्ते निभाने पड़ते हैं। बाबा के भी तो दो विवाह हुए थे। शाहू जी की चार पत्नियाँ हैं। छत्रपति शिवाजी ने साई बाई के अलावा सुमन बाई, सोयरा बाई, पुलता बाई, लक्ष्मी बाई, सकवार बाई, काशी बाई और गुणवंतना बाई आदि के साथ भी शादियाँ की थीं। आठ विवाह थे उनके। उनके पिता शाह जी के जीजा बाई, टुका बाई और दासी नरसा बाई आदि के साथ विवाह हुए थे। फिर भी तू मेरी हमजोली है और मैं तेरा गुनहगार हूँ। इसकी जो चाहे सज़ा तू मुझे दे लेना। पर मस्तानी को कभी माथे पर बल डालकर न देखना।“
काशी बाई कुछ नहीं बोलती, बस चुपचाप खड़ी सुनती रहती है। जब बाजी राव बाहर चला जाता है तो काशी सिरहाने में सिर देकर ज़ोर ज़ोर से रोने लग पड़ती है। काशी बाई की समझ में नहीं आता कि वह पति का आदेश मानकर खुशी मनाये अथवा अपने मन के कहने लगकर दुखी हो। एक गुबार जो सीने में उसने संभाल रखा होता है, वह किनारे तोड़ कर बाहर आ जाता है। काशी की आँखों में से आँसुओं की बाढ़ उमड़ पड़ती है। सारा बिस्तर काशी के आँसुओं के सैलाब से भीग जाता है।
बाजी राव को मस्तानी को लेकर जितने घरेलू क्लेश की आशा थी, वह नहीं होता। बल्कि सारे परिवार की ओर से मस्तानी को सहज ही स्वीकार कर लिया जाता है। मस्तानी अपने हंसमुख स्वभाव के कारण बहुत शीघ्र ही समस्त परिवार में घुलमिल जाती है।
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